श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें108 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/38–48 ] रघुनाथेर पादपद्म छाड़ान ना याय। छाड़िवार मन हैले प्राण फाटि' याय॥"42॥ अनुवाद—यह कहकर अनुपम रात्रिकालमें विचार करने लगा—'मैं भगवान् श्रीरघुनाथके चरणकमलोंका कैसे परित्याग करूँगा?' अनुपम उस रात सो नहीं सका और सारी रात रोते-रोते बितायी। प्रातःकालमें उसने हम दोनोंसे निवेदन किया,—'मैंने भगवान् श्रीरघुनाथके चरणकमलोंमें अपने मस्तकको बेच दिया है। मैं अपने मस्तकको वहाँसे उठा नहीं पा रहा हूँ। ऐसा करनेपर मुझे बहुत अधिक पीड़ा होगी। आप दोनों कृपा करके मुझे यही आज्ञा प्रदान कीजिये कि मैं जन्म-जन्मान्तर तक भगवान् श्रीरघुनाथके चरणकमलोंकी सेवा करूँ। श्रीरघुनाथके चरणकमलोंका परित्याग करना मेरे लिये सम्भव नहीं है। इस बातका विचार करनेसे ही मेरे प्राण फटकर निकलने लगते हैं॥"38-42॥ छोटे भाईको दोनों बड़े भाइयोंका आशीर्वाद :- तबे आमि-दुँहे तांरे आलिङ्गन कैलुँ। “साधु, दृढ़भक्ति तोमार”—कहि' प्रशंसिलुँ॥43॥ अनुवाद—तब हम दोनोंने अनुपमको आलिङ्गन किया और उसकी प्रशंसा करते हुए कहा,—“तुम्हारी श्रीरघुनाथके प्रति दृढ़भक्ति साधुवाद योग्य है॥"43॥ महाप्रभुकी कृपाके प्रति दृढ़ आस्था :- ये वंशेर उपरे तोमार हय कृपा-लेश। सकल मङ्गल ताहे, खण्डे सब क्लेश॥"44॥ अनुवाद-“हे महाप्रभो! जिस वंशके प्रति आपकी लेशमात्र भी कृपा होती है, वहाँ मङ्गल-ही-मङ्गल होता है और समस्त प्रकारके कष्ट दूर हो जाते हैं॥"44॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीमुरारिगुप्तकी रामनिष्ठाके दृष्टान्तका वर्णन :- गोसाञि कहेन,-“एइमत मुरारि-गुप्त। पूर्वे आमि परीक्षिलुं तांर एइ रीत॥45॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "मैंने भी इसी प्रकार पहले मुरारि-गुप्तकी परीक्षा ली थी, उसकी भी अनुपमकी भाँति श्रीरघुनाथके प्रति दृढ़भक्ति थी॥45॥ अनुभाष्य-इस प्रसङ्गमें मध्यलीला 15/137 से 157 संख्यामें वर्णित श्रीमुरारि गुप्तकी श्रीरामनिष्ठा विचारणीय है॥45॥ अमृतानुकणा-इस प्रसङ्गमें मध्यलीला 8/83 संख्या- "किन्तु याँर येइ रस, सेइ सर्वोत्तम। तटस्था हञा विचारिले, आछे तर-तम॥" यह पद्य और इसकी अनुभाष्य टीका विचारणीय है॥45॥ एकान्तिक भक्त और भगवान्, परस्परकी प्रीतिका वैशिष्ट्य :- सेइ भक्त धन्य, ये ना छाड़े प्रभुर चरण। सेइ प्रभु धन्य, ये ना छाड़े निज-जन॥46॥ अनुवाद-वही भक्त धन्य है जो अपने प्रभुके चरणोंको कभी भी नहीं छोड़ता और वही प्रभु धन्य हैं जो अपने सेवकको कभी नहीं त्यागते॥46॥ एकान्तिक भक्तवत्सल भगवान् :- दुर्दैवे सेवक यदि याय अन्यस्थाने। सेइ ठाकुर धन्य तांरे चुले धरि' आने॥47॥ अनुवाद-दुर्भाग्यसे यदि सेवक पतित होकर अन्य किसी स्थानपर चला जाता है, तो वही प्रभु धन्य हैं जो अपने उस सेवकको उसके केशोंसे पकड़कर पुनः खींचकर ले आते हैं॥47॥ श्रीसनातनको श्रीहरिदासके साथमें रहनेकी आज्ञा :- भाल हैल, तोमार इँहा हैल आगमने। एइ घरे रह इँहा हरिदास-सने॥48॥ अनुवाद-अच्छा ही हुआ जो तुम्हारा यहाँ आगमन हुआ है। तुम यहीं इसी घरमें हरिदास ठाकुरके साथ रहो॥48॥