श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2092, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 3/60-62 तीसरा अध्याय 75 ]
सम्पद्यते। तथा देहभरणाद्यर्थमपि नामसेवनेन मुख्यं फलमाशु न सिध्यतीत्याह—तच्चेदिति। तन्नाम चेत् यदि देहादिमध्ये निक्षिप्तं, देहभरणाद्यर्थमेव विन्यस्तं, तदापि फलजनकं न भवति किम्? अपि तु भवत्येव, किन्तु अत्र इहलोके शीघ्रं न भवति, किन्तु विलम्बेनैव भवतीत्यर्थः।” [अर्थात् “श्रीनाम 'वाचि गत' अर्थात् प्रसङ्गवशतः जिह्वापर प्रवृत्त होनेपर भी, 'स्मरणपथगत' अर्थात् किसी प्रकारसे मनसे स्पृष्ट होनेपर भी, 'श्रोत्रमूलं गत' अर्थात् थोड़ासा सुनायी देनेपर भी, शुद्धवर्ण अथवा अशुद्धवर्ण होनेपर भी एवं 'व्यवहितरहित'-व्यवहित अर्थात् शब्दान्तरके द्वारा जो व्यवधान, जैसे, (1) विचाराधीन 'नारायण'-शब्दके किञ्चित् उच्चारणके बाद प्रसङ्गवशतः आये किसी अन्य शब्द, उस प्रकारके व्यवधानसे रहित होकर, अथवा (2) यद्यपि 'हलं रिक्तम्', इस प्रकारकी उक्तिमें 'ह'-कार और 'रि'-कार इन दोनोंकी वृत्तिके द्वारा 'हरि', यह नाम बनता है, उसी प्रकार 'राजमहिषी'—कहनेपर उसमें 'राम' नाम भी होता है, इस प्रकार नहीं कहे गये अन्य जो सब नाम होते हैं, तथापि उन-उन नामोंके बीचमें व्यवधान उत्पन्न करनेवाले अन्य जो अक्षर वर्तमान रहते हैं, उस प्रकारके व्यवधानसे रहित—यही अर्थ है; अथवा (3) 'व्यवहितरहित'के अर्थमें 'व्यवहित' और 'उससे रहित', इनका इस प्रकार अर्थ भी होता है—यहाँपर 'व्यवहित'का अर्थ है—नामके किञ्चित् उच्चारणके पश्चात् किसी भी प्रकारसे आये अन्य शब्दको संलग्न करनेके पश्चात् नामके बचे हुए अक्षरको ग्रहण करना, इस प्रकारके बाधायुक्त-रूप अर्थात् शब्दान्तरके द्वारा बदला हुआ (व्यवहित) यही अर्थ, एवं 'तद्रहित'का अर्थ—नामका बचा हुआ जो अक्षर है, उसे ग्रहण किये बिना अर्थात् किसी अंशमें हीन (कम), यह अर्थ; तथापि उक्त नाम 'तारयत्येव' अर्थात् सब प्रकारके पापोंसे एवं अपराधोंसे यहाँ तक कि संसारसे भी उद्धार करता है—यह सत्य ही है; किन्तु नामसेवनका जो मुख्य फल है, वह शीघ्र ही प्राप्त नहीं होता। और देहभरणादिके लिये नामसेवनके द्वारा मुख्य फल शीघ्र सिद्ध नहीं होता—यही 'तच्चेद्' इत्यादि अंशसे कहा जा रहा है। वह नाम यदि देहादिमें निक्षिप्त होता है अर्थात् देहभरणादिके लिये विन्यस्त (रचित) होता है, ऐसा होनेपर भी क्या वह फलजनक नहीं होता? निश्चय ही होता है, तब भी 'अत्र' अर्थात् इस लोकमें, शीघ्र नहीं होता, किन्तु विलम्बसे होता है—यह अर्थ है।] मध्यलीला 16/72 संख्याका अनुभाष्य एवं भक्तिसन्दर्भकी 265 संख्यामें श्रीजीवप्रभुके द्वारा रचित इस श्लोककी कारिका देखें॥ 60॥ नामाभाससे समस्त अनर्थोंकी निवृत्ति :— नामाभास हैते हय सर्वपापक्षय। नामाभास हैते हय संसारेर क्षय॥ 61॥ अनुवाद—नामाभाससे समस्त प्रकारके पापोंका नाश होता है और नामाभाससे संसार-बन्धन कट जाता है॥ 61॥ नामाभाससे महापातकका नाश :— भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/103)— तं निर्व्याजं भज गुणनिधे पावनं पावनानां श्रद्धा-रज्यन्मतिरतितरामुत्तमःश्लोकमौलिम्। प्रोद्यन्नन्तःकरणकुहरे हन्त यन्नामभानो- राभासोऽपि क्षपयति महापातकध्वान्तराशिम्॥ 62॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 62॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे गुणनिधे, आप परमपावन उत्तमःश्लोक शिरोमणि श्रीकृष्णका श्रद्धामूलक मतिके साथ अति शीघ्र सरलभावसे भजन करो; क्योंकि उनके नामरूपी सूर्यका आभास भी अन्तःकरणमें उदित होनेपर महापापरूपी अन्धकारसमूहको विनष्ट कर देता है॥ 62॥ अनुभाष्य— हे गुणनिधे, यन्नामभानोः (यस्य भगवतः नाम एव भानुः भास्करः तस्य नामरूपिणः सूर्यस्य) आभासः