श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2130, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 4/70-71 ] चौथा अध्याय 113
नवविधा-भक्ति (अभिधेय) ही श्रीकृष्णप्रेम (प्रयोजन) और श्रीकृष्ण (सम्बन्ध)को प्रदान करनेकी महाशक्तिको धारण करती है। साधनभक्ति ही अभिधेयरूपमें प्रकट होकर बादमें प्रेमभक्तिके स्वरूपको प्राप्त करती है। प्रयोजनरूपी श्रीकृष्णप्रेम ही सम्पूर्णरूपसे श्रीकृष्णको प्रदान करता है॥70॥
दस अपराधोंसे रहित होकर निरन्तर विश्रामरहित कृष्णकीर्तनके फलसे कृष्णप्रेमकी प्राप्ति :- ता॑र मध्ये सर्वश्रेष्ठ नाम-सङ्कीर्त्तन। निरपराधे नाम लैले पाय प्रेमधन॥71॥
अनुवाद—नवधा-भक्तिके अङ्गोंमें-से नाम-सङ्कीर्त्तन ही सर्वश्रेष्ठ है। निरपराध होकर भगवन्नाम-कीर्त्तन करनेसे श्रीकृष्णप्रेमधनकी प्राप्ति होती है॥71॥
अनुभाष्य—श्रीजीवगोस्वामि प्रभु (भक्तिसन्दर्भकी 270 संख्यामें),— “इयञ्च कीर्त्तनाख्या भक्तिर्भगवतो द्रव्यजातिगुणक्रियाभिर्दीन- जनैकविषयापारकरुणामयीति श्रुतिपुराणादिविश्रुतिः। xx अतएव कलौ स्वभावत एवातिदीनेषु लोकेषु आविर्भूय ताननायासेनेव तत्तद्युगगत-महासाधनानां सर्वमेव फलं ददाना सा कृतार्थयति। अतएव तयैव कलौ भगवतो विशेषतश्च सन्तोषो भवति॥” (273 संख्यामें)— “अतएव यद्यन्यापि भक्तिः कलौ कर्त्तव्या, तदा तत्संयोगेनैव॥” [अर्थात् “जो द्रव्य, जाति, गुण और क्रियाके विषयमें दीन हैं अर्थात् जिनके पास उत्तम द्रव्य (धन), जाति, गुण और क्रिया नहीं हैं, उनके एकमात्र (कल्याणकारी) विषय रूपमें ही अपार करुणामयी यह भगवान्की नाम-रूप-गुणकी कीर्त्तनाख्या (कीर्त्तन-नामक) भक्ति है,—यह श्रुति-पुराणादि शास्त्रोंमें प्रसिद्ध है। इसलिये कलियुगमें स्वभावतः अतिदीन मानवोंमें आविर्भूत हुई यह कीर्त्तनाख्या भक्ति अनायास ही उन्हें अन्यान्य युगोंके अन्तर्गत महासाधनसमूहके सभी फल ही प्रदान करके कृतार्थ करती है—क्योंकि उसके द्वारा भगवान् विशेषरूपसे सन्तुष्ट होते हैं। इसलिये कलियुगमें यद्यपि अन्यान्य भक्तिके अनुष्ठान कर्त्तव्य हैं, किन्तु उन्हें कीर्त्तनाख्या भक्तिके संयोगसे ही करना होगा।”]
श्रीरूपप्रभु (नामाष्टकके प्रथम श्लोकमें),— “निखिलश्रुतिमौलिरत्नमालाद्युतिनीराजित पादपङ्कजान्त। अयि मुक्तकुलैरूपास्यमानं परितस्त्वां हरिनाम संश्रयामि॥” [अर्थात् “हे हरिनाम! मैं, आपका सर्वतोभावसे आश्रय ग्रहण करता हूँ, क्योंकि आपका महत्त्व विचित्र है। देखो, समस्त श्रुतियोंकी मुकुटमणिरूप उपनिषद्स्वरूप रत्नोंकी मालाकी चमचमाती हुई कान्तिके द्वारा, आपके चरणकमलोंके अन्तभागकी अर्थात् नखोंकी आरती उतारी जाती है और मुक्तमुनिगण भी आपकी उपासना करते रहते हैं।”]
श्रीसनातन प्रभु (बृहद्भागवतामृतके प्रथम खण्ड प्रथम अध्यायके नौवें श्लोकमें)— “जयति जयति नामानन्दरूपं मुरारे- र्विरमितनिजधर्मध्यानपूजादियत्नम्। कथमपि सकृदात्तं मुक्तिदं प्राणिनां यत् परमममृतमेकं जीवनं भूषणं मे॥” [अर्थात् “जो वर्णाश्रमधर्म, ध्यान और पूजादिसे छुटकारा देनेवाले हैं अर्थात् जो वर्णाश्रमधर्मके अनुष्ठान, ध्यान-परायण व्यक्तियोंका मनोनिग्रह तथा पूजा-निष्ठित व्यक्तियोंके पूजाके उपकरण संग्रह आदि दुःखोंका निवारण करते हैं; जो किसी प्रकार एकबार मात्र गृहीत होनेपर प्राणीमात्रको मुक्ति प्रदान करते हैं, जो मेरे (ग्रन्थकारके) एकमात्र परम अमृतस्वरूप-जीवनस्वरूप- भूषणस्वरूप हैं, वे आनन्दमय श्रीहरिनाम सभी प्रकारसे जययुक्त हों, जययुक्त हों।”]
(भाः 2/1/11)— “एतन्निर्विद्यमानानामिच्छतामकुतोभयम्। योगिनां नृप निर्णीतं हरेर्नामानुकीर्त्तनम्॥” [अर्थात् “हे राजन्! जो इस संसारसे विरक्त होकर एकान्तिक भक्ति कर रहे हैं, जिनकी स्वर्ग अथवा मोक्षादिकी कामना है और जो आत्माराम योगी पुरुष हैं, उन सभीके लिये श्रीहरिके नाम और गुणोंका पुनः-