श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 4/49-57 चौथा अध्याय 109 श्रीसनातन और श्रीहरिदासकी प्रशंसा करके महाप्रभुका आदेश :- कृष्णभक्तिरसे दुँहे परम प्रधान। कृष्णरस आस्वादन कर, लह कृष्णनाम॥"49॥ अनुवाद-तुम दोनों ही कृष्णभक्तिरसको जाननेमें परम प्रवीण हो। तुम दोनों कृष्णरसका आस्वादन करो और कृष्णनामका कीर्तन करो॥"49॥ महाप्रभुका प्रस्थान; दोनोंके लिये प्रसाद भेजना :- एत बलि' महाप्रभु उठिया चलिला। गोविन्द-द्वाराय दुँहे प्रसाद पाठाइला॥ 50॥ अनुवाद-यह कहकर महाप्रभु उठकर चल दिये और श्रीगोविन्दके द्वारा श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीसनातन गोस्वामीके लिये प्रसाद भिजवाया॥ 50॥ श्रीसनातनके द्वारा मन्दिरके चक्रको देखकर प्रणाम :- एइमत सनातन रहे प्रभुस्थाने। जगन्नाथेर चक्र देखि' करेन प्रणामे॥ 51॥ अनुवाद-इस प्रकार श्रीसनातन गोस्वामी महाप्रभुके आश्रयमें रहने लगे। वे श्रीजगन्नाथ मन्दिरके शिखरपर लगे चक्रको देखकर उसे प्रणाम करते॥ 51॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'चक्र' - नीलचक्र॥ 51॥ प्रतिदिन दोनोंके साथ महाप्रभुका साक्षात्कार और महाप्रसाद-प्रदान :- प्रभु आसि' प्रतिदिन मिलेन दुइजने। इष्टगोष्ठी, कृष्णकथा कहे कतक्षणे॥ 52॥ अनुवाद-महाप्रभु आकर प्रतिदिन श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीसनातन गोस्वामीसे मिलते और कुछ समय तक कृष्णकथारूपी इष्टगोष्ठी करते॥ 52॥ दिव्यप्रसाद पाञा नित्य जगन्नाथ-मन्दिरे। ताहा आनि' नित्य अवश्य देन दोंहाकारे॥ 53॥ अनुवाद-महाप्रभु प्रतिदिन श्रीजगन्नाथ मन्दिरसे दिव्य महाप्रसाद प्राप्त करते और अवश्य ही उसे श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीसनातन गोस्वामीको देते थे॥ 53॥ एकदिन अन्तर्यामी महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनके पूर्व-सङ्कल्पके विषयमें बतलाना :- एकदिन आसि' प्रभु दुँहारे मिलिला। सनातने आचम्बिते कहिते लागिला॥ 54॥ श्रीसनातनको उपलक्ष्य करके मनोधर्मके द्वारा चलनेवाले अनर्थयुक्त साधकको महाप्रभुके द्वारा शिक्षा प्रदान; फल्गु-ज्ञान और वैराग्य कृष्णप्राप्तिके उपाय नहीं :- “सनातन, देहत्यागे कृष्ण यदि पाइये। कोटि-देह क्षणेके तबे छाड़िते पारिये॥ 55॥ युक्त-वैराग्यके साथ शुद्धभक्ति ही कृष्णप्राप्तिका उपाय, अन्य कुछ नहीं :- देहत्यागे कृष्ण ना पाइ, पाइये भजने। कृष्णप्राप्त्येर उपाय कोन नाहि 'भक्ति' बिने॥ 56॥ अनुवाद-एकदिन महाप्रभु आकर उन दोनोंसे मिले। वे अचानक श्रीसनातन गोस्वामीसे कहने लगे,-'हे सनातन! देहत्याग करनेसे यदि कृष्ण प्राप्त होते हों, तो मैं एक क्षणमें ही करोड़ों शरीरोंको त्याग कर दूँ। केवल देहत्याग करनेसे कृष्ण प्राप्त नहीं हो सकते, वे तो भजनसे ही प्राप्त होते हैं। भक्तिके अतिरिक्त कृष्णको प्राप्त करनेका अन्य कोई उपाय नहीं है॥ 54-56॥ अप्राकृत विशुद्धसत्त्वमयी भक्तिमें ही श्रीकृष्णका वास, प्राकृत गुणमयी कर्म-ज्ञानकी चेष्टासे श्रीकृष्णकी प्राप्ति नहीं :- देहत्यागादि यत, सब-तमोधर्म। तमो-रजो-धर्मे कृष्णेर ना पाइये मर्म॥ 57॥ अनुवाद-आत्महत्याके द्वारा देहत्याग आदि जैसे जो कुछ कार्य हैं, वे सब तमोगुणी धर्मके अन्तर्गत हैं। तमोगुणी और रजोगुणी धर्मके द्वारा कृष्णके मर्मको नहीं जाना जा सकता॥ 57॥