भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2124

[ 4/28–41 चौथा अध्याय 107 नीच वंशमें हुआ है। जितने अधर्म तथा अन्यायपूर्ण कार्य हैं, उन्हें करना तो मेरा कुलधर्म है॥ 28॥ अनुभाष्य—'नीच-वंशे',—मध्यलीला 1/189 संख्याका अनुभाष्य देखें॥ 28॥ हेन वंशे घृणा छाड़ि' कैला अङ्गीकार। तोमार कृपाय वंशे मङ्गल आमार॥ 29॥ अनुवाद—ऐसे वंशके प्रति घृणाका त्याग करके आपने मुझे स्वीकार किया है, आपकी कृपासे ही मेरे वंशमें मङ्गल है॥ 29॥ छोटे भाई श्रीअनुपमकी एकान्तिकी रामनिष्ठाका वर्णन :— सेइ अनुपम–भाइ शिशुकाल हैते। रघुनाथ–उपासना करे दृढ़चित्ते॥ 30॥ रात्रि–दिने रघुनाथेर ‘नाम’ आर ‘ध्यान’। रामायण निरवधि सुने, करे गान॥ 31॥ तीनों भाइयोंकी परस्पर अकृत्रिम प्रीति :— आमि आर रूप—ताँर ज्येष्ठसहोदर। आमा–दोँहा–सङ्गे तँह रहे निरन्तर॥ 32॥ अनुवाद—मेरा भाई अनुपम बचपनसे ही भगवान् श्रीरघुनाथकी दृढ़ चित्तसे उपासना करता था। अनुपम रात-दिन भगवान् श्रीरघुनाथका ही नाम और उनका ही ध्यान करता था। वह निरन्तर रामायणका श्रवण तथा कीर्तन करता था। मैं और रूप अनुपमके बड़े भाई हैं, अनुपम सदा हमारे साथ ही रहता था॥ 30-32॥ आमा–सबा–सङ्गे कृष्णकथा, भागवत सुने। ताहार परीक्षा कैलुँ आमि–दुइजने॥ 33॥ श्रीअनुपमको दोनों बड़े भाइयोंके द्वारा श्रीकृष्णके गुण- माधुर्यके वर्णनके द्वारा कृष्णभजनका प्रलोभन देना :— “शुनह वल्लभ, कृष्ण—परम मधुर। सौन्दर्य, माधुर्य, प्रेम–विलास—प्रचुर॥ 34॥ कृष्णभजन कर तुमि आमा–दुँहार सङ्गे। तिन भाइ एकत्र रहिमु कृष्णकथा–रङ्गे॥” 35॥ अनुवाद—वह हमारे साथ श्रीकृष्णकथा और भागवत भी सुनता था। हम दोनोंने अनुपमकी परीक्षा लेते हुए कहा था,—“हे वल्लभ (अनुपम)! सुनो, श्रीकृष्ण परम मधुर हैं। श्रीकृष्णमें सौन्दर्य, माधुर्य तथा प्रेमरूपी विलास असीम है। इसलिये तुम हम दोनोंके साथ मिलकर श्रीकृष्णका भजन करो। हम तीनों भाई एक साथ श्रीकृष्णकथाके आनन्दमें डूबे रहेंगे॥” 33-35॥ दोनों बड़े भाइयोंके अत्यधिक अनुरोध करनेपर एकान्तिक श्रीअनुपमका थोड़े समयके लिये चित्त-परिवर्तन :— एइमत बार बार कहि दुइजन। आमा-दुँहार गौरवे किछु फिरि' गेल मन॥ 36॥ श्रीअनुपमकी कृष्णभजन करनेकी इच्छा :— “तोमा दुँहार आज्ञा आमि केमने लङ्घिमु? दीक्षा-मन्त्र देह', कृष्ण-भजन करिमु॥” 37॥ अनुवाद—इस प्रकार हम दोनों बार बार उसे ऐसा कहने लगे, तो हम दोनोंके प्रति सम्मानके कारण अनुपमका मन कुछ परिवर्तित हो गया। अनुपमने हमसे कहा,—“मैं आप दोनों भाईयोंकी आज्ञाका कैसे उल्लङ्घन करूँ? आप मुझे दीक्षा-मन्त्र प्रदान कीजिये जिससे मैं भी कृष्ण-भजन करूँ॥” 36-37॥ श्रीरामके भजनका परित्याग करनेके कारण श्रीअनुपमकी चिन्ता और व्याकुलता :— एत कहि' रात्रिकाले करेन चिन्तन। ‘केमने छाड़िमु रघुनाथेर चरण॥’ 38॥ क्रन्दन, जागरण और निवेदन :— सब रात्रि क्रन्दन करि' कैल जागरण। प्रातःकाले आमा दुँहाय कैल निवेदन॥ 39॥ श्रीअनुपमकी गम्भीर एकान्तिक रामनिष्ठा :— “रघुनाथेर पादपद्मे बेचियाछोँ माथा। काड़िते ना पारोँ माथा, पाङ बड़ व्यथा॥ 40॥ कृपा करि' मोरे आज्ञा देह' दुइजन। जन्मे-जन्मे सेवों रघुनाथेर चरण॥ 41॥