भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2188

[ 6/40-49 छठा अध्याय 171 अमृतप्रवाह भाष्य—'प्रारब्ध'—पूर्व जन्मोंके वे सब कर्म, जो फलोन्मुखी हुए हैं॥40॥ श्रीचैतन्यमें आविष्ट सेवक ही मुक्त अथवा अप्राकृत :- चैतन्यचन्द्रेर कृपा हञाछे इँहारे। चैतन्यप्रभुर 'बातुल' के राखिते पारे??"41॥ अनुवाद—इसपर श्रीचैतन्यचन्द्रकी कृपा हुई है। श्रीचैतन्य महाप्रभुके लिये 'पागल' व्यक्तिको कौन बाँधकर रख सकता है?"41॥ श्रीनित्यानन्दप्रभुके पाणिहाटीमें आनेपर श्रीरघुनाथके द्वारा उनके चरण-दर्शन :- तबे रघुनाथ किछु विचारिला मने। नित्यानन्द-गोसाञिर पाश चलिला आर दिने॥42॥ अनुवाद—तब श्रीरघुनाथदासने मनमें कुछ विचार किया और अगले दिन वे श्रीनित्यानन्द-गोसाईंके दर्शनके लिये चल दिये॥42॥ श्रीनित्यानन्दप्रभुके साथ बहुतसे सेवक और कीर्त्तन-गान करनेवाले :- पाणिहाटि-ग्रामे पाइला प्रभुर दरशन। कीर्त्तनीया सेवक सङ्गे आर बहुजन॥43॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदासको पाणिहाटि-ग्राममें श्रीनित्यानन्द प्रभुके दर्शन हुए। श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ कीर्त्तन करनेवाले और अन्यान्य बहुतसे सेवक थे॥43॥ गङ्गाके तटपर वृक्षके नीचे बने चबूतरेपर श्रीनित्यानन्द प्रभु एवं उनके सङ्गिगणोंका नीचे बैठना :- गङ्गातीरे वृक्ष-मूले पिण्डार उपरे। बसियाछेन प्रभु—येन सूर्योदय करे॥44॥ अनुवाद—गङ्गाके तटपर वृक्षके नीचे बने चबूतरेपर बैठे हुए श्रीनित्यानन्द प्रभुका ऐसा तेज था मानो सूर्य उदित हुए हों॥44॥ श्रीनित्यानन्दके दर्शनसे श्रीरघुनाथका विस्मय और दण्डवत् प्रणाम :- तले-उपरे बहुभक्त हञाछे वेष्टित। देखि' प्रभुर प्रभाव, रघुनाथ-विस्मित॥45॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु चबूतरेके चारों ओर भूमिपर बैठे हुए बहुतसे भक्तोंसे घिरे हुए थे। श्रीनित्यानन्द प्रभुके प्रभावको देखकर श्रीरघुनाथदास विस्मित हो गये॥45॥ दण्डवत् हञा पड़िला कतदूरे। सेवक कहे,—'रघुनाथ दण्डवत् करे॥'46॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदासने बहुत दूरसे ही श्रीनित्यानन्द प्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया। श्रीनित्यानन्द प्रभुके सेवकने कहा,—'रघुनाथ आपको दण्डवत् प्रणाम कर रहा है॥'46॥ अन्तरङ्ग और निजजन मानकर श्रीरघुनाथके प्रति श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कृपा :- शुनि' प्रभु कहे,—"चोरा दिलि दरशन। आय, आय, आजि तोर करिमु दण्डन॥"47॥ अनुवाद—यह सुनकर श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,—'हे चोर, आज तुम दिखायी दिये हो। आओ, आओ, आज मैं तुम्हें दण्ड दूँगा॥"47॥ श्रीरघुनाथके सिरपर अपने चरण रखकर कृपा :- प्रभु बोलाय, तेंहो निकटे ना करे गमन। आकर्षिया ताँर माथे धरिला चरण॥48॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु श्रीरघुनाथदासको बुला रहे थे, परन्तु वे उनके निकट नहीं जा रहे थे। श्रीनित्यानन्द प्रभुने उन्हें बलपूर्वक अपनी ओर खींचकर उनके सिरपर अपने चरणकमल रख दिये॥48॥ श्रीनित्यानन्दकी अहैतुकी दया :- कौतुकी नित्यानन्द सहजे दयामय। रघुनाथे कहे किछु हञा सदय॥49॥