भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2128, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2128

[ 4/63-66 चौथा अध्याय 111 [बायाँ स्तम्भ] अनुभाष्य—लोगोंके मुखसे श्रीकृष्णकी अनन्त सद्गुणावली श्रवण करके, भीष्मककी पुत्री श्रीरुक्मिणीके द्वारा [मनसे] उन्हें अपने पतिके रूपमें वरण करनेपर भी उनके बड़े भाई कृष्णद्वेषी रुक्मीने चेदिनरेश शिशुपालको ही उनके वरके रूपमें चुना है, ऐसा सुनकर [रुक्मिणीने] निर्जनमें एक प्रेमपत्र लिखकर एक विश्वसनीय ब्राह्मणको देकर तत्क्षणात् उसे श्रीकृष्णके पास भेजा। ब्राह्मण द्वारकामें उपस्थित होकर श्रीकृष्णके द्वारा यथाविधि सत्कार प्राप्त करनेके पश्चात् श्रीकृष्णकी अनुमतिसे रुक्मिणीके उस प्रेमपत्रको पढ़ने लगे— हे अम्बुजाक्ष (कमलनयन), आत्मनः (स्वस्य) तमः (अज्ञानम्) अपहत्यै (विनाशाय) उमापतिः (शिवः) इव महान्तः (ब्रह्मादयः) यस्य (भवतः) अङ्घ्रि-पङ्कजरजःस्नपनं (अङ्घ्रिपङ्कजस्य पादपद्मस्य रजोभिः स्नपनं) वाञ्छन्ति, तद्भवत्प्रसादं (तस्य भवतः अनुग्रहं) यर्हि अहं न लभेय (न प्राप्नुयां, तर्हि) व्रतकृशान् (व्रतैः उपवासादिभिः कृशान्) असून् (प्राणान्) जह्यां (त्यजेयम्,–एवमेव) शतजन्मभिः [अपि तव प्रसादः] स्यात्। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 63 ॥ श्रीकृष्णके प्रति रासोत्सुका गोपियोंके द्वारा अनुराग-निवेदन :- श्रीमद्भागवत (10/29/35) में— सिञ्चाङ्ग नस्त्वदधरामृतपूरकेण हासावलोक-कल-गीतज-हृच्छयाग्निम्। नो चेद्वयं विरहजाग्न्युपयुक्तदेहा ध्यानेन याम पदयोः पदवीं सखे ते ॥ 64 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 64 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे प्रिय, आपकी मन्द-मुस्कानके दर्शनसे और आपके [मुरलीके] कलगीतको श्रवण करके हमारी जिस कामाग्निने वृद्धि प्राप्त की है, उसे अपने अधरामृतके सञ्चारके द्वारा सिञ्चित करके शीतल करो; वैसा नहीं करनेसे हे सखे, हम तुम्हारे विरहसे उत्पन्न अग्निके द्वारा दग्ध देहसे [योगियोंके [दायाँ स्तम्भ] समान] ध्यानके द्वारा तुम्हारे चरणोंके सान्निध्यमें उपस्थित होंगी ॥ 64 ॥ अनुभाष्य—चाँदनीसे स्नान की हुई शारदीय रात्रिमें श्रीकृष्णकी वंशीकी ध्वनिसे सम्पूर्ण रूपमें आकृष्ट गोपवधुएँ आत्म-विस्मृत होकर श्रीकृष्णके समीप उपस्थित हुईं। श्रीकृष्णने उनके अनुरागको और भी वर्धित करनेके उद्देश्यसे उन्हें घरमें जानेके लिये कहा। तब कृष्णमें ही समर्पित प्राणवाली गोपियाँ दुःखित होकर रुद्धकण्ठसे गद्गद वचनोंके द्वारा श्रीकृष्णसे कह रही हैं— हे अङ्ग (कृष्ण,) त्वदधरामृतपूरकेण (तव ओष्ठसम्बन्धिना सुधाप्रवाहेण) नः (अस्माकं) हासावलोककलगीतजहृच्छयाग्निं (हाससहितेन अवलोकः च कलगीतं मधुरवंशीध्वनिः च ताभ्यां जातः यः हृदि शेते वसति हृच्छयः कामः सः एव अग्निः दाहकः तं) सिञ्च (निर्वापय); नोचेत् हे सखे, वयं विरहजाग्न्युपयुक्तदेहाः (विरहजेन विरहात् जनिष्यते यः अग्निः तेन उपयुक्तदेहाः दग्धशरीराः सत्यः योगिनः इव) ध्यानेन ते (तव) पदयोः पदवीम् (अन्तिकं) याम (प्राप्नुयाम्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 64 ॥ श्रीसनातनको उपलक्ष्य करके महाप्रभुके द्वारा अनर्थयुक्त साधकको निरन्तर हरिभजनकी शिक्षा प्रदान :- कुबुद्धि छाड़िया कर श्रवण-कीर्त्तन। अचिरात् पाबे तबे कृष्णप्रेम-धन ॥ 65 ॥ अनुवाद—कुबुद्धिका परित्याग करके श्रवण-कीर्त्तन करो, तब तुम अतिशीघ्र कृष्णप्रेमरूपी धनको प्राप्त करोगे ॥ 65 ॥ अनुभाष्य—'कुबुद्धि',— कृष्णसेवापरायण बुद्धिके अतिरिक्त नश्वर जड़ेन्द्रियकी तृप्तिके परायण असती बुद्धि ॥ 65 ॥ स्त्रीके सङ्गसे उत्पन्न शौक्र जन्मवादका खण्डन; कृष्णभजनमें योग्यताका निर्देश; शुद्धभक्त ही गुरु अथवा महत्तम :- नीचजाति नहे कृष्णभजने अयोग्य। सत्कुल-विप्र नहे भजनेर योग्य ॥ 66 ॥

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