भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2123

106 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/19-28 ] अपने प्रिय भक्तवरको आलिङ्गन करनेके लिये भगवान्‌का आगे जाना, श्रीसनातनका दूर भागना और दैन्यपूर्ण उक्ति :— सनातने आलिङ्गिते प्रभु आगु हैला। पाछे भागे सनातन कहिते लागिला ॥ 19 ॥ “मोरे ना हुँइह प्रभु, पड़ों तोमार पाय। एके नीचजाति अधम, आर कण्डूरसा गाय ॥” 20 ॥ अनुवाद—महाप्रभु श्रीसनातन गोस्वामीको आलिङ्गन करनेके लिये जैसे ही आगे बढ़े, श्रीसनातन गोस्वामी पीछे भागते हुए कहने लगे,—“हे महाप्रभु! मैं आपके चरणोंमें पड़ता हूँ, आप कृपया मुझे स्पर्श मत कीजिये, मैं अधम हूँ और नीचजातिका भी हूँ, उसपर मेरे शरीरमें खाजके कारण पीब निकल रही है ॥” 19-20 ॥ बलपूर्वक भगवान्‌के द्वारा अपने प्रिय भक्तवरका आलिङ्गन :— बलात्कारे प्रभु ताँरे आलिङ्गन कैल। कण्डूक्लेद महाप्रभुर श्रीअङ्गे लागिल ॥ 21 ॥ अनुवाद—परन्तु महाप्रभुने बलपूर्वक श्रीसनातन गोस्वामीका आलिङ्गन किया जिससे पीब महाप्रभुके श्रीअङ्गोंपर लग गयी ॥ 21 ॥ भक्तोंके साथ श्रीसनातनका मिलन :— सब भक्तगणे प्रभु मिलाइला सनातने। सनातन कैला सबार चरण वन्दने ॥ 22 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने अपने उपस्थित सभी भक्तोंके साथ श्रीसनातन गोस्वामीका परिचय करवाया। श्रीसनातन गोस्वामीने सभी भक्तोंके चरणोंकी वन्दना की ॥ 22 ॥ दीनतापूर्वक श्रीहरिदास और श्रीसनातनका भक्तोंसे नीचे बैठना :— प्रभु लञा बसिला पिण्डार उपरे भक्तगण। पिण्डार तले बसिला हरिदास, सनातन ॥ 23 ॥ अनुवाद—महाप्रभु अपने भक्तोंको साथमें लेकर एक चबूतरेपर बैठ गये, श्रीहरिदास ठाकुर तथा श्रीसनातन गोस्वामी चबूतरेके नीचे बैठे ॥ 23 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातन और ब्रजवासी भक्तोंके कुशलकी जिज्ञासा और श्रीसनातनका उत्तर :— कुशलवार्त्ता महाप्रभु पुछेन सनातने। तेँह कहेन,—“परम मङ्गल देखिनु चरणे ॥” 24 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसनातनसे उनके कुशल-मङ्गलके विषयमें पूछा। श्रीसनातनने कहा,—“आपके चरणकमलोंके दर्शन हो गये, इसलिये सभी परम मङ्गल है ॥” 24 ॥ मथुरार वैष्णव-सबेर कुशल पुछिला। सबार कुशल सनातन जानाइला ॥ 25 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीसे मथुराके समस्त वैष्णवोंका कुशल-मङ्गल पूछा। श्रीसनातन गोस्वामीने उन सभीकी कुशलताके विषयमें बतलाया ॥ 25 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनको श्रीरूप और श्रीअनुपमका संवाद-प्रदान :— प्रभु कहे,—“इँहा रूप छिल दशमास। इँहा हैते गौड़े गेला, हैल दिन दश ॥ 26 ॥ तोमार भाइ अनुपमेर हैल गङ्गा-प्राप्ति। भाल छिल रघुनाथे दृढ़ ताँर भक्ति ॥” 27 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“रूप दस महीने तक यहीं था। वह यहाँसे दस दिन पहले ही गौड़देश गया है। तुम्हारे भाई अनुपमको गङ्गा-प्राप्ति हुई है। वह बहुत अच्छा भक्त था, उसकी श्रीरघुनाथमें दृढ़ भक्ति थी ॥” 26-27 ॥ श्रीसनातनके द्वारा अपने विषयमें दैन्य-उक्ति और महाप्रभुकी अयाचित कृपाकी महिमाका वर्णन :— सनातन कहे,—“नीच-वंशे मोर जन्म। अधर्म, अन्याय यत,—आमार कुलधर्म ॥ 28 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,—“मेरा जन्म