श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें114 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/71-78 ] पुनः श्रवण, कीर्तन और स्मरण ही परम साधन और साध्यके रूपमें पूर्व-पूर्व आचार्योंके द्वारा निर्णीत हुआ है।"] (भाः 6/3/22)— “एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसां धर्मः परः स्मृतः। भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभिः॥” [अर्थात् “श्रीभगवान् वासुदेवका जो नामसङ्कीर्तन आदि भक्तियोग है, इस जगत्में जीवोंके लिये बस वही परम धर्म कहा गया है।"] श्रीगौरहरिके (स्वकृत शिक्षाष्टकके तृतीय श्लोकमें)— “तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः॥” [अर्थात् “जो अपनेको तृणसे भी छोटा मानते हैं, जो वृक्षके समान सहनशील हैं, अपने लिये मानशून्य हैं और दूसरोंको सम्मान प्रदान करते हैं, वे ही सदा हरिकीर्तन करनेके अधिकारी हैं।"] 'निरपराधे' अर्थात् दस नामापराधोंसे रहित निरन्तर अथवा विश्रामरहित नामसेवामें रत होकर। 'दस नामापराध', - आदिलीला 8/24 संख्याका अमृतप्रवाह भाष्य और अनुभाष्य देखें ॥ 71 ॥ महाप्रभुके अभिप्रायके अनुसार श्रीसनातनके द्वारा फल्गु देहत्यागकी इच्छाको परित्याग करनेरूपी लीलाके अभिनयके द्वारा जीवोंको शिक्षा प्रदान :- एत शुनि' सनातनेर हैल चमत्कार। 'प्रभुरे ना भाय मोर मरण-विचार ॥ 72 ॥ सर्वज्ञ महाप्रभु निषेधिला मोरे।' प्रभुर चरण धरि' कहेन ताँहारे ॥ 73 ॥ निष्किञ्चन वैष्णवाचार्य श्रीसनातनकी दैन्योक्ति, महाप्रभुकी स्तुति और अपने दैहिक कर्त्तव्यकी जिज्ञासा :- “सर्वज्ञ, कृपालु तुमि - ईश्वर स्वतन्त्र। यैछे नाचाओ, तैछे नाचि, -येन काष्ठयन्त्र ॥ 74 ॥ नीच, अधम, पामर मुञि पामर-स्वभाव। मोरे जियाइले तोमार किबा हबे लाभ ? ?"75 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके वचनोंको सुनकर श्रीसनातन गोस्वामी आश्चर्यचकित हो गये। श्रीसनातन गोस्वामी समझ गये कि 'मेरे आत्महत्या करनेके विचारमें महाप्रभुका अनुमोदन नहीं है और सर्वज्ञ महाप्रभुने मुझे इसके लिये निषेध किया है।' श्रीसनातन गोस्वामीने महाप्रभुके चरणोंको पकड़कर उनसे कहा, – “आप सर्वज्ञ, कृपालु और स्वतन्त्र ईश्वर हैं। मैं तो काठसे बने यन्त्रके समान हूँ, आप मुझे जैसे नचाते हो, मैं वैसे ही नाचता हूँ। मैं नीच, अधम, पापी हूँ और मेरा स्वभाव भी पापी व्यक्तिवाला है। तो फिर मुझे जीवित रखनेसे आपको क्या लाभ होगा?"72-75 ॥ अनुभाष्य—'ना भाय',—'योग्य' कहलानेका बोध नहीं होता ॥ 72 ॥ महाप्रभुका उत्तर; श्रीसनातनका काय-मन-वाक्यादि सर्वस्व ही श्रीगौर-कृष्णके द्वारा आत्मसात्, उसके द्वारा ही श्रीगौर-कृष्णके द्वारा अपना सेवा-कार्य-साधन :- प्रभु कहे, - "तोमार देह मोर निज-धन। तुमि मोरे करियाछ आत्मसमर्पण ॥ 76 ॥ दीक्षासिद्ध भक्तोंके लिये श्रीकृष्णकी इच्छाको ही अपनी परिचालिका मानकर उसके आनुगत्यमें अपने कर्त्ता होनेके अभिमान अथवा अहङ्कारके त्यागकी कर्त्तव्यता :- परेर द्रव्य तुमि केने चाह विनाशिते ? धर्माधर्म-विचार किबा ना पार करिते ? ? 77 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, – “तुम्हारी देह मेरी अपनी सम्पत्ति है। तुमने इसे मुझे आत्म-समर्पण किया है। तुम किसी दूसरेकी वस्तुको विनष्ट क्यों करना चाहते हो? धर्म-अधर्मका विचार क्यों नहीं करते हो? 76-77 ॥ सनातन भगवान् श्रीकृष्ण-चैतन्यके अभिन्न प्रकाश-विग्रह चिद्विलास श्रीसनातन प्रभु :- तोमार शरीर- मोर प्रधान 'साधन'। ए शरीरे साधिमु आमि बहु प्रयोजन ॥ 78 ॥ अनुवाद—तुम्हारा शरीर मेरे मनोभीष्टकी पूर्तिके लिये प्रधान साधन है। तुम्हारे इस शरीरके द्वारा मैं