भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2190

[ 6/58-66 छठा अध्याय 173 केले, चीनी, घी और कर्पूरको भी मिला दिया॥ 58 ॥ प्रभुका चबूतरेके ऊपर बैठना :- धूति परि' प्रभु यदि पिण्डाते बसिला। सातकुण्डी विप्र ताँर आगेते धरिला ॥ 59 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु जब नयी धोती पहनकर चबूतरेपर बैठे, तब ब्राह्मणने सात बड़ी हाण्डियाँ उनके सामने रख दीं ॥ 59 ॥ वटवृक्षके नीचे चबूतरेके ऊपर प्रभुके सङ्गी भक्तोंका बैठना :- चबुतरा-उपरे यत प्रभुर निजगणे। बड़ बड़ लोक बसिला मण्डली-रचने ॥ 60 ॥ श्रीनित्यानन्दप्रभुके गणोंका बैठना :- रामदास, सुन्दरानन्द, दास-गदाधर। मुरारि, कमलाकर, सदाशिव, पुरन्दर ॥ 61 ॥ धनञ्जय, जगदीश, परमेश्वर-दास। महेश, गौरीदास, होड़-कृष्णदास ॥ 62 ॥ उद्धारण आदि यत, आर निजजन। उपरे बसिला सब, के करे गणन?? 63 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके अपने अन्तरङ्ग भक्त श्रीरामदास, श्रीसुन्दरानन्द, श्रीदास-गदाधर, श्रीमुरारि, श्रीकमलाकर, श्रीसदाशिव, श्रीपुरन्दर, श्रीधनञ्जय, श्रीजगदीश, श्रीपरमेश्वर दास, श्रीमहेश, श्रीगौरीदास, श्रीहोड़ कृष्णदास और श्रीउद्धारण दत्त आदि श्रीनित्यानन्द प्रभुके चारों ओर मण्डली बनाकर चबूतरेपर ही बैठ गये। चबूतरेपर बैठनेवाले जितने सब भक्त थे उनकी कौन गणना कर सकता है ? 60-63 ॥ अनुभाष्य— 'चबूतरा',—आङ्गन, ड्योढ़ी, घरकी भूमिके अन्यान्य स्थानोंसे संलग्न ऊँचा स्थान। 'रामदास',—अभिरामठाकुर (गोपाल), आदुलीला 10/116 और 118 संख्या एवं आदुलीला 11/13 और 16 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'सुन्दरानन्द',—आदुलीला 11/23 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'दास-गदाधर',—आदुलीला 10/53 संख्याका अनुभाष्य और आदुलीला 11/13, 14, 17 संख्या देखें। 'मुरारि',—इस स्थानपर मुरारि-चैतन्यदास (नित्यानन्द-गण, इसलिये 'मुरारि गुप्त' नहीं)—आदुलीला 11/20 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'कमलाकर',—आदुलीला 11/24 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'सदाशिव',—आदुलीला 11/38 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'पुरन्दर',—आदुलीला 11/28 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'धनञ्जय',—आदुलीला 11/31 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'जगदीश',—आदुलीला 11/30 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'परमेश्वर-दास',—आदुलीला 11/29 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'महेश',—आदुलीला 11/32 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'गौरीदास',—आदुलीला 11/26 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'कृष्णदास होड़',—आदुलीला 11/47 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'उद्धारण',—आदुलीला 11/41 संख्याका अनुभाष्य देखें॥ 60-63 ॥ वैष्णवोंमें जातिबुद्धि रहित ब्राह्मणोंके द्वारा महाप्रसादका सम्मान :- शुनि' पण्डित भट्टाचार्य यत विप्र आइला। मान्य करि' प्रभु सबारे उपरे बसाइला ॥ 64 ॥ अनुवाद—महोत्सवकी बात सुनकर पण्डित, भट्टाचार्य आदि जितने ब्राह्मण आये, श्रीनित्यानन्द प्रभुने उन सबको सम्मानपूर्वक ऊपर चबूतरेपर बैठाया ॥ 64 ॥ दुइ दुइ मृत्कुण्डिका सबार आगे दिल। एके दुग्ध-चिड़ा, आरे दधि-चिड़ा कैल ॥ 65 ॥ अनुवाद—दो-दो मिट्टीके पात्र सबके आगे रखे गये। एक पात्रमें घने दूधमें मिलाया गया चिड़वा और दूसरेमें दही आदिमें मिलाया गया चिड़वा परोसा गया ॥ 65 ॥ आर यत लोक सब चौतरा-तलाने। मण्डली-बन्धे बसिला, तार ना हय गणने ॥ 66 ॥