भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2127

110 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/58-63 ] कृष्णभक्ति ही कृष्णप्रेमकी प्राप्तिका एकमात्र उपाय :- 'भक्ति' बिना कृष्णे कभु नहे 'प्रेमोदय'। प्रेम बिना कृष्णप्राप्ति अन्य हैते नय ॥ 58 ॥ अनुवाद-‘भक्ति’के बिना कृष्णके प्रति कभी भी 'प्रेमका उदय' नहीं हो सकता। प्रेमके बिना अन्य किसी उपायसे कृष्णकी प्राप्ति नहीं हो सकती ॥ 58 ॥ श्रीमद्भागवत (11/14/20) में- न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव। न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता ॥ 59 ॥ अनुवाद-हे उद्धव ! मेरे प्रति की गयी प्रबल भक्ति जिस प्रकार मुझे वशीभूत कर सकती है, अष्टाङ्ग-योग, अभेद-ब्रह्मवादरूप सांख्यज्ञान, ब्राह्मणोंका स्वशाखा- अध्ययनरूप स्वाध्याय, सब प्रकारकी तपस्या और त्यागरूप संन्यासादिके द्वारा मुझे वैसा वशीभूत नहीं किया जा सकता है ॥ 59 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 17/76 संख्या देखें ॥ 59 ॥ मनोधर्मी साधकके द्वारा भेदबुद्धिसे फल्गु-त्याग और ज्ञानकी चेष्टा-जड़ेन्द्रिय तृप्तिमयी, श्रीकृष्णप्रीति-तात्पर्यमयी नहीं होनेके कारण उसके द्वारा श्रीकृष्णप्राप्ति असम्भव :- देहत्यागादि तमो-धर्म-पातक-कारण। साधक ना पाय ता'ते कृष्णेर चरण ॥ 60 ॥ अनुवाद-आत्महत्या आदि तमोधर्मका पालन तो नरकमें गिरानेवाले पापका कारण बनता है, उससे साधकको कृष्णके चरणोंकी प्राप्ति नहीं होती ॥ 60 ॥ सिद्ध अनुरागी भक्तकी गाढ़-विप्रलम्भसे उत्पन्न देहत्यागकी इच्छा-सम्पूर्ण श्रीकृष्णकी इच्छासे चालित और श्रीकृष्ण- प्रीति चेष्टामयी, उससे ही उसे श्रीकृष्णकी प्राप्ति :- प्रेमी भक्त वियोगे चाहे देह छाड़िते। प्रेमे कृष्ण मिले, सेह ना पाय मरिते ॥ 61 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 61 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कृष्णके विच्छेदमें प्रेमिक-भक्त अपनी देहको त्याग करनेकी इच्छा करते हैं; उसी प्रेमके बलसे ही वे कृष्णको प्राप्त करते हैं, इसलिये वे देहत्याग नहीं कर पाते अर्थात् कृष्ण उन्हें मरने नहीं देते ॥ 61 ॥ गाढ़ानुरागेर वियोग ना याय सहन। ता'ते अनुरागी वाञ्छे आपन-मरण ॥ 62 ॥ अनुवाद-गाढ़ अनुराग होनेपर कृष्णका विरह सहन नहीं होता, इसलिये अनुरागी व्यक्ति अपनी मृत्युकी कामना करता है ॥ 62 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 12/31 संख्या देखें- “किन्तु अनुरागी लोकेर स्वभाव एक हय। इष्ट ना पाइले निजप्राणसे छोड़य॥” [अर्थात् “किन्तु अनुरागी व्यक्तियोंका यह स्वभाव होता है कि वे अपने इष्टको न पाकर अपने प्राणोंको त्याग देते हैं।"] ॥ 61-62 ॥ श्रीवासुदेवके प्रति रुक्मिणीके द्वारा अनुराग-निवेदन :- श्रीमद्भागवत (10/52/43) में- यस्याङ्घ्रिपङ्कजरजःस्नपनं महान्तो वाञ्छन्त्युमापतिरिवात्मतमोऽपहत्यै। यह्य॑म्बुजाक्ष न लभेय भवत्प्रसादं जह्यामसून् व्रतकृशाञ्छतजन्मभिः स्यात् ॥ 63 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 63 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे कमलनयन, अपने तमोगुणका विनाश करनेके लिये शिव जैसे महान व्यक्ति भी जिनके चरणकमलोंकी रजमें स्नान करनेकी इच्छा करते हैं, आपका वह प्रसाद यदि मुझे प्राप्त नहीं हुआ, तब फिर आपकी प्राप्तिके लिये व्रतसे दुर्बल होकर जीवन परित्याग करके सौ जन्मोंमें ऐसे ही व्रत करते हुए उसके बाद आपकी कृपाको प्राप्त कर ही लूँगी ॥ 63 ॥