श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें172 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/49-58 ] अपने भक्तोंके भोजन करानेके लिये श्रीरघुनाथको आदेशरूपी दण्ड देना; अर्थात् दण्ड-महोत्सव-लीलाके द्वारा धनवान भोगी विषयीका नित्यानन्दगणों अर्थात् शुद्धभक्तोंकी सेवासे ही कंजूसिरूपी अनर्थका नाश और नित्यमङ्गल उदयरूपी शिक्षा प्रदान करना :- “निकटे ना आइस, चोरा, भाग' दूरे दूरे। आजि लाग् पाञाछि, दण्डिमु तोमारे ॥ 50 ॥ दधि, चिड़ा भक्षण कराह मोर गणे।” शुनि' आनन्द हैल रघुनाथेर मने ॥ 51 ॥ अनुवाद—कौतुक करनेवाले श्रीनित्यानन्द प्रभु स्वभावसे ही दयामय हैं। सदय होकर उन्होंने श्रीरघुनाथसे कहा,—“ओ चोर! तुम निकटमें नहीं आ रहे हो, दूर-दूर भागते रहते हो। किन्तु आज तुम पकड़में आ गये हो, मैं तुम्हें दण्ड दूँगा। तुम दही और चिड़वा लाकर मेरे भक्तोंको खिलाओ।” श्रीनित्यानन्द प्रभुके वचन सुनकर श्रीरघुनाथदासके हृदयमें बहुत आनन्द हुआ ॥ 49-51 ॥ अनुभाष्य—'लाग्',—स्पर्श, साक्षात्कार, सन्धान, सङ्ग ॥ 50 ॥ अपने गाँवसे चिड़ा-महोत्सवके लिये द्रव्यादि मँगावाना :- सेइक्षणे निज-लोक पाठाइला ग्रामे । भक्ष्यद्रव्य लोक सब ग्राम हैते आने ॥ 52 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदासने उसी समय अपने सेवकोंको सारी खाद्य-सामग्री लेकर वहाँ लानेके लिये गाँवमें भेजा ॥ 52 ॥ चिड़ा, दधि, दुग्ध, सन्देश, आर चिनि, कला। सब द्रव्य आनाञा चौदिके धरिला ॥ 53 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदासने चिड़वा, दही, दूध, सन्देश, चीनी और केला—इन सब सामग्रियोंको मँगवाकर चारों ओर रख दिया ॥ 53 ॥ महोत्सव-वर्णन :- 'महोत्सव'-नाम शुनि' ब्राह्मण-सज्जन। आसिते लागिल लोक असंख्य-गणन ॥ 54 ॥ अनुवाद—'महोत्सव'का नाम सुनकर ब्राह्मण और सज्जन व्यक्ति वहाँपर आने लगे। इस प्रकार वहाँ असंख्य लोग एकत्रित हो गये ॥ 54 ॥ आर ग्रामान्तर हैते सामग्री आनिल। शत दुइ-चारि होल्ना आनाइल ॥ 55 ॥ अनुवाद—लोगोंकी इतनी बड़ी संख्या देखकर श्रीरघुनाथ दासने अन्य-अन्य गाँवोंसे भी खाद्य-सामग्री मँगवायी। उन्होंने दो-चार सौ मिट्टीके बने पात्र भी मँगवाये ॥ 55 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'होल्ना',—मिट्टीके विशेष पात्र (माल्सा अर्थात् मिट्टीके छोटे पात्र) ॥ 55 ॥ बड़ बड़ मृत्कुण्डिका आनाइल पाँच साते। एक विप्र प्रभु लागि' चिड़ा भिजाय ताते ॥ 56 ॥ अनुवाद—उन्होंने पाँच-सात बड़ी-बड़ी मिट्टीकी बनी हाण्डियाँ भी मँगवायी। एक ब्राह्मण उन हाण्डियोंमें श्रीनित्यानन्द प्रभुकी प्रसन्नताके लिये चिड़वा भिगोने लगे ॥ 56 ॥ एक-ठाञि तप्त-दुग्धे चिड़ा भिजाञा। अर्द्धेक छानिल दधि, चिनि, कला दिया ॥ 57 ॥ अनुवाद—एक स्थानपर उन हाण्डियोंमें गर्म दूधमें चिड़वा भिगोया गया। उसमें-से आधे चिड़वेमें दही, चीनी तथा केला मिलाया गया ॥ 57 ॥ अर्द्धेक घनावृत-दुग्धेते छानिल। चाँपाकला, चिनि, घृत, कर्पूर ताते दिल ॥ 58 ॥ अनुवाद—बचे हुए आधे चिड़वेको घने दूधमें मिला दिया। फिर उसमें चाँपाकलाके नामसे प्रसिद्ध विशेष