श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2122, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 4/9-18 चौथा अध्याय 105 अनुवाद—श्रीजगन्नाथके सेवक सेवाके कार्योंसे मन्दिरके पास आते-जाते हैं, उनके साथ स्पर्श होनेपर मेरा अपराध होगा॥9॥ पुरीमें श्रीजगन्नाथके रथके आगे महाप्रभुके नृत्यके समय देहत्यागका सङ्कल्प :- ताते यदि एइ देह भाल-स्थाने दिये। दुःख-शान्ति हय आर सद्गति पाइये॥10॥ अनुवाद—इसलिये यदि इस शरीरको किसी अच्छे स्थानपर त्याग किया तो दुःखसे छुटकारा मिल जायेगा और साथ ही मुझे सद्गतिकी भी प्राप्ति होगी॥10॥ जगन्नाथ रथयात्राय हइबेन बाहिर। ताँर रथ-चाकाय छाड़िमु एइ शरीर॥11॥ अनुवाद—जब श्रीजगन्नाथ रथयात्राके समय मन्दिरसे बाहर आयेंगे, तब मैं उनके रथके पहियेके नीचे आकर इस शरीरका त्याग कर दूँगा॥11॥ महाप्रभुर आगे, आर देखि' जगन्नाथ। रथे देह छाड़िमु,—एइ परम-पुरुषार्थ॥'12॥ अनुवाद—मैं महाप्रभुके सामने ही श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करके रथके पहियेके नीचे शरीर त्याग करूँगा,—यही मेरे लिये परम पुरुषार्थ होगा॥'12॥ ठाकुर श्रीहरिदासके स्थानपर आगमन :- एइ त' निश्चय करि' नीलाचले आइला। लोके पुछि' हरिदास-स्थाने उत्तरिला॥13॥ अनुवाद—ऐसा निश्चय करके श्रीसनातन गोस्वामी नीलाचलमें आये। लोगोंसे पूछ-पूछकर वे श्रीहरिदास ठाकुरकी भजन कुटियापर आ पहुँचे॥13॥ श्रीहरिदासको प्रणाम, श्रीहरिदासके द्वारा आलिङ्गन :- हरिदासरे कैला तँह चरण वन्दन। जानि' हरिदास ताँरे कैला आलिङ्गन॥14॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने श्रीहरिदास ठाकुरके चरणोंकी वन्दना की। श्रीहरिदास ठाकुर उन्हें जानते थे, इसलिये उनका आलिङ्गन किया॥14॥ महाप्रभुके चरणोंके दर्शनके लिये व्याकुल श्रीसनातन :- महाप्रभु देखिते ताँर उत्कण्ठित मन। हरिदास कहे,—“प्रभु आसिबेन एखन॥”15॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीका मन महाप्रभुके दर्शनके लिये उत्कण्ठित हो रहा था। श्रीहरिदास ठाकुरने उन्हें कहा,—“महाप्रभु अभी आने ही वाले हैं॥”15॥ महाप्रभुका आगमन :- हेनकाले प्रभु 'उपलभोग' देखिया। हरिदासे मिलिते आइला भक्तगण लञा॥16॥ अनुवाद—उसी समय महाप्रभु भगवान् श्रीजगन्नाथके 'उपलभोग'का दर्शन करके अपने भक्तों सहित श्रीहरिदास ठाकुरसे मिलनेके लिये आये॥16॥ दोनोंके द्वारा महाप्रभुको प्रणाम, महाप्रभुके द्वारा श्रीहरिदासका आलिङ्गन :- प्रभु देखि' दुँहे पड़े दण्डवत् हञा। प्रभु आलिङ्गिला हरिदासरे उठाञा॥17॥ अनुवाद—महाप्रभुको देखकर दोनोंने दण्डवत् प्रणाम किया। महाप्रभुने श्रीहरिदास ठाकुरको उठाकर उनका आलिङ्गन किया॥17॥ श्रीसनातनके आगमनसे महाप्रभुमें विस्मय और प्रीति :- हरिदास कहे,—“सनातन करे नमस्कार।” सनातने देखि' प्रभु हैला चमत्कार॥18॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“महाप्रभु! सनातन आपको प्रणाम कर रहा है।” श्रीसनातन गोस्वामीको देखकर महाप्रभु आश्चर्यचकित हो गये॥18॥