श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
108 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/38–48 ] रघुनाथेर पादपद्म छाड़ान ना याय। छाड़िवार मन हैले प्राण फाटि' याय॥"42॥ अनुवाद—यह कहकर अनुपम रात्रिकालमें विचार करने लगा—'मैं भगवान् श्रीरघुनाथके चरणकमलोंका कैसे परित्याग करूँगा?' अनुपम उस रात सो नहीं सका और सारी रात रोते-रोते बितायी। प्रातःकालमें उसने हम दोनोंसे निवेदन किया,—'मैंने भगवान् श्रीरघुनाथके चरणकमलोंमें अपने मस्तकको बेच दिया है। मैं अपने मस्तकको वहाँसे उठा नहीं पा रहा हूँ। ऐसा करनेपर मुझे बहुत अधिक पीड़ा होगी। आप दोनों कृपा करके मुझे यही आज्ञा प्रदान कीजिये कि मैं जन्म-जन्मान्तर तक भगवान् श्रीरघुनाथके चरणकमलोंकी सेवा करूँ। श्रीरघुनाथके चरणकमलोंका परित्याग करना मेरे लिये सम्भव नहीं है। इस बातका विचार करनेसे ही मेरे प्राण फटकर निकलने लगते हैं॥"38-42॥ छोटे भाईको दोनों बड़े भाइयोंका आशीर्वाद :- तबे आमि-दुँहे तांरे आलिङ्गन कैलुँ। “साधु, दृढ़भक्ति तोमार”—कहि' प्रशंसिलुँ॥43॥ अनुवाद—तब हम दोनोंने अनुपमको आलिङ्गन किया और उसकी प्रशंसा करते हुए कहा,—“तुम्हारी श्रीरघुनाथके प्रति दृढ़भक्ति साधुवाद योग्य है॥"43॥ महाप्रभुकी कृपाके प्रति दृढ़ आस्था :- ये वंशेर उपरे तोमार हय कृपा-लेश। सकल मङ्गल ताहे, खण्डे सब क्लेश॥"44॥ अनुवाद-“हे महाप्रभो! जिस वंशके प्रति आपकी लेशमात्र भी कृपा होती है, वहाँ मङ्गल-ही-मङ्गल होता है और समस्त प्रकारके कष्ट दूर हो जाते हैं॥"44॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीमुरारिगुप्तकी रामनिष्ठाके दृष्टान्तका वर्णन :- गोसाञि कहेन,-“एइमत मुरारि-गुप्त। पूर्वे आमि परीक्षिलुं तांर एइ रीत॥45॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "मैंने भी इसी प्रकार पहले मुरारि-गुप्तकी परीक्षा ली थी, उसकी भी अनुपमकी भाँति श्रीरघुनाथके प्रति दृढ़भक्ति थी॥45॥ अनुभाष्य-इस प्रसङ्गमें मध्यलीला 15/137 से 157 संख्यामें वर्णित श्रीमुरारि गुप्तकी श्रीरामनिष्ठा विचारणीय है॥45॥ अमृतानुकणा-इस प्रसङ्गमें मध्यलीला 8/83 संख्या- "किन्तु याँर येइ रस, सेइ सर्वोत्तम। तटस्था हञा विचारिले, आछे तर-तम॥" यह पद्य और इसकी अनुभाष्य टीका विचारणीय है॥45॥ एकान्तिक भक्त और भगवान्, परस्परकी प्रीतिका वैशिष्ट्य :- सेइ भक्त धन्य, ये ना छाड़े प्रभुर चरण। सेइ प्रभु धन्य, ये ना छाड़े निज-जन॥46॥ अनुवाद-वही भक्त धन्य है जो अपने प्रभुके चरणोंको कभी भी नहीं छोड़ता और वही प्रभु धन्य हैं जो अपने सेवकको कभी नहीं त्यागते॥46॥ एकान्तिक भक्तवत्सल भगवान् :- दुर्दैवे सेवक यदि याय अन्यस्थाने। सेइ ठाकुर धन्य तांरे चुले धरि' आने॥47॥ अनुवाद-दुर्भाग्यसे यदि सेवक पतित होकर अन्य किसी स्थानपर चला जाता है, तो वही प्रभु धन्य हैं जो अपने उस सेवकको उसके केशोंसे पकड़कर पुनः खींचकर ले आते हैं॥47॥ श्रीसनातनको श्रीहरिदासके साथमें रहनेकी आज्ञा :- भाल हैल, तोमार इँहा हैल आगमने। एइ घरे रह इँहा हरिदास-सने॥48॥ अनुवाद-अच्छा ही हुआ जो तुम्हारा यहाँ आगमन हुआ है। तुम यहीं इसी घरमें हरिदास ठाकुरके साथ रहो॥48॥
[ 4/49-57 चौथा अध्याय 109 श्रीसनातन और श्रीहरिदासकी प्रशंसा करके महाप्रभुका आदेश :- कृष्णभक्तिरसे दुँहे परम प्रधान। कृष्णरस आस्वादन कर, लह कृष्णनाम॥"49॥ अनुवाद-तुम दोनों ही कृष्णभक्तिरसको जाननेमें परम प्रवीण हो। तुम दोनों कृष्णरसका आस्वादन करो और कृष्णनामका कीर्तन करो॥"49॥ महाप्रभुका प्रस्थान; दोनोंके लिये प्रसाद भेजना :- एत बलि' महाप्रभु उठिया चलिला। गोविन्द-द्वाराय दुँहे प्रसाद पाठाइला॥ 50॥ अनुवाद-यह कहकर महाप्रभु उठकर चल दिये और श्रीगोविन्दके द्वारा श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीसनातन गोस्वामीके लिये प्रसाद भिजवाया॥ 50॥ श्रीसनातनके द्वारा मन्दिरके चक्रको देखकर प्रणाम :- एइमत सनातन रहे प्रभुस्थाने। जगन्नाथेर चक्र देखि' करेन प्रणामे॥ 51॥ अनुवाद-इस प्रकार श्रीसनातन गोस्वामी महाप्रभुके आश्रयमें रहने लगे। वे श्रीजगन्नाथ मन्दिरके शिखरपर लगे चक्रको देखकर उसे प्रणाम करते॥ 51॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'चक्र' - नीलचक्र॥ 51॥ प्रतिदिन दोनोंके साथ महाप्रभुका साक्षात्कार और महाप्रसाद-प्रदान :- प्रभु आसि' प्रतिदिन मिलेन दुइजने। इष्टगोष्ठी, कृष्णकथा कहे कतक्षणे॥ 52॥ अनुवाद-महाप्रभु आकर प्रतिदिन श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीसनातन गोस्वामीसे मिलते और कुछ समय तक कृष्णकथारूपी इष्टगोष्ठी करते॥ 52॥ दिव्यप्रसाद पाञा नित्य जगन्नाथ-मन्दिरे। ताहा आनि' नित्य अवश्य देन दोंहाकारे॥ 53॥ अनुवाद-महाप्रभु प्रतिदिन श्रीजगन्नाथ मन्दिरसे दिव्य महाप्रसाद प्राप्त करते और अवश्य ही उसे श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीसनातन गोस्वामीको देते थे॥ 53॥ एकदिन अन्तर्यामी महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनके पूर्व-सङ्कल्पके विषयमें बतलाना :- एकदिन आसि' प्रभु दुँहारे मिलिला। सनातने आचम्बिते कहिते लागिला॥ 54॥ श्रीसनातनको उपलक्ष्य करके मनोधर्मके द्वारा चलनेवाले अनर्थयुक्त साधकको महाप्रभुके द्वारा शिक्षा प्रदान; फल्गु-ज्ञान और वैराग्य कृष्णप्राप्तिके उपाय नहीं :- “सनातन, देहत्यागे कृष्ण यदि पाइये। कोटि-देह क्षणेके तबे छाड़िते पारिये॥ 55॥ युक्त-वैराग्यके साथ शुद्धभक्ति ही कृष्णप्राप्तिका उपाय, अन्य कुछ नहीं :- देहत्यागे कृष्ण ना पाइ, पाइये भजने। कृष्णप्राप्त्येर उपाय कोन नाहि 'भक्ति' बिने॥ 56॥ अनुवाद-एकदिन महाप्रभु आकर उन दोनोंसे मिले। वे अचानक श्रीसनातन गोस्वामीसे कहने लगे,-'हे सनातन! देहत्याग करनेसे यदि कृष्ण प्राप्त होते हों, तो मैं एक क्षणमें ही करोड़ों शरीरोंको त्याग कर दूँ। केवल देहत्याग करनेसे कृष्ण प्राप्त नहीं हो सकते, वे तो भजनसे ही प्राप्त होते हैं। भक्तिके अतिरिक्त कृष्णको प्राप्त करनेका अन्य कोई उपाय नहीं है॥ 54-56॥ अप्राकृत विशुद्धसत्त्वमयी भक्तिमें ही श्रीकृष्णका वास, प्राकृत गुणमयी कर्म-ज्ञानकी चेष्टासे श्रीकृष्णकी प्राप्ति नहीं :- देहत्यागादि यत, सब-तमोधर्म। तमो-रजो-धर्मे कृष्णेर ना पाइये मर्म॥ 57॥ अनुवाद-आत्महत्याके द्वारा देहत्याग आदि जैसे जो कुछ कार्य हैं, वे सब तमोगुणी धर्मके अन्तर्गत हैं। तमोगुणी और रजोगुणी धर्मके द्वारा कृष्णके मर्मको नहीं जाना जा सकता॥ 57॥
110 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/58-63 ] कृष्णभक्ति ही कृष्णप्रेमकी प्राप्तिका एकमात्र उपाय :- 'भक्ति' बिना कृष्णे कभु नहे 'प्रेमोदय'। प्रेम बिना कृष्णप्राप्ति अन्य हैते नय ॥ 58 ॥ अनुवाद-‘भक्ति’के बिना कृष्णके प्रति कभी भी 'प्रेमका उदय' नहीं हो सकता। प्रेमके बिना अन्य किसी उपायसे कृष्णकी प्राप्ति नहीं हो सकती ॥ 58 ॥ श्रीमद्भागवत (11/14/20) में- न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव। न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता ॥ 59 ॥ अनुवाद-हे उद्धव ! मेरे प्रति की गयी प्रबल भक्ति जिस प्रकार मुझे वशीभूत कर सकती है, अष्टाङ्ग-योग, अभेद-ब्रह्मवादरूप सांख्यज्ञान, ब्राह्मणोंका स्वशाखा- अध्ययनरूप स्वाध्याय, सब प्रकारकी तपस्या और त्यागरूप संन्यासादिके द्वारा मुझे वैसा वशीभूत नहीं किया जा सकता है ॥ 59 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 17/76 संख्या देखें ॥ 59 ॥ मनोधर्मी साधकके द्वारा भेदबुद्धिसे फल्गु-त्याग और ज्ञानकी चेष्टा-जड़ेन्द्रिय तृप्तिमयी, श्रीकृष्णप्रीति-तात्पर्यमयी नहीं होनेके कारण उसके द्वारा श्रीकृष्णप्राप्ति असम्भव :- देहत्यागादि तमो-धर्म-पातक-कारण। साधक ना पाय ता'ते कृष्णेर चरण ॥ 60 ॥ अनुवाद-आत्महत्या आदि तमोधर्मका पालन तो नरकमें गिरानेवाले पापका कारण बनता है, उससे साधकको कृष्णके चरणोंकी प्राप्ति नहीं होती ॥ 60 ॥ सिद्ध अनुरागी भक्तकी गाढ़-विप्रलम्भसे उत्पन्न देहत्यागकी इच्छा-सम्पूर्ण श्रीकृष्णकी इच्छासे चालित और श्रीकृष्ण- प्रीति चेष्टामयी, उससे ही उसे श्रीकृष्णकी प्राप्ति :- प्रेमी भक्त वियोगे चाहे देह छाड़िते। प्रेमे कृष्ण मिले, सेह ना पाय मरिते ॥ 61 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 61 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कृष्णके विच्छेदमें प्रेमिक-भक्त अपनी देहको त्याग करनेकी इच्छा करते हैं; उसी प्रेमके बलसे ही वे कृष्णको प्राप्त करते हैं, इसलिये वे देहत्याग नहीं कर पाते अर्थात् कृष्ण उन्हें मरने नहीं देते ॥ 61 ॥ गाढ़ानुरागेर वियोग ना याय सहन। ता'ते अनुरागी वाञ्छे आपन-मरण ॥ 62 ॥ अनुवाद-गाढ़ अनुराग होनेपर कृष्णका विरह सहन नहीं होता, इसलिये अनुरागी व्यक्ति अपनी मृत्युकी कामना करता है ॥ 62 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 12/31 संख्या देखें- “किन्तु अनुरागी लोकेर स्वभाव एक हय। इष्ट ना पाइले निजप्राणसे छोड़य॥” [अर्थात् “किन्तु अनुरागी व्यक्तियोंका यह स्वभाव होता है कि वे अपने इष्टको न पाकर अपने प्राणोंको त्याग देते हैं।"] ॥ 61-62 ॥ श्रीवासुदेवके प्रति रुक्मिणीके द्वारा अनुराग-निवेदन :- श्रीमद्भागवत (10/52/43) में- यस्याङ्घ्रिपङ्कजरजःस्नपनं महान्तो वाञ्छन्त्युमापतिरिवात्मतमोऽपहत्यै। यह्य॑म्बुजाक्ष न लभेय भवत्प्रसादं जह्यामसून् व्रतकृशाञ्छतजन्मभिः स्यात् ॥ 63 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 63 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे कमलनयन, अपने तमोगुणका विनाश करनेके लिये शिव जैसे महान व्यक्ति भी जिनके चरणकमलोंकी रजमें स्नान करनेकी इच्छा करते हैं, आपका वह प्रसाद यदि मुझे प्राप्त नहीं हुआ, तब फिर आपकी प्राप्तिके लिये व्रतसे दुर्बल होकर जीवन परित्याग करके सौ जन्मोंमें ऐसे ही व्रत करते हुए उसके बाद आपकी कृपाको प्राप्त कर ही लूँगी ॥ 63 ॥
[ 4/63-66 चौथा अध्याय 111 [बायाँ स्तम्भ] अनुभाष्य—लोगोंके मुखसे श्रीकृष्णकी अनन्त सद्गुणावली श्रवण करके, भीष्मककी पुत्री श्रीरुक्मिणीके द्वारा [मनसे] उन्हें अपने पतिके रूपमें वरण करनेपर भी उनके बड़े भाई कृष्णद्वेषी रुक्मीने चेदिनरेश शिशुपालको ही उनके वरके रूपमें चुना है, ऐसा सुनकर [रुक्मिणीने] निर्जनमें एक प्रेमपत्र लिखकर एक विश्वसनीय ब्राह्मणको देकर तत्क्षणात् उसे श्रीकृष्णके पास भेजा। ब्राह्मण द्वारकामें उपस्थित होकर श्रीकृष्णके द्वारा यथाविधि सत्कार प्राप्त करनेके पश्चात् श्रीकृष्णकी अनुमतिसे रुक्मिणीके उस प्रेमपत्रको पढ़ने लगे— हे अम्बुजाक्ष (कमलनयन), आत्मनः (स्वस्य) तमः (अज्ञानम्) अपहत्यै (विनाशाय) उमापतिः (शिवः) इव महान्तः (ब्रह्मादयः) यस्य (भवतः) अङ्घ्रि-पङ्कजरजःस्नपनं (अङ्घ्रिपङ्कजस्य पादपद्मस्य रजोभिः स्नपनं) वाञ्छन्ति, तद्भवत्प्रसादं (तस्य भवतः अनुग्रहं) यर्हि अहं न लभेय (न प्राप्नुयां, तर्हि) व्रतकृशान् (व्रतैः उपवासादिभिः कृशान्) असून् (प्राणान्) जह्यां (त्यजेयम्,–एवमेव) शतजन्मभिः [अपि तव प्रसादः] स्यात्। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 63 ॥ श्रीकृष्णके प्रति रासोत्सुका गोपियोंके द्वारा अनुराग-निवेदन :- श्रीमद्भागवत (10/29/35) में— सिञ्चाङ्ग नस्त्वदधरामृतपूरकेण हासावलोक-कल-गीतज-हृच्छयाग्निम्। नो चेद्वयं विरहजाग्न्युपयुक्तदेहा ध्यानेन याम पदयोः पदवीं सखे ते ॥ 64 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 64 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे प्रिय, आपकी मन्द-मुस्कानके दर्शनसे और आपके [मुरलीके] कलगीतको श्रवण करके हमारी जिस कामाग्निने वृद्धि प्राप्त की है, उसे अपने अधरामृतके सञ्चारके द्वारा सिञ्चित करके शीतल करो; वैसा नहीं करनेसे हे सखे, हम तुम्हारे विरहसे उत्पन्न अग्निके द्वारा दग्ध देहसे [योगियोंके [दायाँ स्तम्भ] समान] ध्यानके द्वारा तुम्हारे चरणोंके सान्निध्यमें उपस्थित होंगी ॥ 64 ॥ अनुभाष्य—चाँदनीसे स्नान की हुई शारदीय रात्रिमें श्रीकृष्णकी वंशीकी ध्वनिसे सम्पूर्ण रूपमें आकृष्ट गोपवधुएँ आत्म-विस्मृत होकर श्रीकृष्णके समीप उपस्थित हुईं। श्रीकृष्णने उनके अनुरागको और भी वर्धित करनेके उद्देश्यसे उन्हें घरमें जानेके लिये कहा। तब कृष्णमें ही समर्पित प्राणवाली गोपियाँ दुःखित होकर रुद्धकण्ठसे गद्गद वचनोंके द्वारा श्रीकृष्णसे कह रही हैं— हे अङ्ग (कृष्ण,) त्वदधरामृतपूरकेण (तव ओष्ठसम्बन्धिना सुधाप्रवाहेण) नः (अस्माकं) हासावलोककलगीतजहृच्छयाग्निं (हाससहितेन अवलोकः च कलगीतं मधुरवंशीध्वनिः च ताभ्यां जातः यः हृदि शेते वसति हृच्छयः कामः सः एव अग्निः दाहकः तं) सिञ्च (निर्वापय); नोचेत् हे सखे, वयं विरहजाग्न्युपयुक्तदेहाः (विरहजेन विरहात् जनिष्यते यः अग्निः तेन उपयुक्तदेहाः दग्धशरीराः सत्यः योगिनः इव) ध्यानेन ते (तव) पदयोः पदवीम् (अन्तिकं) याम (प्राप्नुयाम्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 64 ॥ श्रीसनातनको उपलक्ष्य करके महाप्रभुके द्वारा अनर्थयुक्त साधकको निरन्तर हरिभजनकी शिक्षा प्रदान :- कुबुद्धि छाड़िया कर श्रवण-कीर्त्तन। अचिरात् पाबे तबे कृष्णप्रेम-धन ॥ 65 ॥ अनुवाद—कुबुद्धिका परित्याग करके श्रवण-कीर्त्तन करो, तब तुम अतिशीघ्र कृष्णप्रेमरूपी धनको प्राप्त करोगे ॥ 65 ॥ अनुभाष्य—'कुबुद्धि',— कृष्णसेवापरायण बुद्धिके अतिरिक्त नश्वर जड़ेन्द्रियकी तृप्तिके परायण असती बुद्धि ॥ 65 ॥ स्त्रीके सङ्गसे उत्पन्न शौक्र जन्मवादका खण्डन; कृष्णभजनमें योग्यताका निर्देश; शुद्धभक्त ही गुरु अथवा महत्तम :- नीचजाति नहे कृष्णभजने अयोग्य। सत्कुल-विप्र नहे भजनेर योग्य ॥ 66 ॥
112 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/66-70 ] [ बायाँ स्तम्भ / Left Column ] अनुवाद—नीचजातिमें जन्म लेनेवाला व्यक्ति कृष्णभजनके अयोग्य नहीं होता और सत्कुलमें उत्पन्न ब्राह्मण होनेसे ही कोई कृष्णभजनके योग्य नहीं बन जाता॥ 66 ॥ अनुभाष्य—(भाः 3/33/7)— “अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान्, यज्जिह्वाग्रे वर्त्तते नाम तुभ्यम्। तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या, ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते॥” [अर्थात् “हे भगवन्! जिनके मुखमें आपका नाम वर्तमान है, वे चण्डाल-कुलमें जन्म लेनेपर भी सर्वश्रेष्ठ हैं—उन्होंने समस्त प्रकारकी तपस्या की है, समस्त यज्ञ किये हैं, सभी तीर्थोंमें स्नान किया है, इसलिये उनकी गणना आर्योंमें होती है।”] (भाः 1/8/26)— “जन्मैश्वर्यश्रुतश्रीभिरेधमान-मदः पुमान्। नैवार्हत्यभिधातुं वै त्वामकिञ्चनगोचरम्॥” [अर्थात् “हे कृष्ण! सत्कुल, ऐश्वर्य, विद्या और रूपादिके द्वारा मदमत्त व्यक्ति निरभिमान और निष्काम भक्तोंके ग्रहण योग्य आपके ‘श्रीकृष्ण’ ‘गोविन्द’ आदि शुद्धनामोंका कीर्तन करनेमें निश्चय ही समर्थ नहीं होते।”] ॥ 66 ॥ येइ भजे, सेइ बड़, अभक्त—हीन छार। कृष्णभजने नाहि जाति-कुलादि-विचार॥ 67 ॥ अनुवाद—जो कृष्णका भजन करता है, वास्तवमें वही श्रेष्ठ है। अभक्त तो हीन और तिरस्कार योग्य है। कृष्णभजनमें जाति और कुल आदिका कोई भी विचार नहीं है॥ 67 ॥ प्राकृत जन्म, ऐश्वर्य, पाण्डित्य और सुन्दरता आदि दुःसङ्ग त्याग करके श्रीकृष्णमें सर्वस्व समर्पण करनेवाले एकान्तिक शरणागतकी ही भगवान्की कृपाको प्राप्त करनेकी योग्यता :— दीनेरे अधिक दया करे भगवान्। कुलीन, पण्डित, धनीर बड़ अभिमान॥ 68 ॥ [ दायाँ स्तम्भ / Right Column ] अनुवाद—भगवान् दीन व्यक्तिपर अधिक कृपा करते हैं, क्योंकि उच्च कुलमें जन्म लेनेवाले, विद्वान और धनी व्यक्तियोंमें बहुत अभिमान होता है॥ 68 ॥ श्रीमद्भागवत (7/9/10) में— विप्राद्द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ- पदारविन्दविमुखात् श्वपचं वरिष्ठम्। मन्ये तदर्पितमनोवचनेहितार्थ प्राणं पुनाति स कुलं न तु भूरिमानः॥ 69 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके चरणकमलोंसे विमुख बारह-गुणोंसे युक्त ब्राह्मणकी अपेक्षा भी जिसके मन, वचन, चेष्टा, अर्थ और प्राण श्रीकृष्णमें समर्पित हैं, ऐसे चण्डालको भी मैं श्रेष्ठ मानता हूँ; क्योंकि वह (चण्डाल कुलमें उत्पन्न भक्त) अपने कुलको पवित्र करता है, किन्तु अत्यधिक सम्मानसे युक्त ब्राह्मण वैसा नहीं कर सकता॥ 69 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 20/59 संख्या देखें॥ 69 ॥ अभिधेयसे ही सम्बन्ध और प्रयोजनकी प्राप्ति :— भजनेर मध्ये श्रेष्ठ नवविधा भक्ति। ‘कृष्णप्रेम’, ‘कृष्ण’ दिते धरे महाशक्ति॥ 70 ॥ अनुवाद—भजनके सभी अङ्गोंमें-से नवधा (नौ प्रकारकी) भक्ति श्रेष्ठ है, क्योंकि इसमें श्रीकृष्णप्रेम और श्रीकृष्णको प्रदान करनेकी महाशक्ति है॥ 70 ॥ अनुभाष्य—नवविधा भक्ति,—(भाः 7/5/23)— “श्रवणं कीर्त्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥” [अर्थात् “श्रीप्रह्लादजीने कहा—भगवान् विष्णुके नाम, रूप, गुण और परिकरोंकी लीलादिका श्रवण, उनका कीर्तन, उनका स्मरण करना, उनके ही चरणकमलोंकी सेवा-परिचर्या करना, षोडशोपचारके द्वारा उनका अर्चन करना, उनका दास बन जाना, उनके साथ सख्यभाव स्थापित करना और उनके चरणोंमें अपना सर्वस्व समर्पण कर देना—ये भक्तिकी नौ विधियाँ हैं।”]
[ 4/70-71 ] चौथा अध्याय 113
नवविधा-भक्ति (अभिधेय) ही श्रीकृष्णप्रेम (प्रयोजन) और श्रीकृष्ण (सम्बन्ध)को प्रदान करनेकी महाशक्तिको धारण करती है। साधनभक्ति ही अभिधेयरूपमें प्रकट होकर बादमें प्रेमभक्तिके स्वरूपको प्राप्त करती है। प्रयोजनरूपी श्रीकृष्णप्रेम ही सम्पूर्णरूपसे श्रीकृष्णको प्रदान करता है॥70॥
दस अपराधोंसे रहित होकर निरन्तर विश्रामरहित कृष्णकीर्तनके फलसे कृष्णप्रेमकी प्राप्ति :- ता॑र मध्ये सर्वश्रेष्ठ नाम-सङ्कीर्त्तन। निरपराधे नाम लैले पाय प्रेमधन॥71॥
अनुवाद—नवधा-भक्तिके अङ्गोंमें-से नाम-सङ्कीर्त्तन ही सर्वश्रेष्ठ है। निरपराध होकर भगवन्नाम-कीर्त्तन करनेसे श्रीकृष्णप्रेमधनकी प्राप्ति होती है॥71॥
अनुभाष्य—श्रीजीवगोस्वामि प्रभु (भक्तिसन्दर्भकी 270 संख्यामें),— “इयञ्च कीर्त्तनाख्या भक्तिर्भगवतो द्रव्यजातिगुणक्रियाभिर्दीन- जनैकविषयापारकरुणामयीति श्रुतिपुराणादिविश्रुतिः। xx अतएव कलौ स्वभावत एवातिदीनेषु लोकेषु आविर्भूय ताननायासेनेव तत्तद्युगगत-महासाधनानां सर्वमेव फलं ददाना सा कृतार्थयति। अतएव तयैव कलौ भगवतो विशेषतश्च सन्तोषो भवति॥” (273 संख्यामें)— “अतएव यद्यन्यापि भक्तिः कलौ कर्त्तव्या, तदा तत्संयोगेनैव॥” [अर्थात् “जो द्रव्य, जाति, गुण और क्रियाके विषयमें दीन हैं अर्थात् जिनके पास उत्तम द्रव्य (धन), जाति, गुण और क्रिया नहीं हैं, उनके एकमात्र (कल्याणकारी) विषय रूपमें ही अपार करुणामयी यह भगवान्की नाम-रूप-गुणकी कीर्त्तनाख्या (कीर्त्तन-नामक) भक्ति है,—यह श्रुति-पुराणादि शास्त्रोंमें प्रसिद्ध है। इसलिये कलियुगमें स्वभावतः अतिदीन मानवोंमें आविर्भूत हुई यह कीर्त्तनाख्या भक्ति अनायास ही उन्हें अन्यान्य युगोंके अन्तर्गत महासाधनसमूहके सभी फल ही प्रदान करके कृतार्थ करती है—क्योंकि उसके द्वारा भगवान् विशेषरूपसे सन्तुष्ट होते हैं। इसलिये कलियुगमें यद्यपि अन्यान्य भक्तिके अनुष्ठान कर्त्तव्य हैं, किन्तु उन्हें कीर्त्तनाख्या भक्तिके संयोगसे ही करना होगा।”]
श्रीरूपप्रभु (नामाष्टकके प्रथम श्लोकमें),— “निखिलश्रुतिमौलिरत्नमालाद्युतिनीराजित पादपङ्कजान्त। अयि मुक्तकुलैरूपास्यमानं परितस्त्वां हरिनाम संश्रयामि॥” [अर्थात् “हे हरिनाम! मैं, आपका सर्वतोभावसे आश्रय ग्रहण करता हूँ, क्योंकि आपका महत्त्व विचित्र है। देखो, समस्त श्रुतियोंकी मुकुटमणिरूप उपनिषद्स्वरूप रत्नोंकी मालाकी चमचमाती हुई कान्तिके द्वारा, आपके चरणकमलोंके अन्तभागकी अर्थात् नखोंकी आरती उतारी जाती है और मुक्तमुनिगण भी आपकी उपासना करते रहते हैं।”]
श्रीसनातन प्रभु (बृहद्भागवतामृतके प्रथम खण्ड प्रथम अध्यायके नौवें श्लोकमें)— “जयति जयति नामानन्दरूपं मुरारे- र्विरमितनिजधर्मध्यानपूजादियत्नम्। कथमपि सकृदात्तं मुक्तिदं प्राणिनां यत् परमममृतमेकं जीवनं भूषणं मे॥” [अर्थात् “जो वर्णाश्रमधर्म, ध्यान और पूजादिसे छुटकारा देनेवाले हैं अर्थात् जो वर्णाश्रमधर्मके अनुष्ठान, ध्यान-परायण व्यक्तियोंका मनोनिग्रह तथा पूजा-निष्ठित व्यक्तियोंके पूजाके उपकरण संग्रह आदि दुःखोंका निवारण करते हैं; जो किसी प्रकार एकबार मात्र गृहीत होनेपर प्राणीमात्रको मुक्ति प्रदान करते हैं, जो मेरे (ग्रन्थकारके) एकमात्र परम अमृतस्वरूप-जीवनस्वरूप- भूषणस्वरूप हैं, वे आनन्दमय श्रीहरिनाम सभी प्रकारसे जययुक्त हों, जययुक्त हों।”]
(भाः 2/1/11)— “एतन्निर्विद्यमानानामिच्छतामकुतोभयम्। योगिनां नृप निर्णीतं हरेर्नामानुकीर्त्तनम्॥” [अर्थात् “हे राजन्! जो इस संसारसे विरक्त होकर एकान्तिक भक्ति कर रहे हैं, जिनकी स्वर्ग अथवा मोक्षादिकी कामना है और जो आत्माराम योगी पुरुष हैं, उन सभीके लिये श्रीहरिके नाम और गुणोंका पुनः-
114 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/71-78 ] पुनः श्रवण, कीर्तन और स्मरण ही परम साधन और साध्यके रूपमें पूर्व-पूर्व आचार्योंके द्वारा निर्णीत हुआ है।"] (भाः 6/3/22)— “एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसां धर्मः परः स्मृतः। भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभिः॥” [अर्थात् “श्रीभगवान् वासुदेवका जो नामसङ्कीर्तन आदि भक्तियोग है, इस जगत्में जीवोंके लिये बस वही परम धर्म कहा गया है।"] श्रीगौरहरिके (स्वकृत शिक्षाष्टकके तृतीय श्लोकमें)— “तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः॥” [अर्थात् “जो अपनेको तृणसे भी छोटा मानते हैं, जो वृक्षके समान सहनशील हैं, अपने लिये मानशून्य हैं और दूसरोंको सम्मान प्रदान करते हैं, वे ही सदा हरिकीर्तन करनेके अधिकारी हैं।"] 'निरपराधे' अर्थात् दस नामापराधोंसे रहित निरन्तर अथवा विश्रामरहित नामसेवामें रत होकर। 'दस नामापराध', - आदिलीला 8/24 संख्याका अमृतप्रवाह भाष्य और अनुभाष्य देखें ॥ 71 ॥ महाप्रभुके अभिप्रायके अनुसार श्रीसनातनके द्वारा फल्गु देहत्यागकी इच्छाको परित्याग करनेरूपी लीलाके अभिनयके द्वारा जीवोंको शिक्षा प्रदान :- एत शुनि' सनातनेर हैल चमत्कार। 'प्रभुरे ना भाय मोर मरण-विचार ॥ 72 ॥ सर्वज्ञ महाप्रभु निषेधिला मोरे।' प्रभुर चरण धरि' कहेन ताँहारे ॥ 73 ॥ निष्किञ्चन वैष्णवाचार्य श्रीसनातनकी दैन्योक्ति, महाप्रभुकी स्तुति और अपने दैहिक कर्त्तव्यकी जिज्ञासा :- “सर्वज्ञ, कृपालु तुमि - ईश्वर स्वतन्त्र। यैछे नाचाओ, तैछे नाचि, -येन काष्ठयन्त्र ॥ 74 ॥ नीच, अधम, पामर मुञि पामर-स्वभाव। मोरे जियाइले तोमार किबा हबे लाभ ? ?"75 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके वचनोंको सुनकर श्रीसनातन गोस्वामी आश्चर्यचकित हो गये। श्रीसनातन गोस्वामी समझ गये कि 'मेरे आत्महत्या करनेके विचारमें महाप्रभुका अनुमोदन नहीं है और सर्वज्ञ महाप्रभुने मुझे इसके लिये निषेध किया है।' श्रीसनातन गोस्वामीने महाप्रभुके चरणोंको पकड़कर उनसे कहा, – “आप सर्वज्ञ, कृपालु और स्वतन्त्र ईश्वर हैं। मैं तो काठसे बने यन्त्रके समान हूँ, आप मुझे जैसे नचाते हो, मैं वैसे ही नाचता हूँ। मैं नीच, अधम, पापी हूँ और मेरा स्वभाव भी पापी व्यक्तिवाला है। तो फिर मुझे जीवित रखनेसे आपको क्या लाभ होगा?"72-75 ॥ अनुभाष्य—'ना भाय',—'योग्य' कहलानेका बोध नहीं होता ॥ 72 ॥ महाप्रभुका उत्तर; श्रीसनातनका काय-मन-वाक्यादि सर्वस्व ही श्रीगौर-कृष्णके द्वारा आत्मसात्, उसके द्वारा ही श्रीगौर-कृष्णके द्वारा अपना सेवा-कार्य-साधन :- प्रभु कहे, - "तोमार देह मोर निज-धन। तुमि मोरे करियाछ आत्मसमर्पण ॥ 76 ॥ दीक्षासिद्ध भक्तोंके लिये श्रीकृष्णकी इच्छाको ही अपनी परिचालिका मानकर उसके आनुगत्यमें अपने कर्त्ता होनेके अभिमान अथवा अहङ्कारके त्यागकी कर्त्तव्यता :- परेर द्रव्य तुमि केने चाह विनाशिते ? धर्माधर्म-विचार किबा ना पार करिते ? ? 77 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, – “तुम्हारी देह मेरी अपनी सम्पत्ति है। तुमने इसे मुझे आत्म-समर्पण किया है। तुम किसी दूसरेकी वस्तुको विनष्ट क्यों करना चाहते हो? धर्म-अधर्मका विचार क्यों नहीं करते हो? 76-77 ॥ सनातन भगवान् श्रीकृष्ण-चैतन्यके अभिन्न प्रकाश-विग्रह चिद्विलास श्रीसनातन प्रभु :- तोमार शरीर- मोर प्रधान 'साधन'। ए शरीरे साधिमु आमि बहु प्रयोजन ॥ 78 ॥ अनुवाद—तुम्हारा शरीर मेरे मनोभीष्टकी पूर्तिके लिये प्रधान साधन है। तुम्हारे इस शरीरके द्वारा मैं
[ 4/78-86 चौथा अध्याय 115 अपने बहुतसे प्रयोजन सिद्ध करूँगा ॥ 78 ॥ मथुरामण्डलमें श्रीसनातनके माध्यमसे महाप्रभुके द्वारा (1) भक्त और भगवद्-तत्त्व अथवा अभिधेय, सम्बन्ध और प्रयोजन-तत्त्वका प्रकाश, (2) वैष्णव-स्मृति- सङ्कलनके द्वारा वैष्णव-सदाचार-प्रवर्त्तन, (3) मठ- मन्दिरादिमें श्रीकृष्णविग्रह अर्चनरूपी वैधीभक्ति, मनमें राग अथवा प्रेमसेवाके आदर्शका प्रदर्शन और (4) लुप्त-तीर्थोंका उद्धार और युक्तवैराग्यके साथ शुद्धभक्तिमय जीवन दिखलाकर शिक्षा :- भक्त-भक्ति-कृष्णप्रेम-तत्त्वेर निर्धार। वैष्णवेर कृत्य आर वैष्णव-आचार ॥ 79 ॥ कृष्णभक्ति, कृष्णप्रेमसेवा-प्रवर्त्तन। लुप्ततीर्थ-उद्धार आर वैराग्य-शिक्षण ॥ 80 ॥ निज-प्रियस्थान मोर-मथुरा-वृन्दावन। ताँहा एत धर्म चाहि करिते प्रचारण ॥ 81 ॥ अनुवाद—"मैं भक्त, भक्ति और कृष्णप्रेम-तत्त्वका निर्धारण, वैष्णवोंके कृत्य तथा वैष्णव-आचार, कृष्णभक्ति, कृष्णकी प्रेमपूर्वककी जानेवाली सेवाका प्रवर्त्तन, लुप्त तीर्थोंका उद्धार एवं वैराग्यकी शिक्षा—इन सभी तत्त्वोंका अपने प्रिय स्थान मथुरा-वृन्दावनमें प्रचार करना चाहता हूँ॥ 79-81 ॥ अनुभाष्य—श्रीमहाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीके द्वारा सर्वप्रथम श्रीबृहद्भागवतामृतकी रचना करवाकर भक्त-भक्ति- कृष्णप्रेमतत्त्वको निर्धारित किया है; दूसरा, श्रीहरिभक्तिविलास संग्रह करवाकर वैष्णवोंके कृत्य और वैष्णवोंके आचारको निर्धारित किया है; तीसरा, श्रीसनातन गोस्वामीके अद्भुत अनुष्ठानके द्वारा श्रीवृन्दावनमें श्रीविग्रहोंकी सेवा एवं आदर्श भजनानन्दमय चरित्रके द्वारा मानसमें व्रज-भजनका प्रवर्त्तन करवाया है; चौथा, कुण्डादि लुप्त तीर्थसमूहका उद्धार एवं उनके वैराग्ययुक्त भक्तिरसमय आदर्श भक्तजीवनके द्वारा शुद्धभक्तोंके अनुकरणीय विषयोंसे सुदूर अवस्थित विरक्त जीवन-यापनकी शिक्षा दी है। श्रीमथुरा और वृन्दावन श्रीगौरसुन्दरकी अत्यन्त प्रियभूमि है, श्रीसनातनको उस भूमिमें अवस्थान कराकर महाप्रभुने उनके द्वारा पूर्वोक्त धर्मसमूहका प्रचार करनेकी अभिलाषा की॥ 79-81 ॥ माताकी आज्ञासे स्वयं क्षेत्रमण्डलमें रहकर अपने अभिन्न प्रकाश-विग्रह चिद्विलास श्रीसनातनके रूपमें मथुरामण्डलमें पूर्वोक्त चार प्रकारकी मनोऽभीष्ट कृष्णसेवाका सम्पादन :- मातार आज्ञाय आमि बसि नीलाचले। ताँहा 'धर्म' शिखाइते नाहि निज-बले ॥ 82 ॥ अनुवाद—मैं माताकी आज्ञासे इस जगन्नाथपुरीमें रह रहा हूँ। इसलिये मैं मथुरा-वृन्दावनमें जाकर वहाँके लोगोंको धाममें रहकर प्रेमधर्मका पालन कैसे किया जाय, यह नहीं सिखा सकता ॥ 82 ॥ अनुभाष्य— 'ताँहा',—मथुरामण्डलमें ॥ 82 ॥ एत सब कर्म आमि ये-देहे करिमु। ताहा छाड़िते चाह तुमि, केमने सहिमु ? ?”83 ॥ अनुवाद—इन सब कार्योंको मैं जिस देहके द्वारा करना चाहता हूँ, तुम मेरी उसी देहको त्यागना चाहते हो। मैं इसे कैसे सहन कर सकता हूँ?”83 ॥ श्रीसनातनके द्वारा स्वयंको यन्त्रके रूपमें और महाप्रभुको यन्त्री जानकर महाप्रभुकी स्तुति :- तबे सनातन कहे,–“तोमाके नमस्कारे। तोमार गम्भीर हृदय के बुझिते पारे ? ?84 ॥ काष्ठेर पुतली येन कुहके नाचाय। आपने ना जाने, पुतली किबा नाचे गाय ! !85 ॥ यारे यैछे नाचाओ, से तैछे करे नर्त्तने। कैछे नाचे, केबा नाचाय, सेह नाहि जाने ॥”86 ॥ अनुवाद—तब श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,—“मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आपके हृदयके गम्भीर भावोंको कौन समझ सकता है? मदारी जैसे काठकी पुतलीको नचाता है, तो पुतली स्वयं यह नहीं जानती
116 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/84-95 ] कि वह कैसे नाचती-गाती है! उसी प्रकार आप जिसे जैसे नचाते हैं, वह वैसे ही नृत्य करता है। किन्तु वह कैसे नाचता है, उसे कौन नचाता है, वह इस बातको नहीं जानता॥"84-86॥ श्रीहरिदासको साक्षी मानकर महाप्रभुके द्वारा उनपर अपने निजी कहकर स्वीकार किये गये श्रीसनातनकी देहके रक्षणका भार-अर्पण :- हरिदासे कहे प्रभु,—"शुन, हरिदास। परेरे द्रव्य इँहो चाहेन करिते विनाश॥ 87 ॥ परेरे स्थाप्य द्रव्य केह ना खाय, बिलाय। निषेधिह इँहारे,—येन ना करे अन्याय॥"88॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीहरिदास ठाकुरसे कहा,—"हे हरिदास, सुनो! यह सनातन दूसरेकी वस्तुको विनष्ट करना चाहता है। किसी दूसरेकी धरोहरको न तो स्वयं ही भोग करना चाहिये और न ही बाँटना चाहिये। इसलिये इसे ऐसे अन्यायपूर्ण कार्य करनेसे आप निषेध करना॥"87-88॥ अनुभाष्य—'स्थाप्य',—रक्षणीय; 'खाय',—स्वयं ही भोग करे; 'बिलाय',—वितरण करे, 'अन्याय'—मुझमें अर्थात् कृष्णमें समर्पित इसकी देहका विनाश॥ 88॥ श्रीहरिदासके द्वारा जीवोंको शिक्षा,—अधोक्षज महाप्रभुकी अप्राकृत हृदयगत कृष्णेन्द्रिय-तर्पण-इच्छाके आनुगत्यमें ही बद्धजीवके द्वारा फल्गु-अहङ्कारत्यागकी कर्त्तव्यता :- हरिदास कहे,—"मिथ्या अभिमान करि। तोमार गम्भीर हृदय बुझिते ना पारि॥ 89 ॥ कोन् कोन् कार्य तुमि कर कोन् द्वारे। तुमि ना जानाइले केह जानिते ना पारे॥ 90 ॥ श्रीहरिदासके द्वारा श्रीसनातनके महाप्रभु-कृपा-प्राप्ति रूपी सौभाग्यका वर्णन करके महाप्रभुकी स्तुति :- एतादृश तुमि इँहारे करियाछ अङ्गीकार। एत सौभाग्य इँहा ना हय काहार॥"91॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—"हम तो मिथ्या अभिमान करते हैं। वास्तवमें हम आपके हृदयके गम्भीर भावोंको नहीं समझ सकते। कौन-कौनसे कार्य आप किसके द्वारा करते हैं, उसे आपके द्वारा जनाये बिना कोई नहीं जान सकता। ऐसे गम्भीर हृदयवाले आपने इनको (श्रीसनातनको) अङ्गीकार किया है, इसलिये इनका जितना सौभाग्य है, उतना सौभाग्य अन्य किसीका भी नहीं है॥"89-91॥ दोनोंको आलिङ्गन करनेके बाद महाप्रभुका प्रस्थान :- तबे महाप्रभु करि' दुँहारे आलिङ्गन। 'मध्याह्न' करिते उठि' करिला गमन॥ 92 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीसनातनको आलिङ्गन किया और अपने मध्याह्न-कृत्य करनेके लिये उठकर चल दिये॥ 92 ॥ श्रीहरिदासके द्वारा श्रीसनातनके सौभाग्यका वर्णन :- सनातने कहे हरिदास करि' आलिङ्गन। "तोमार भागयेर सीमा ना याय कथन॥ 93 ॥ श्रीसनातनकी देह महाप्रभुका ही अपना कहकर स्वीकार किया गया धन :- तोमार देह कहेन प्रभु 'मोर निज-धन'। तोमा-सम भाग्यवान् नाहि कोन जन॥ 94 ॥ मथुरामण्डलमें श्रीसनातनकी देहके द्वारा महाप्रभुके चार प्रकारके मनोऽभीष्ट-सम्पादन :- निज-देहे ये कार्य ना पारेन करिते। से कार्य कराइबे तोमा, सेह मथुराते॥ 95 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने श्रीसनातन गोस्वामीको आलिङ्गन करते हुए कहा,—"तुम्हारे भाग्यकी सीमाका वर्णन नहीं किया जा सकता। तुम्हारे शरीरको महाप्रभु 'मेरी निजी-सम्पत्ति' कहते हैं। तुम्हारे समान भाग्यवान् अन्य कोई व्यक्ति नहीं है। महाप्रभु अपनी देहके द्वारा जिन कार्योंको नहीं कर पा रहे, वे कार्य तुम्हारे द्वारा करवायेंगे और इन कार्योंको वे मथुरामें करवायेंगे॥ 93-95॥
[ 4/95-103 चौथा अध्याय 117 अनुभाष्य-पूर्वोक्त (इसी अध्यायकी) 82-83 संख्याकी उक्तिके तात्पर्यके लिये 79-81 संख्या देखें ॥95॥ सफलता अथवा सिद्धि-श्रीकृष्णकी इच्छाकी अनुगामी दासी :- ये कराइते चाहे ईश्वर, सेइ सिद्ध हय। तोमार सौभाग्य एइ कहिलुँ निश्चय ॥96॥ श्रीसनातनके माध्यमसे महाप्रभुके द्वारा मुख्यतः शुद्धभक्ति और वैष्णव स्मृतिके सङ्कलनके द्वारा वैष्णव-आचारका संस्थापन :- भक्तिसिद्धान्त, शास्त्र-आचार-निर्णय। तोमाद्वारे कराइबेन, बुझिलुँ आशय ॥97॥ श्रीहरिदासका स्वाभाविक वैष्णवोचित दैन्य और हृदयकी व्यथाको बतलाना :- आमार एइ देह प्रभुर कार्ये ना लागिल। भारत-भूमिते जन्मि' एइ देह व्यर्थ हैल॥"98॥ अनुवाद-भगवान् जो भी कार्य करवाना चाहते हैं, वह कार्य अवश्य ही सिद्ध होता है। यह तुम्हारा सौभाग्य ही है, मैं इस बातको निश्चित रूपसे कह रहा हूँ। मुझे महाप्रभुके कहनेका यही आशय समझ आता है कि वे भक्ति-सिद्धान्त और शास्त्रीय-आचरणके निर्णयको तुम्हारे द्वारा प्रकाशित करवाना चाहते हैं। मेरा यह शरीर महाप्रभुके किसी भी कार्यमें नहीं लग सका, इसलिये भारत-भूमिमें जन्म ग्रहण करनेपर भी मेरा यह शरीर धारण करना व्यर्थ हो गया है॥"96-98॥ अनुभाष्य-'भारत-भूमिते,'-आदिलीला 9/41 संख्या और भाः 5/19/19-27 श्लोक देखें ॥98॥ श्रीसनातनके द्वारा श्रीहरिदासकी स्तुति :- सनातन कहे,-"तोमा-सम केबा आछे आन? महाप्रभुर गणे तुमि-महाभाग्यवान् ! ॥99॥ अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,-"हे श्रीहरिदास ठाकुर ! आपके समान अन्य कौन है? आप महाप्रभुके गणोंमें-से एक हैं, इसलिये आप महाभाग्यवान् हैं !99॥ शुद्धकृष्णनाम कीर्तन अथवा प्रचार ही आचार्यरूपी भगवदवतारका अपना कार्य, कीर्तन-आचार्य श्रीहरिदासके द्वारा महाप्रभुका नामका प्रचार :- अवतार-कार्य प्रभुर-नाम-प्रचारे। सेइ निज-कार्य प्रभु करेन तोमार द्वारे ॥100॥ अनुवाद-महाप्रभुके अवतरित होनेका मुख्य कार्य नामका प्रचार ही है, अपना वही कार्य महाप्रभु आपके द्वारा ही करवा रहे हैं॥100॥ अनुभाष्य-निजकार्य जो शुद्धकृष्णनामका प्रचार है, उसे महाप्रभुने श्रीहरिदासके द्वारा सम्पादित किया ॥100॥ ठाकुर श्रीहरिदासका आचार और प्रचार :- प्रत्यह कर तिन लक्ष नाम-सङ्कीर्त्तन। सबार आगे कर नामेर महिमा कथन ॥101॥ अनुवाद-आप प्रतिदिन तीन लाख नाम-सङ्कीर्तन करते हैं और सभीको नामकी महिमा बतलाते हैं॥101॥ असुष्ठु अथवा असम्पूर्ण आचार-प्रचार :- आपने आचरे केह, ना करे प्रचार। प्रचार करेन केह, ना करेन आचार ॥102॥ अनुवाद-कई व्यक्ति स्वयं तो आचरण करते हैं, किन्तु प्रचार नहीं करते। अन्य कई व्यक्ति प्रचार तो करते हैं, किन्तु आचरण नहीं करते॥102॥ कृष्णेन्द्रिय प्रीतियुक्त चेष्टामय यथार्थ आचार्यका ही शुद्धनाम-भक्ति प्रचारमें अधिकार; चारों प्रकारके वर्णाश्रमके व्यक्ति तथा जगत्के गुरु वैष्णवाचार्य परमहंस श्रीहरिदास ठाकुरका आदर्श जीवन :- 'आचार', 'प्रचार'-नामेर करह 'दुइ' कार्य। तुमि-सर्वगुरु, तुमि-जगतेर आर्य ॥"103॥ अनुवाद-आप नामका 'आचार' और 'प्रचार'-इन दोनों कार्योंको करते हैं। आप सभीके गुरु तथा जगत्के आर्य अर्थात् श्रेष्ठ भक्त हैं॥"103॥ अनुभाष्य-श्रीहरिदास ठाकुर-सर्वमान्य जगद्गुरु
118 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/103-112 ] हैं, क्योंकि वे एक ही साथ स्वयं दीक्षित ब्राह्मणके रूपमें शुद्धनाम ग्रहण करके 'आचार्य' और उच्चकीर्तन करके समस्त जगतवासियोंको नाम-यज्ञमें दीक्षित करवाकर 'प्रचारक' हैं—यही उनका 'आचार और प्रचार' है॥ 103 ॥ श्रीहरिदास और श्रीसनातनका परस्पर कृष्णकथाकी चर्चामें समय व्यतीत करना :- एइमत दुइजन नाना-कथा-रङ्गे। कृष्णकथा आस्वाद्य रहिं एकसङ्गे ॥ 104 ॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीसनातन गोस्वामी एकसाथ रहकर अनेक प्रकारकी कृष्णकथाके आनन्दका आस्वादन करते ॥ 104 ॥ रथयात्राके समय गौड़ीय भक्तोंका पुरीमें आगमन और दर्शन :- यात्राकाले आइला सब गौड़ेर भक्तगण। पूर्ववत् कैला सबे रथयात्रा दरशन ॥ 105 ॥ अनुवाद—रथयात्राके समय गौड़देशके समस्त भक्त आये तथा पूर्व-पूर्व वर्षोंकी भाँति सभीने रथयात्राके दर्शन किये ॥ 105 ॥ रथके आगे महाप्रभुके नृत्यको देखकर श्रीसनातनका विस्मय :- रथ-अग्रे प्रभु तैछे करिला नर्त्तन। देखिं चमत्कार हैल सनातनेर मन ॥ 106 ॥ अनुवाद—रथके सामने महाप्रभुने पहलेकी भाँति नृत्य किया। उसे देखकर श्रीसनातन गोस्वामीके मनमें बहुत आश्चर्य हुआ ॥ 106 ॥ चातुर्मास्यके समय गौड़ीय और उड़िया भक्तोंके साथ श्रीसनातनका मिलन :- वर्षार चारिमास रहिला सब निज-भक्तगणे। सबा-सङ्गे प्रभु मिलाइला सनातने ॥ 107 ॥ अनुवाद—वर्षा ऋतुके चार मास तक गौड़देशसे आये सभी भक्त श्रीजगन्नाथपुरीमें रहे। महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीको उन सब भक्तोंसे मिलवाया ॥ 107 ॥ अद्वैत, नित्यानन्द, श्रीवास, वक्रेश्वर। वासुदेव, मुरारि, राघव, दामोदर ॥ 108 ॥ पुरी, भारती, स्वरूप, पण्डित-गदाधर । सार्वभौम, रामानन्द, जगदानन्द, शङ्कर ॥ 109 ॥ काशीश्वर, गोविन्दादि यत भक्तगण। सबा-सने सनातनेर कराइला मिलन ॥ 110 ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीवास पण्डित, श्रीवक्रेश्वर पण्डित, श्रीवासुदेव दत्त, श्रीमुरारि गुप्त, श्रीराघव पण्डित, श्रीदामोदर पण्डित, श्रीपरमानन्द पुरी, श्रीब्रह्मानन्द भारती, श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य, श्रीरामानन्द राय, श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीशङ्कर पण्डित, श्रीकाशीश्वर पण्डित, श्रीगोविन्द आदि जितने भक्त थे, महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीकी उन सबसे भेंट करवायी ॥ 108-110 ॥ श्रीसनातन सभीकी ही प्रीतिके पात्र :- यथायोग्य सबार कैला चरण वन्दन। ताँरे कराइला सबार कृपार भाजन ॥ 111 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने यथायोग्य सभी भक्तोंके चरणोंकी वन्दना की। महाप्रभुकी कृपाके कारण श्रीसनातन उन सभीकी कृपाके पात्र बन गये ॥ 111 ॥ अपने गुणोंके द्वारा विष्णु-वैष्णवके स्नेह-प्रीतिके पात्र :- सद्गुणे, पाण्डित्ये, सबार प्रिय-सनातन। यथायोग्य कृपा-मैत्री-गौरव-भाजन ॥ 112 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी अपने सद्गुणों तथा पाण्डित्यके कारण सबके प्रिय थे। वे महाप्रभुके भक्तोंमें-से यथायोग्य किसीकी कृपा, किसीकी मित्रता और अन्य किसीके गौरवके पात्र थे ॥ 112 ॥
[ 4/113-121 चौथा अध्याय 119 गौड़ीय भक्तोंका गौड़देशमें लौटना और महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनका आह्वान, श्रीसनातनका पुरीमें अवस्थान :- श्रीसनातनका आनन्द :- सकल वैष्णव यबे गौड़देशे गेला। मध्याह्न-भिक्षाकाले सनातने बोलाइल। सनातन महाप्रभुर चरणे रहिला ॥ 113 ॥ प्रभु बोलाइला, ताँर आनन्द बाड़िल ॥ 117 ॥ अनुवाद-जब सभी वैष्णव गौड़देश लौट गये, तब अनुवाद-महाप्रभुने मध्याह्न भोजनके समय श्रीसनातन भी श्रीसनातन महाप्रभुके चरणकमलोंके आश्रयमें ही गोस्वामीको भी बुलवाया। महाप्रभुने मुझे बुलाया है-इससे रहे ॥ 113 ॥ श्रीसनातन गोस्वामीका आनन्द बहुत बढ़ गया ॥ 117 ॥ महाप्रभुके साथ श्रीसनातनका दोलयात्राका दर्शन :- दोलयात्रा-आदि प्रभुर सङ्गेते देखिल। महाप्रभुकी प्रीतिके वशीभूत आत्म-विस्मृत श्रीसनातनका दिने-दिने प्रभुसङ्गे आनन्द बाड़िल ॥ 114 ॥ देहस्मृतिकी लुप्त-अवस्थामें प्रखर तप्त तीक्ष्ण बालूके पथपर महाप्रभुके समीप गमन :- अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीने महाप्रभुके साथ दोलयात्रा मध्याह्ने समुद्र-बालु हञाछे अग्नि-सम। आदिका दर्शन किया। इस प्रकार महाप्रभुके साथ रहते सेइपथे सनातन करिला गमन ॥ 118 ॥ हुए दिन-प्रतिदिन उनका आनन्द बढ़ने लगा ॥ 114 ॥ 'प्रभु बोलाञाछे'-एइ आनन्दित मने। ज्येष्ठ मासमें श्रीसनातनकी परीक्षा-विषयक तप्त-बालुकाते पा पोड़े, ताहा नाहि जाने ॥ 119 ॥ वृत्तान्तका वर्णन :- दुइ पाये फोस्का हैल, तबु गेला प्रभुस्थाने। पूर्व वैशाखमासे सनातन यबे आइला। भिक्षा करि' महाप्रभु करियाछेन विश्रामे ॥ 120 ॥ ज्येष्ठमासे प्रभु ताँरे परीक्षा करिला ॥ 115 ॥ महाप्रभुके भुक्त-अवशिष्ट प्रसादकी प्राप्ति :- अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामी पहले जब वैशाख-मासमें भिक्षा-अवशेष-पात्र गोविन्द तारे दिला। जगन्नाथपुरीमें आये थे, तब महाप्रभुने ज्येष्ठमासमें उनकी प्रसाद पाञा सनातन प्रभुपाशे आइला ॥ 121 ॥ परीक्षा ली थी ॥ 115 ॥ अनुवाद-दोपहरके समय समुद्रकी बालू आगकी यमेश्वर-टोटामें महाप्रभुके द्वारा दोपहरमें भिक्षा :- भाँति तप रही थी, परन्तु श्रीसनातन गोस्वामी उसी ज्येष्ठमासे प्रभु यमेश्वर-टोटा आइला। पथसे गये। 'महाप्रभुने बुलाया है' - इस बातसे उनके भक्त-अनुरोधे ताँहा भिक्षा ये करिला ॥ 116 ॥ मनमें इतना आनन्द हो रहा था कि तपती बालूसे अनुवाद-ज्येष्ठ मासमें महाप्रभु यमेश्वर तोटा उनके पाँव जल रहे हैं, इस बातका उन्हें अनुभव ही आये तो भक्तोंके अनुरोधपर उन्होंने वहींपर भिक्षा नहीं हुआ। उनके दोनों पाँवोंमें फफोले पड़ गये, तब (भोजन) ग्रहण करना स्वीकार किया ॥ 116 ॥ भी वे महाप्रभुके पास गये। उस समय महाप्रभु भोजन अनुभाष्य- 'यमेश्वर-टोटा,'-यमेश्वर-शिवके बगीचेवाली करनेके बाद विश्राम कर रहे थे। श्रीगोविन्दने श्रीसनातन गलीमें; तोटा-शब्दका अर्थ उड़िया भाषामें 'बगीचा' होता गोस्वामीको महाप्रभुका उच्छिष्ट प्रदान किया। वे प्रसाद है ॥ 116 ॥ पाकर महाप्रभुके पास आ गये ॥ 118-121 ॥
120 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/122-127 ] स्नेहपूर्वक महाप्रभुके द्वारा उनके आगमनके उपायकी जिज्ञासा, श्रीसनातनका दैन्यसहित उत्तर :- प्रभु कहे,—“कोन पथे आइला सनातन?” तँह कहे,—“समुद्र-पथे, करिलुँ आगमन॥”122॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“हे सनातन, तुम कौनसे मार्गसे आये हो?” उन्होंने उत्तर दिया,—“मैं समुद्रतटके मार्गसे आया हूँ॥”122॥ प्रभु कहे,—“तप्त-बालुकाते केमने आइला? सिंहद्वारेर पथ—शीतल, केने ना आइला??123॥ तप्त-बालुकाय तोमार पाय हैल व्रण। चलिते ना पार, केमने करिला सहन??”124॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“तुम तपती बालूपर कैसे चलकर आये? सिंहद्वारका मार्ग तो शीतल है, तुम वहाँसे क्यों नहीं आये? तपती बालूपर चलकर आनेसे तुम्हारे पाँवोंमें फफोले पड़ गये हैं। अब तो तुम चल भी नहीं पा रहे हो, तुमने यह सब कैसे सहन किया?”123-124॥ अनुभाष्य—‘सिंहद्वार’,—जगन्नाथमन्दिरके मूल पूर्वदिशावाले द्वारको सिंहद्वार कहते हैं॥123॥ सनातन कहे,—“दुःख बहुत ना पाइलुँ। पाये व्रण हञाछे ताहा ना जानिलुँ॥125॥ स्वयं रागमार्गीय परमहंस होनेपर भी आदर्श मानप्रदाता वैष्णवाचार्यके रूपमें श्रीसनातन प्रभुके द्वारा साधकोंको शिक्षा प्रदान करनेके लिये वैध अर्चन-मार्गके प्रति यथोचित मर्यादाका प्रदर्शन :- सिंहद्वारे याइते मोर नाहि अधिकार। विशेषे—ठाकुरेर ताँहा सेवकेर प्रचार॥126॥ सेवक गतागति करे, नाहि अवसर। तार स्पर्श हैले, सर्वनाश हवे मोर॥”127॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,—“मुझे कुछ अधिक कष्ट नहीं हुआ। पैरोंमें फफोले पड़ गये हैं, मुझे पता ही नहीं चला। सिंहद्वारकी ओरसे आनेका मेरा अधिकार नहीं है, विशेषकर उस मार्गपर श्रीजगन्नाथदेवके सेवकोंका निरन्तर आना-जाना लगा रहता है। श्रीजगन्नाथदेवके सेवकोंके सब समय उस मार्गपर आने-जाने-से मार्ग कभी भी खाली नहीं रहता। इसलिये उनसे मेरा स्पर्श होनेपर तो मेरा सर्वनाश हो जायेगा॥”125-127॥ अमृतानुकणिका—ज्येष्ठ-मासमें दोपहरके समय सूर्यके प्रखर तापसे गोवर्धनकी शिलाएँ तप्त हो रही थीं। श्रीकृष्ण गोचारण करते-करते गोवर्धनकी तलहटीमें पहुँचे और राधाजी पर्वतके ऊपर खड़ी होकर वहाँसे श्रीकृष्णको देख रही थीं। ऊपरसे सूर्यका ताप आ रहा था और नीचेसे शिलाके तप्त होनेके कारण उनके चरणोंके तलवोंमें फफोले पड़ रहे थे। राधाजीके चरणकमल तो अत्यन्त कोमल हैं, किन्तु श्रीकृष्णके दर्शनसे उनको इतना आनन्द हो रहा था कि उन्हें कोई कष्ट ही नहीं अनुभव हो रहा था। इसी प्रकार गिरिराज गोवर्धनको इन्द्रके वज्रके प्रहारका पता ही नहीं चल रहा था। (श्रील विश्वनाथ चक्रवर्त्तीकृत श्रीश्रीगोवर्धनाष्टकम् 2)— स्वप्रेष्ठहस्ताम्बुज सौकुमार्य सुखानुभूते रतिभुमम्नि वृत्ते। महेन्द्र-वज्राहतिमपजानन्न् गोवर्धनो मे दिशतामभीष्टम्॥ अर्थात् “जो अपने प्रियतमके करकमलोंकी सुकुमारताके द्वारा अनुभूत अतिशय सुखके कारण महेन्द्रके असंख्य वज्रके आघातको भी नहीं जान पा रहे हैं, वे श्रीगोवर्धन मुझे समस्त अभीष्ट प्रदान करें।” शुद्धभक्तोंके साथ भी ऐसा ही होता है। उनको अपने शरीरकी भी सुधबुध नहीं होती। उनका शरीर प्राकृत नहीं होता, किन्तु यदि उसे प्राकृत भी मान लें, तो भी उनका भजनमें इतना आवेश होता है कि संसारका कोटि-कोटि दुःख भी उनको प्रतीत नहीं होता। तप्त बालूके ऊपर चलते हुए श्रीसनातन गोस्वामीके चरणोंमें फफोले पड़ रहे थे, किन्तु महाप्रभुके साथ मिलन होगा, इस परमानन्दके साथ वे चले जा
[ 4/125-133 चौथा अध्याय 121 रहे थे। इसी प्रकारसे जब कोई मध्यम अधिकारसे धीरे-धीरे ऊपर उठता है, तो उत्तम-कनिष्ठ अवस्थामें आनेपर उसको कोई भी कष्ट अनुभव नहीं होता। साधनावस्थामें ही भक्ति क्लेशघ्नी है, अर्थात् उस अवस्थामें ही क्लेश दूर हो जाते हैं। भावावस्थामें अति अल्प मात्रामें क्लेश रहनेपर भी भक्तको उनकी प्रतीति नहीं होती और प्रेमावस्थामें क्लेश उपस्थित ही नहीं होते और न ही भक्तको क्लेशादिकी अनुभूति होती है। यही प्रेमका लक्षण है। (भःरःसिः 2/1/280)— अविज्ञाताखिलक्लेशाः सदा कृष्णाश्रितक्रियाः। सिद्धाः स्युः सन्ततप्रेमसौख्यास्वादपरायणाः ॥ अर्थात् “जो सर्वदा कृष्ण-सम्बन्धी क्रियाओंमें पूर्णरूपसे निमग्न रहते हैं तथा किसी भी प्रकारके क्लेश या विघ्नसे अपरिचित रहते हैं, वे सिद्ध भक्त हैं।” यदि श्रीसनातन गोस्वामीको महाप्रभुका नित्य परिकर न भी मानें, तो भी सभी उनको उत्तम भक्त तो अवश्य ही मानेंगे। इसलिये श्रीसनातन गोस्वामीको कष्टकी प्रतीति नहीं हुई। जब कोई भक्त मध्यम अधिकारसे ऊपर उठ जाता है, तब वह कष्टको कष्ट ही नहीं मानता। श्रीकृष्णके दर्शनमें और उनकी कथाओंको सुननेमें यदि कोई दुःख भी है, तो उसको वह सुख ही मानता है। रागात्मिका भक्तोंमें (यथा अन्त्य, 20/52—‘ना गणि आपन दुःख------सेइ दुःख-मोर सुखवर्य॥’) और रागानुगा भक्तोंमें भी ऐसा ही होता है।—“श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज”॥ 125 ॥ श्रीसनातनकी उक्ति और मान देनेवाले व्यवहारके श्रवणसे महाप्रभुको आनन्द :— शुनि' महाप्रभु मने सन्तोष पाइला। तुष्ट हञा ताँरे किछु कहिते लागिला ॥ 128 ॥ भगवान्के द्वारा भक्तकी स्तुति :— “यद्यपिओ तुमि हओ जगत्पावन। तोमा-स्पर्शे पवित्र हय देव-मुनिगण ॥ 129 ॥ स्वयं महाप्रभुके द्वारा भक्त अथवा साधुकी रीति और गुणके वैशिष्ट्यका वर्णन :— तथापि भक्त-स्वभाव-मर्यादा-रक्षण। मर्यादा-पालन हय साधुर भूषण ॥ 130 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीका विचार सुनकर महाप्रभुके मनमें प्रसन्नता हुई। प्रसन्न होकर महाप्रभु कुछ कहने लगे,—“हे सनातन ! यद्यपि तुम जगत्को पवित्र करनेवाले हो और तुम्हें स्पर्श करनेसे तो देवता और मुनिगण भी पवित्र होते हैं, तथापि मर्यादाकी रक्षा करना ही भक्तोंका स्वभाव होता है। मर्यादाका पालन करना ही साधुका भूषण है॥ 128-130 ॥ साधकके द्वारा मर्यादाके उल्लङ्घनका फल :— मर्यादा-लङ्घने लोक करे उपहास। इहलोक, परलोक-दुइ हय नाश ॥ 131 ॥ अनुवाद—मर्यादाका उल्लङ्घन करनेसे लोग उसका उपहास करते हैं और उसका यह लोक और परलोक-दोनों ही नष्ट हो जाते हैं॥ 131 ॥ जगद्गुरु लोकशिक्षक महाप्रभुके द्वारा वैध-मर्यादाके पालनमें आदरका प्रदर्शन और श्रीसनातनके आचरणको देखकर उन्हें आचार्यके रूपमें अङ्गीकार करना :— मर्यादा राखिले, तुष्ट हय मोर मन। तुमि ऐछे ना करिले करे कोन् जन??”132 ॥ अनुवाद—मर्यादाका पालन करनेसे मेरा मन सन्तुष्ट होता है। यदि तुम ऐसा आचरण नहीं करोगे, तो फिर कौन करेगा ?”132 ॥ अप्राकृत देहवाले अपने श्रेष्ठ भक्तको भगवान्के द्वारा आलिङ्गन :— एत बलि' प्रभु ताँरे आलिङ्गन कैल। ताँर कण्डुरसा प्रभुर श्रीअङ्गे लागिल ॥ 133 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने ऐसा कहकर श्रीसनातन गोस्वामीको आलिङ्गन किया तो उनके शरीरका पीब महाप्रभुके श्रीअङ्गपर लग गया॥ 133 ॥
122 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/134-141 ] आलिङ्गनके फलसे महाप्रभुके शरीरमें अपने पीबके स्पर्शके कारण दैन्यविग्रह श्रीसनातनके द्वारा वेदनाका अनुभव :- बार बार निषेधेन, तबु करे आलिङ्गन। अङ्गे रसा लागे, दुःख पाय सनातन ॥ 134 ॥ अनुवाद—यद्यपि श्रीसनातन गोस्वामीने बार बार महाप्रभुको आलिङ्गन करनेके लिये मना किया, तथापि महाप्रभुने उनका आलिङ्गन किया। ऐसा करनेसे महाप्रभुके अङ्गोंमें पीब लग गया जिससे श्रीसनातन गोस्वामीको बहुत दुःख हुआ ॥ 134 ॥ श्रीसनातन-जगदानन्द-संवाद :- एइमते सेवक-प्रभु दुँहे घर गेला। आर दिन जगदानन्द सनातनेरे मिलिला ॥ 135 ॥ अनुवाद—तत्पश्चात् सेवक (श्रीसनातन गोस्वामी) और महाप्रभु, दोनों अपने-अपने वासस्थानपर चले गये। अगले दिन श्रीजगदानन्द पण्डित श्रीसनातन गोस्वामीसे मिलने आये ॥ 135 ॥ अनुभाष्य— 'सेवक-प्रभु', - श्रीसनातन और श्रीमन्महाप्रभु ॥ 135 ॥ पण्डितके साथ कृष्णकथाका संलाप और प्रसङ्गवशतः श्रीसनातनके द्वारा अपने दुःखका ज्ञापन :- दुइजन बसि' कृष्णकथा-गोष्ठी कैला। पण्डितेरे सनातन दुःख निवे दिला ॥ 136 ॥ “इँहा आइलाङ प्रभुरे देखि' दुःख खण्डाइते। येबा मने, ताहा प्रभु ना दिला करिते ॥ 137 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डित और श्रीसनातन गोस्वामी, दोनों बैठकर श्रीकृष्णकथा-गोष्ठी करने लगे। श्रीसनातन गोस्वामीने श्रीजगदानन्द पण्डितसे अपना दुःख निवेदन करते हुए कहा, - "मैं अपने दुःखको दूर करनेके लिये यहाँ मनमें एक सङ्कल्प लेकर आया था, किन्तु महाप्रभुने मुझे वैसा करने नहीं दिया ॥ 136-137 ॥ अनुभाष्य— 'दुःख', - सर्वदा महाप्रभु और श्रीजगन्नाथदेवके दर्शनरूपी 'सेवाके अभाव'से उत्पन्न कष्ट; 'येबा मने', - श्रीजगन्नाथ-रथके आगे महाप्रभुके नृत्यके समय अपनी देहत्याग ॥ 137 ॥ महाप्रभुकी देहमें अपने पीबके स्पर्श-हेतु दैन्यविग्रह श्रीसनातनमें लज्जा, वेदना और अपराधकी आशङ्का :- निषेधिते प्रभु आलिङ्गन करेन मोरे। मोर कण्डुरसा लागे प्रभुर शरीरे ॥ 138 ॥ अनुवाद-मेरे मना करनेपर भी महाप्रभु मेरा आलिङ्गन करते हैं जिससे मेरे शरीरका पीब महाप्रभुके शरीरपर लग जाता है॥ 138 ॥ अपराध हय मोर, नाहिक निस्तार। जगन्नाथेह ना देखिये, -ए दुःख अपार ॥ 139 ॥ अनुवाद-इससे मेरा अपराध होता है, जिसके कारण मेरा कभी भी निस्तार नहीं होगा। मैं भगवान् श्रीजगन्नाथका दर्शन भी नहीं कर पाता - यह एक और अपार दुःख है ॥ 139 ॥ हित-निमित्त आइलाङ आमि, हैल विपरीते। कि करिले हित हय नारि निर्धारिते ॥"140॥ अनुवाद-मैं तो यहाँ अपने हितके लिये आया था, किन्तु सब कुछ उसके विपरीत हो गया। क्या करनेसे मेरा हित होगा, यह मैं निर्धारित नहीं कर पा रहा हूँ॥" 140 ॥ अमङ्गलकी आशङ्कासे पण्डितके द्वारा श्रीसनातनको वृन्दावन-गमनका परामर्श देना :- पण्डित कहे, - "तोमार वासयोग्य 'वृन्दावन' । रथयात्रा देखि' ताँहा करह गमन ॥ 141 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने कहा, - "आपके रहने योग्य स्थान 'वृन्दावन' है। रथयात्रा देखकर आप वृन्दावन चले जाओ ॥ 141 ॥
[ 4/142-149 चौथा अध्याय 123 प्रभुर आज्ञा हञाछे तोमा' दुइ भाये। वृन्दावने बैस, ताँहा सर्वसुख पाइये ॥ 142 ॥ अनुवाद—महाप्रभुकी आप और श्रीरूप, दोनों भाइयोंके लिये यही आज्ञा हुई है कि आप दोनों वृन्दावनमें ही रहो, वहींपर आपको सब प्रकारके सुखोंकी प्राप्ति होगी ॥ 142 ॥ ये-कार्ये आइला, प्रभुर देखिला चरण। रथे जगन्नाथ देखि' करह गमन॥”143 ॥ अनुवाद—आप जिस कार्यसे आये थे, वह तो पूर्ण हो गया, क्योंकि आपको महाप्रभुके चरणकमलोंके दर्शन हो गये हैं। अब आप रथपर विराजमान भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन करके वृन्दावनकी ओर प्रस्थान कीजिये ॥”143 ॥ श्रीसनातनकी सम्मति, श्रीवृन्दावनधामको अप्राकृत कृष्णधाम जाननेपर भी महाप्रभुके द्वारा निर्वाचित देश मानकर श्रीसनातनका अतुलनीय गौरप्रेम :— सनातन कहे,—“भाल कैला उपदेश। ताँहा याब, सेइ मोर 'प्रभुदत्त देश' ॥”144 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,—“आपने बहुत अच्छा परामर्श दिया है। मैं वृन्दावन ही जाऊँगा, वही महाप्रभुके द्वारा प्रदत्त मेरा वासस्थान है ॥”144 ॥ अनुभाष्य—'प्रभुदत्त देश',—तात्पर्य यह है कि जीवके नित्य-आराध्य श्रीहरि-गुरु-वैष्णवके द्वारा निर्वाचित और निर्धारित स्थान ही उसका नित्य-वाञ्छनीय श्रीकृष्णसेवाका आधार श्रीवृन्दावन है; उसमें वास करके उनका सुख-विधान करनेसे ही जीवको नित्य-मङ्गलकी प्राप्ति होती है ॥ 144 ॥ एकदिन महाप्रभुका आगमन :— एत बलि' दुँहे निज-कार्ये उठि' गेला। आर दिन महाप्रभु मिलिवारे आइला ॥ 145 ॥ अनुवाद—इस प्रकार वार्तालाप करनेके बाद श्रीजगदानन्द पण्डित और श्रीसनातन गोस्वामी अपनी-अपनी सेवाओंके लिये उठ गये। अगले दिन महाप्रभु श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीसनातन गोस्वामीसे मिलनेके लिये आये ॥ 145 ॥ श्रीहरिदासके द्वारा प्रणाम, महाप्रभुके द्वारा श्रीहरिदासका आलिङ्गन :— हरिदास कैला प्रभुर चरण वन्दन। हरिदासे कैला प्रभु प्रेम-आलिङ्गन ॥ 146 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना की। महाप्रभुने श्रीहरिदास ठाकुरको प्रेमपूर्वक आलिङ्गन किया ॥ 146 ॥ आलिङ्गन करनेके लिये महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनको अपने निकट बुलाना :— दूर हैते दण्ड-परणाम करे सनातन। प्रभु बोलाय बार बार करिते आलिङ्गन ॥ 147 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने दूरसे ही महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया और महाप्रभु श्रीसनातन गोस्वामीको आलिङ्गन करनेके लिये बार बार बुलाने लगे ॥ 147 ॥ श्रीसनातनको अपराधकी आशङ्का; महाप्रभुका शीघ्रतासे उनके निकट आगमन :— अपराध-भये तैं ह मिलिते ना आइल। महाप्रभु मिलिवारे सेइ ठाञि आइल ॥ 148 ॥ अनुवाद—अपराधके भयसे श्रीसनातन गोस्वामी महाप्रभुसे मिलनेके लिये नहीं आये, तो महाप्रभु स्वयं उनसे मिलनेके लिये उनके पास चले आये ॥ 148 ॥ श्रीसनातनका भागना, महाप्रभुके द्वारा बलपूर्वक आलिङ्गन :— सनातन भागि' पाछे करेन गमन। बलात्कारे धरि' प्रभु कैला आलिङ्गन ॥ 149 ॥
124 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/149-158 ] अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी दौड़कर पीछेकी ओर जाने लगे, किन्तु महाप्रभुने उन्हें बलपूर्वक पकड़कर उनका आलिङ्गन किया॥ 149 ॥ महाप्रभु और दोनों भक्तोंका बैठना; दैन्यविग्रह श्रीसनातनके द्वारा स्वयंको अपवित्र बद्धजीव मानकर महाप्रभुके निकट गम्भीर दैन्योक्ति और महाप्रभुके स्पर्शके कारण अपने अपराधकी आशङ्का :— दुइ जन लञा प्रभु बसिला पिण्डाते। निर्विण्ण सनातन लागिला कहिते ॥ 150 ॥ अनुवाद—महाप्रभु उन दोनोंको अपने साथ लेकर चबूतरेपर जाकर बैठे। परम वैरागी श्रीसनातन गोस्वामी कहने लगे॥ 150 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'निर्विण्ण',—निर्वेद अर्थात् विरागयुक्त ॥ 150 ॥ “हित लागि' आइनु मुञि, हैल विपरीत। सेवायोग्य नहि, अपराध करौँ निति नित ॥ 151 ॥ अनुवाद—“मैं तो यहाँ अपने हितके लिये आया था, किन्तु सब कुछ उसके विपरीत हो गया। मैं सेवा करने योग्य तो हूँ नहीं, अपितु दिन-प्रतिदिन अपराध ही कर रहा हूँ॥ 151 ॥ सहजे नीच-जाति मुञि, दुष्ट, ‘पापाशय’। मोरे तुमि धुँइले मोर अपराध हय ॥ 152 ॥ अनुवाद—मैं स्वभावसे ही नीच जातिका, दुष्ट और पापवासनायुक्त हृदयवाला हूँ। आप मुझे स्पर्श करते हैं तो इससे मेरा अपराध होता है॥ 152 ॥ ताहाते आमार अङ्गे कण्डुरसा-रक्त चले। तोमार अङ्गे लागे, तबु स्पर्शह तुमि बले ॥ 153 ॥ अनुवाद—उसपर भी मेरे शरीरसे जो पीब और रक्त बहता है, वह आपके श्रीअङ्गपर लगता है, किन्तु तब भी आप बलपूर्वक मुझे स्पर्श करते हैं॥ 153 ॥ अनुभाष्य—'बले',—बलपूर्वक ॥ 153 ॥ वीभत्स स्पर्शिते ना कर घृणा-लेशे। एइ अपराधे मोर हबे सर्वनाशे ॥ 154 ॥ अनुवाद—आप घिनौने शरीरको स्पर्श करनेमें लेशमात्र भी घृणा नहीं करते हैं, इस अपराधसे मेरा सर्वनाश अवश्य ही होगा ॥ 154 ॥ अपराधकी आशङ्कासे उसके मोचनके लिये वृन्दावन जानेकी अनुमति देनेकी प्रार्थना :— ताते इँहा रहिले मोर ना हय 'कल्याण'। आज्ञा देह'–रथ देखि' याङ वृन्दावन ॥ 155 ॥ अनुवाद—इसलिये यहाँ रहनेपर मेरा 'कल्याण' नहीं होगा। कृपा करके आप मुझे आज्ञा दीजिये कि मैं रथयात्राका दर्शन करके वृन्दावन लौट जाऊँ ॥ 155 ॥ श्रीजगदानन्द पण्डितसे वृन्दावन जानेके परामर्शकी प्राप्तिके विषयमें बतलाना :— जगदानन्द-पण्डिते आमि युक्ति पुछिल। वृन्दावन याइते तेंह उपदेश दिल ॥ ”156 ॥ अनुवाद—मैंने श्रीजगदानन्द पण्डितसे भी इस विषयमें उनका विचार पूछा था। उन्होंने मुझे वृन्दावन जानेका ही परामर्श दिया है॥ ”156 ॥ क्रोधसे भरकर महाप्रभुके द्वारा श्रीजगदानन्दकी भर्त्सना :— एत शुनि' महाप्रभु सरोष-अन्तरे। जगदानन्दे क्रुद्ध हञा करे तिरस्कारे ॥ 157 ॥ “कालिकार पड़ुया जगा ऐछे गर्वी हैल। तोमा-सबारेह उपदेश करिते लागिल ??158 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुके भीतर रोष आ गया और वे श्रीजगदानन्द पण्डितपर क्रोधित होकर कहने लगे,—“कलका छात्र जगा (जगदानन्द) इतना अभिमानी हो गया है कि वह तुम सबको भी उपदेश करने लगा है? 157–158 ॥
[ 4/159–166 चौथा अध्याय 125 श्रीसनातनके प्रति महाप्रभुकी प्रचुर कृपा-गौरवपूर्ण उक्ति :- व्यवहारे-परमार्थे तुमि-तार गुरुतुल्य। तोमारे उपदेश करे, ना जाने आपन-मूल्य ?? 159 ॥ अनुवाद-व्यवहारमें हो अथवा परमार्थमें हो, इन दोनों विषयोंमें तुम उसके गुरुके समान हो। वह अपने मूल्यको नहीं जानकर तुम्हें उपदेश देता है ? 159 ॥ आमार उपदेष्टा तुमि-प्रामाणिक आर्य। तोमारेह उपदेशे, बालका करे ऐछे कार्य ॥” 160 ॥ अनुवाद-तुम तो मुझे भी परामर्श देनेके अधिकारी-प्रामाणिक आर्य हो और वह जगा तुम्हें उपदेश देता है। वह तो नादान बालकके जैसे कार्य कर रहा है॥” 160 ॥ श्रीसनातनके द्वारा श्रीजगदानन्दके सौभाग्य और अपने दुर्भाग्यका वर्णन :- शुनि' सनातन पाये धरि' प्रभुरे कहिल। “जगदानन्देर सौभाग्य आजि से जानिल ॥ 161 ॥ आपणार 'असौभाग्य' आजि हैल ज्ञान। जगते नाहि जगदानन्द-सम भाग्यवान् ॥ 162 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके द्वारा श्रीजगदानन्दकी भर्त्सना सुनकर श्रीसनातन गोस्वामीने महाप्रभुके चरणोंमें गिरकर उनसे कहा,-“आज ही मुझे श्रीजगदानन्दके सौभाग्यका पता चला है। और साथ ही आज मुझे अपने 'दुर्भाग्य'का ज्ञान हुआ है। इस जगत्में जगदानन्द पण्डितके समान अन्य कोई भाग्यशाली नहीं है॥ 161–162 ॥ अनुभाष्य- 'आपणार असौभाग्य', - अर्थात् अपना दुर्भाग्य ॥ 162 ॥ अपने और श्रीजगदानन्दके प्रति महाप्रभुके स्नेहकी तुलना :- जगदानन्दे पियाओ आत्मीयता-सुधारस। मोरे पियाओ गौरवस्तुति-निम्ब-निशिन्दा-रस ॥ 163 ॥ अनुवाद-आप जगदानन्द पण्डितको आत्मीयतारूपी अमृतरसका पान कराते हो और मुझे सम्मान-स्तुतिरूपी नीम-निर्गुण्डी* के कड़वा रसका पान कराते हो ॥ 163 ॥ अनुभाष्य-नीमका और निर्गुण्डीका रस कड़वा होता है, इसलिये आस्वादनके समय वह सुखकर नहीं होता। स्नेह और कृपाके पात्र लालनीय व्यक्तिके लिये उनके सेव्य और पूज्य लालक-व्यक्तिसे गौरव और वन्दना आदि सम्मानकी प्राप्ति भी वैसे ही असुखकर होती है ॥ 163 ॥ सेवकको सेव्यके निजजन-मानकर प्रेमके कारणरूप सम्बन्धकी अनुभूति; श्रीसनातनके गम्भीर हृदयव्यथा-सूचक वचन :- आजिह नहिल मोरे आत्मीयता-ज्ञान ! मोर अभाग्य, तुमि-स्वतन्त्र भगवान् ! !” 164 ॥ अनुवाद-आज तक आपने मुझे अपना आत्मीय नहीं समझा। यह तो मेरा दुर्भाग्य ही है, क्योंकि आप तो स्वतन्त्र भगवान् हैं !” 164 ॥ महाप्रभुकी लज्जा और श्रीसनातनके प्रति सान्त्वना-वाक्य :- शुनि' महाप्रभु किछु लज्जित हैला मने। ताँरे सन्तोषिते किछु बलेन वचने ॥ 165 ॥ श्रीजगदानन्द और श्रीसनातनके प्रति महाप्रभुकी स्नेह-प्रीतिके वैशिष्ट्यका वर्णन; श्रीजगदानन्दके प्रति तिरस्कारका कारण :- “जगदानन्द प्रिय आमार नहे तोमा हैते। मर्यादा-लङ्घन आमि ना पारों सहिते ॥ 166 ॥ अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीकी बात सुनकर महाप्रभु मन-ही-मन कुछ लज्जित हुए। फिर श्रीसनातन गोस्वामीको सन्तुष्ट करनेके लिये कहने लगे, - “जगदानन्द मुझे
- निर्गुण्डी अथवा सम्भालु अथवा सिन्दुवार पौधेमें एक साथ पाँच पत्तियाँ होती हैं और इसका स्वाद बहुत कसैला होता है। इसका प्रयोग औषधि बनानेमें होता है।
126 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/165-173 ] तुमसे अधिक प्रिय नहीं है, किन्तु मैं मर्यादाका उल्लङ्घन सहन नहीं कर पाता हूँ॥ 165-166॥ अनुभाष्य-जिसकी जो मर्यादा है, उस मर्यादाका अतिक्रम करके स्वयंको गुरु मानकर अपने सम्माननीय पात्रको परामर्श देनेके कार्यमें महाप्रभुने उत्साह प्रदान नहीं किया, साथ ही, श्रीजगदानन्द जैसे आयुमें छोटे व्यक्तिके वैसे व्यवहारका भी अनुमोदन नहीं किया॥ 166॥ दोनोंके गुणोंके वैशिष्ट्यका वर्णन :- काँहा तुमि-प्रामाणिक, शास्त्रे प्रवीण! काँहा जगा-कालिकार वटु नवीन!! 167॥ अनुवाद-कहाँ तो तुम शास्त्रमें प्रवीण प्रामाणिक व्यक्ति हो, और कहाँ जगा कलका नया ब्राह्मण है! 167॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनके गुण-गौरवकी स्तुति :- आमाकेह बुझाइते तुमि धर शक्ति। कत ठाञि बुझाञाछ व्यवहार-भक्ति॥ 168॥ अनुवाद-तुम तो मुझे भी परामर्श देनेकी शक्ति रखते हो। तुमने तो मुझे कितने स्थानोंपर मर्यादाके विषयमें बतलाया है॥ 168॥ अनुभाष्य-'कत ठाञिं',-मध्यलीला 1/222-224 संख्या अथवा मध्यलीला 16/266 संख्या देखें; 'व्यवहार-भक्ति,'- मर्यादा अथवा शिष्टाचार प्रदर्शन॥ 168॥ तोमारे उपदेश करे, ना याय सहन। अतएव तारे आमि करिये भर्त्सन॥ 169॥ अनुवाद-जगा तुम्हें उपदेश प्रदान करे, यह मैं सहन नहीं कर सकता, इसलिये मैंने उसकी भर्त्सना की है॥ 169॥ भक्तके गुणोंसे आकृष्ट भगवान्का भक्तगुण-वर्णन :- बहिरङ्ग-ज्ञाने तोमारे ना करि स्तवन। तोमार गुणे स्तुति कराय यैछे तोमार गुण॥ 170॥ अनुवाद-मैं तुम्हें बाहरी व्यक्ति मानकर औपचारिक रूपसे तुम्हारी स्तुति नहीं करता हूँ, तुम्हारे गुण ही ऐसे हैं कि वे मुझसे तुम्हारा स्वाभाविक रूपसे गुणगान करवाते हैं॥ 170॥ ममताके पात्र बहुतसे 'आश्रय' रहनेपर भी किसी विशेष पात्रके प्रति 'विषय'की प्रीतिका वैशिष्ट्य :- यद्यपि काहार 'ममता' बहुजने हय। प्रीति-स्वभावे काँहा कोन भावोदय॥ 171॥ अनुवाद-यद्यपि किसीकी ममता बहुतसे लोगोंमें होती है, किन्तु प्रीतिके तारतम्यके अनुसार उनके प्रति पृथक्-पृथक् भाव उदित होता है॥ 171॥ अमानी भक्तके द्वारा दैन्यवशतः स्वयंको प्राकृत जीव मानकर सुनीच समझनेपर भी वास्तवमें वह-चित्-दर्शनमें भगवान्के द्वारा आलिङ्गित अप्राकृत ब्रह्मवस्तु :- तोमार देह तुमि कर वीभत्स-ज्ञान। तोमार देह आमारे लागे अमृत-समान॥ 172॥ अनुवाद-तुम अपनी देहको घृणित मानते हो, किन्तु तुम्हारी देह मुझे अमृतके समान लगती है॥ 172॥ अप्राकृत देह तोमार प्राकृत कभु नय। तथापि तोमार ताते प्राकृत-बुद्धि हय॥ 173॥ अनुवाद-तुम्हारी देह अप्राकृत है, वह कभी भी प्राकृत नहीं हो सकती। तथापि तुम्हारी उसके प्रति प्राकृत बुद्धि होती है॥ 173॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्णोन्मुख भक्त अपने सुखकी प्राप्ति रूपी भोग-वासनाकी तृप्तिके लिये किसी दैहिक काम-आचरणको स्वीकार नहीं करते; वे श्रीकृष्णके सुखके अभिलाषी होकर एकमात्र श्रीकृष्णप्रेम-सेवाके उद्देश्यसे ही समस्त अप्राकृत भजनके अनुष्ठानोंको किया करते हैं। कर्मीगण कर्मफलके भोगके आधार प्राकृत-देहको नश्वर-फलभोगके उद्देश्यसे नियुक्त करते हैं। भक्तोंकी वैसी चेष्टा नहीं है,-वे सब प्रकारसे सदैव
[ 4/173-174 चौथा अध्याय 127 हरिसेवाके उद्देश्यसे ही अपनी देहके अस्तित्वको स्वीकार और समस्त प्रकारके दैहिक कार्योंके द्वारा श्रीकृष्णकी सेवाका अनुष्ठान किया करते हैं। प्रकृतिके प्रति अभिनिवेश-वशतः प्राकृत-फलभोग-कामनाके कारण ही कर्मीकी देह-प्राकृत है। पुनः श्रीकृष्णसेवाकी एकान्तिक निष्ठावशतः देहका अस्तित्व अथवा दैहिक- क्रियादि सब कुछ ही श्रीकृष्णकी अप्राकृत-सेवापरायण होनेके कारण भक्तकी चिन्मय देह अवश्य ही अप्राकृत है। श्रीकृष्ण-विमुख कर्मीगण निज-भोग-तात्पर्यपरक अपनी देहको प्राकृत मानते हैं, उसी प्रकार वे शुद्ध भक्तोंकी देहको भी 'प्राकृत' मानते हैं। परन्तु शुद्धभक्त और उनके दास उस प्रकार शुद्धभक्तोंकी देहको कभी भी 'प्राकृत' नहीं समझते। अर्थात् वे चित् और अचित्, अप्राकृत और प्राकृत, विधिके अतीत और विधिके अधीन वस्तुको अथवा श्रीकृष्ण और श्रीकृष्णसे इतर मायाको 'समान' अथवा 'एक' मानकर कृत्रिम उदारता अथवा निरपेक्षताके छलसे चित् और जड़ीय वस्तुके समन्वयवाद (एक समान माननेवाले वाद)का आवाहन करके कभी भी नामापराधी नहीं बनते। अपितु वे शुद्धभक्तोंकी चिदानन्दमय देहको अप्राकृत-स्वरूप जानकर श्रीकृष्णसेवाके उपयोगी समझते हैं। उत्तमाधिकारी भक्त अपनी अनुभूतिको श्रीकृष्णप्रेम रहित जानकर स्वयंको दरिद्र और प्राकृत जीव मानते हैं। प्राकृत-सहजिया आदि अप-सम्प्रदायोंमें श्रीकृष्ण- बहिर्मुख व्यक्ति मूर्खतावशतः अपनी प्राकृत देहको 'अप्राकृत वैष्णवदेह' मानकर शुद्ध वैष्णवोंके अप्राकृत आचार अथवा भक्तिसे बहुत दूर जा पड़ते हैं। इसे लक्ष्य करके ही लोक-शिक्षाके लिये ठाकुर भक्तिविनोदने स्व-रचित 'कल्याण-कल्पतरु'-ग्रन्थमें लिखा है- “आमि त' वैष्णव, ए बुद्धि हइले, अमानी ना हब आमि। प्रतिष्ठाशा आसि' हृदय दूषिबे, हइब निरयगामी॥ निजे श्रेष्ठ जानि', उच्छिष्टादि-दाने, अभिमान हबे भार। ताइ शिष्य तब, थाकिया सर्वदा, ना लइब पूजा कार॥” [अर्थात् “ 'मैं वैष्णव हूँ'-मेरी ऐसी बुद्धि होनेपर मैं कभी भी अमानी नहीं रह पाऊँगा और दूसरोंसे प्रतिष्ठा पानेकी आशासे मेरा हृदय दूषित हो जायेगा, जिसके फलस्वरूप मैं नरकगामी हो जाऊँगा। स्वयंको श्रेष्ठ (गुरु) जानकर यदि मैं अपने उच्छिष्टादिको दूसरोंको प्रदान करूँगा, तो मेरे ऊपर मिथ्या अभिमानका भार आ जायेगा और उसके द्वारा मैं डूब जाऊँगा। इसलिये हे वैष्णव ठाकुर ! मुझपर ऐसी कृपा कीजिये कि मैं सदा आपका शिष्य बनकर रहूँ और किसीसे अपनी पूजा स्वीकार नहीं करूँ।”] श्रीकृष्णराज गोस्वामीने भी लिखा है, (अन्त्यलीला 20/28 संख्यामें)- “प्रेमेर स्वभाव-याँहा प्रेमेर सम्बन्ध। सेइ माने कृष्णे मोर नाहि भक्तिगन्ध॥” [अर्थात् “जहाँ श्रीकृष्णप्रेमका सम्बन्ध होता है, उस प्रेमका स्वभाव ही ऐसा है कि भक्त यह मानता है कि मुझमें श्रीकृष्णके प्रति भक्तिकी गन्ध भी नहीं है।”] ॥ 173 ॥ निर्गुण अप्राकृत-राज्यमें गौण अचित्-दर्शनसे उत्पन्न मनोधर्मसुलभ जड़ीय विधि-निषेधके विचारका अभाव :- 'प्राकृत' हैलेह तोमार वपु नाहि उपेक्षिते। भद्राभद्र-वस्तुज्ञान नाहि 'अप्राकृते' ॥ 174 ॥ अनुवाद-यदि तुम्हारी देह प्राकृत भी हो, तो भी मैं उसकी उपेक्षा नहीं कर सकता, क्योंकि अप्राकृत स्वरूप मुझ संन्यासीमें भद्राभद्रका (भले और बुरेका) कोई विचार होना उचित नहीं है॥ 174 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुने श्रीसनातनसे कहा-तुम वैष्णव हो, तुम्हारी देह अप्राकृत है, उसके प्रति 'भले-बुरे'की बुद्धि करना उचित नहीं है। उसपर भी मैं संन्यासी हूँ, इसलिये यदि तुम्हारी देह प्राकृत भी होती, तो भी मैं उसकी उपेक्षा नहीं कर पाता, क्योंकि अप्राकृतस्वरूप संन्यासीके लिये भली-बुरी-वस्तुरूपी ज्ञान रहना कभी भी उचित नहीं है ॥ 174 ॥