भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2121

104 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/1-9 ] अनुभाष्य— श्रीगौरः (महाप्रभुः) वृन्दावनात् पुनः प्राप्तं (काशीमिलनानन्तरं क्षेत्रमागतं) श्रीसनातनं [प्रभुं] स्नेहात् देहपातात् (शरीरनाशात्) अवन् (रक्षन्) परीक्षया शुद्धं चक्रे। श्लोक-भावानुवाद—श्रीगौरचन्द्रने काशीमें मिलनेके पश्चात् श्रीक्षेत्रमें वृन्दावनसे आये श्रीसनातनकी स्नेहवशतः शरीर नाशसे रक्षा करके परीक्षा लेकर शुद्ध किया था॥1॥ सपार्षद श्रीगौरको जय-प्रदान :- जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥2॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो और श्रीगौरभक्तवृन्दकी जय हो॥2॥ श्रीरूपका पुरीसे गौड़-गमन, श्रीसनातनका वृन्दावनसे पुरीमें आगमन :- नीलाचल हैते रूप गौड़े यबे गेला। मथुरा हैते सनातन नीलाचल आइला॥3॥ अनुवाद—जब श्रीरूप गोस्वामी नीलाचलसे गौड़देश गये, तभी श्रीसनातन गोस्वामी मथुरासे नीलाचल पहुँचे॥3॥ झारिखण्डके मार्गमें बहुत कष्ट सहन करके पुरीमें आगमन :- झारिखण्ड-वनपथे आइला एकेला चलिया। कभु उपवास, कभु चर्वण करिया॥4॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी झारिखण्डके वनमार्गसे अकेले चलते हुए आये। उन्होंने मार्गमें कभी तो उपवास किया और कभी कुछ खा लिया॥4॥ बाहरसे देखनेसे श्रीसनातनके सभी अङ्गोंमें खाजका दिखलायी देना :- झारिखण्डेर जलेर दोषे, उपवास हैते। गात्रे कण्डु हैल, रसा पड़े खाजुयाइते॥5॥ अनुवाद—झारिखण्डके गन्दे जलके कारण और उपवास करनेसे श्रीसनातन गोस्वामीके शरीरमें खाज हो गयी। शरीरमें खाजके कारण वे खुजली करते और खुजली करनेसे पीब बहने लगती॥5॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'खाजुयाइते'—खुजलीवाले स्थानको खुजलानेसे॥5॥ मार्गमें श्रीसनातनकी निराशा और आत्मदैन्यपूर्ण उक्ति :- निर्वेद हइल पथे, करेन विचार। 'नीच-जाति, देह मोर—अत्यन्त असार॥6॥ अनुवाद—मार्गमें चलते हुए श्रीसनातन गोस्वामीके हृदयमें ग्लानि और निराशा हुई और वे विचार करने लगे,—'मैं नीच जातिका हूँ और मेरा शरीर भजनके अत्यन्त अयोग्य है॥6॥ अनुभाष्य—'निर्वेद'—विरक्ति; 'असार',—कृष्णभजनके अयोग्य॥6॥ जगन्नाथे गेले ताँर दर्शन ना पाइमु। प्रभुर दर्शन सदा करिते नारिमु॥7॥ अनुवाद—श्रीजगन्नाथपुरीमें जानेपर भी मैं भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन नहीं कर पाऊँगा और सदैव महाप्रभुके भी दर्शन नहीं कर पाऊँगा॥7॥ मन्दिर-निकटे शुनि ताँर वासा-स्थिति। मन्दिर-निकटे याइते मोर नाहि शक्ति॥8॥ अनुवाद—मैंने सुना है कि महाप्रभुका वासस्थान श्रीजगन्नाथ मन्दिरके निकट ही है और मन्दिरके निकट जानेकी शक्ति (योग्यता) मुझमें नहीं है॥8॥ स्वयंको प्राकृत अपवित्र जीव समझकर मर्यादाके उल्लङ्घनका भय :- जगन्नाथेर सेवक फेरे कार्य-अनुरोधे। ताँर स्पर्श हैले मोर हबे अपराधे॥9॥