श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2120, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय कथासार—श्रीसनातन गोस्वामी मथुरामण्डलसे अकेले झारिखण्डके वनमार्गसे पुरुषोत्तम क्षेत्र (श्रीजगन्नाथपुरी)में आये। मार्गमें गन्दे जल और उपवासके कारण उनके शरीरमें पीब निकलनेवाली खाजका रोग हो गया। खाजकी यातनासे उन्होंने मनमें विचार किया,—“मैं महाप्रभुके सामने ही श्रीजगन्नाथके रथके पहियेके नीचे इस शरीरका परित्याग करूँगा।” पुरुषोत्तममें आकर वे श्रीहरिदासके वासस्थानपर रहे। महाप्रभु श्रीसनातनको देखकर बड़े हर्षित हुए। बादमें महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीको अनुपमकी गङ्गाप्राप्तिकी बात और श्रीरामके चरणोंके प्रति उनकी निष्ठाकी बात बतलायी। एकदिन महाप्रभुने श्रीसनातनसे कहा,—“देहत्याग आदि तामसिक धर्म हैं,—देहत्यागके द्वारा कृष्णप्रेम प्राप्त नहीं किया जा सकता; तुम इस तमोबुद्धिका परित्याग करो। तुम्हारा शरीर तुमने मुझे अर्पित किया है, इसलिये तुम्हें इस शरीरको परित्याग करनेका कोई अधिकार नहीं है। तुम्हारे इस शरीरके द्वारा मैं अनेक भक्तिशास्त्रोंका प्रचार और वृन्दावनमें लुप्त तीर्थोंका उद्धार करूँगा।” महाप्रभुके उठकर चले जानेपर श्रीहरिदास और श्रीसनातनमें बहुत बातचीत हुई। एकदिन महाप्रभुने श्रीसनातनको यमेश्वर तोटामें बुला भेजा, श्रीसनातन समुद्रके पथसे वहाँ गये। महाप्रभुके द्वारा पूछनेपर श्रीसनातनने कहा,—“सिंहद्वारके मार्गसे श्रीजगन्नाथके सेवक आते-जाते हैं, इसलिये मैं बालूके मार्गसे आया हूँ। मेरे पैरोंमें जो फफोले पड़ गये हैं, मुझे उसका पता ही नहीं चला।” श्रीसनातनके इन मर्यादा-स्थापक वचनोंको सुनकर महाप्रभु सन्तुष्ट हुए। पीब महाप्रभुके शरीरमें लगेगी, इसी कारण श्रीसनातन महाप्रभुसे दूर-दूर रहते, किन्तु महाप्रभु बलपूर्वक उनका आलिङ्गन करते। इस बातसे श्रीसनातनने बहुत दुःखी होकर श्रीजगदानन्द पण्डितसे परामर्श किया, तो श्रीजगदानन्द पण्डितने उन्हें रथयात्राके बाद वृन्दावन जानेका उपदेश दिया। महाप्रभुने यह सुनकर श्रीजगदानन्दका कुछ तिरस्कार किया और उनकी अपेक्षा श्रीसनातनके श्रेष्ठत्वको दिखलाया। महाप्रभुने और भी कहा,—“तुम शुद्धभक्त हो, तुम्हारी देहका भद्र या अभद्र होना, यह विचार करने योग्य नहीं है। विशेषतः मैं संन्यासी हूँ, मेरे द्वारा वैसा विचार करना उचित नहीं है।” अन्तमें उन्होंने कहा,—“तुम मेरे लालनीय हो एवं मैं लालक [प्यार करनेवाला] हूँ, इसलिये तुम्हारी पीबके प्रति मेरी घृणा नहीं है।” इन सब प्रसङ्गोंके बाद महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनको आलिङ्गन करनेसे ही श्रीसनातनके अङ्गोंसे पीब-खाज आदि सब कुछ दूर हो गये। उस वर्ष श्रीसनातनको पुरीमें ही रखकर महाप्रभुने (अगले वर्ष उन्हें) श्रीवृन्दावन जानेकी आज्ञा दी। श्रीसनातन भी उनकी आज्ञानुसार वनपथसे होते हुए वृन्दावन चले गये। इधर श्रीरूप गोस्वामी महाप्रभुके चरणकमलोंसे विदायी लेकर, गौड़देशमें एक वर्ष तक रहकर कुटुम्ब, ब्राह्मण और देवालयमें सम्पूर्ण धनको बाँटनेके बाद वृन्दावनमें जाकर श्रीसनातनसे मिले। इसके पश्चात् श्रीकविराज गोस्वामीने श्रीरूप, श्रीसनातन और श्रीजीव गोस्वामी द्वारा रचित ग्रन्थोंके नामोंका उल्लेख किया है। —(अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीसनातनकी देहत्यागके सङ्कल्पसे रक्षा करनेवाले श्रीगौरसुन्दर :— वृन्दावनात् पुनः प्राप्तं श्रीगौरः श्रीसनातनम्। देहपातादवन् स्नेहात् शुद्धं चक्रे परीक्षया ॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीगौरचन्द्रने वृन्दावनसे आये श्रीसनातनको स्नेहवशतः देहत्यागसे उद्धार करके परीक्षा लेकर शुद्ध किया था ॥ 1 ॥