भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2129

112 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/66-70 ] [ बायाँ स्तम्भ / Left Column ] अनुवाद—नीचजातिमें जन्म लेनेवाला व्यक्ति कृष्णभजनके अयोग्य नहीं होता और सत्कुलमें उत्पन्न ब्राह्मण होनेसे ही कोई कृष्णभजनके योग्य नहीं बन जाता॥ 66 ॥ अनुभाष्य—(भाः 3/33/7)— “अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान्, यज्जिह्वाग्रे वर्त्तते नाम तुभ्यम्। तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या, ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते॥” [अर्थात् “हे भगवन्! जिनके मुखमें आपका नाम वर्तमान है, वे चण्डाल-कुलमें जन्म लेनेपर भी सर्वश्रेष्ठ हैं—उन्होंने समस्त प्रकारकी तपस्या की है, समस्त यज्ञ किये हैं, सभी तीर्थोंमें स्नान किया है, इसलिये उनकी गणना आर्योंमें होती है।”] (भाः 1/8/26)— “जन्मैश्वर्यश्रुतश्रीभिरेधमान-मदः पुमान्। नैवार्हत्यभिधातुं वै त्वामकिञ्चनगोचरम्॥” [अर्थात् “हे कृष्ण! सत्कुल, ऐश्वर्य, विद्या और रूपादिके द्वारा मदमत्त व्यक्ति निरभिमान और निष्काम भक्तोंके ग्रहण योग्य आपके ‘श्रीकृष्ण’ ‘गोविन्द’ आदि शुद्धनामोंका कीर्तन करनेमें निश्चय ही समर्थ नहीं होते।”] ॥ 66 ॥ येइ भजे, सेइ बड़, अभक्त—हीन छार। कृष्णभजने नाहि जाति-कुलादि-विचार॥ 67 ॥ अनुवाद—जो कृष्णका भजन करता है, वास्तवमें वही श्रेष्ठ है। अभक्त तो हीन और तिरस्कार योग्य है। कृष्णभजनमें जाति और कुल आदिका कोई भी विचार नहीं है॥ 67 ॥ प्राकृत जन्म, ऐश्वर्य, पाण्डित्य और सुन्दरता आदि दुःसङ्ग त्याग करके श्रीकृष्णमें सर्वस्व समर्पण करनेवाले एकान्तिक शरणागतकी ही भगवान्‌की कृपाको प्राप्त करनेकी योग्यता :— दीनेरे अधिक दया करे भगवान्। कुलीन, पण्डित, धनीर बड़ अभिमान॥ 68 ॥ [ दायाँ स्तम्भ / Right Column ] अनुवाद—भगवान् दीन व्यक्तिपर अधिक कृपा करते हैं, क्योंकि उच्च कुलमें जन्म लेनेवाले, विद्वान और धनी व्यक्तियोंमें बहुत अभिमान होता है॥ 68 ॥ श्रीमद्भागवत (7/9/10) में— विप्राद्द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ- पदारविन्दविमुखात् श्वपचं वरिष्ठम्। मन्ये तदर्पितमनोवचनेहितार्थ प्राणं पुनाति स कुलं न तु भूरिमानः॥ 69 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके चरणकमलोंसे विमुख बारह-गुणोंसे युक्त ब्राह्मणकी अपेक्षा भी जिसके मन, वचन, चेष्टा, अर्थ और प्राण श्रीकृष्णमें समर्पित हैं, ऐसे चण्डालको भी मैं श्रेष्ठ मानता हूँ; क्योंकि वह (चण्डाल कुलमें उत्पन्न भक्त) अपने कुलको पवित्र करता है, किन्तु अत्यधिक सम्मानसे युक्त ब्राह्मण वैसा नहीं कर सकता॥ 69 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 20/59 संख्या देखें॥ 69 ॥ अभिधेयसे ही सम्बन्ध और प्रयोजनकी प्राप्ति :— भजनेर मध्ये श्रेष्ठ नवविधा भक्ति। ‘कृष्णप्रेम’, ‘कृष्ण’ दिते धरे महाशक्ति॥ 70 ॥ अनुवाद—भजनके सभी अङ्गोंमें-से नवधा (नौ प्रकारकी) भक्ति श्रेष्ठ है, क्योंकि इसमें श्रीकृष्णप्रेम और श्रीकृष्णको प्रदान करनेकी महाशक्ति है॥ 70 ॥ अनुभाष्य—नवविधा भक्ति,—(भाः 7/5/23)— “श्रवणं कीर्त्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥” [अर्थात् “श्रीप्रह्लादजीने कहा—भगवान् विष्णुके नाम, रूप, गुण और परिकरोंकी लीलादिका श्रवण, उनका कीर्तन, उनका स्मरण करना, उनके ही चरणकमलोंकी सेवा-परिचर्या करना, षोडशोपचारके द्वारा उनका अर्चन करना, उनका दास बन जाना, उनके साथ सख्यभाव स्थापित करना और उनके चरणोंमें अपना सर्वस्व समर्पण कर देना—ये भक्तिकी नौ विधियाँ हैं।”]