भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2187

170 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/31–40 ] वजीरको बतलाकर श्रीरघुनाथका बन्धन-खोलना :- उजिरे कहिया रघुनाथे छाड़ाइल। प्रीति करि' रघुनाथे कहिते लागिल ॥ 31 ॥ श्रीहिरण्यदासकी स्वार्थपरायणता और धनके लोभके कारण लोभी मुस्लिम चौधरीके द्वारा भर्त्सना :- “तोमार ज्येठा निर्बुद्धि अष्टलक्ष खाय। आमि—भागी, आमारे किछु दिवारे युयाय ॥ 32 ॥ श्रीरघुनाथके प्रति स्नेह-आर्द्रताके कारण दोनोंका मिलन करवाना :- याह तुमि, तोमार ज्येठारे मिलाह आमारे। ये-मते भाल हय करुन, भार दिलुँ तोरे ॥” 33 ॥ अनुवाद—उस म्लेच्छ चौधरीने वजीरको कहकर श्रीरघुनाथ दासको छुड़वाया और उन्हें बहुत प्यारसे कहने लगा, —“तुम्हारे ताऊ मन्दबुद्धि हैं, वह अकेले आठ लाख मुद्राएँ खा रहे हैं। मैं भी तो उसका भागीदार हूँ, उसमें-से कुछ तो मुझे भी देना चाहिये। अब तुम जाकर अपने ताऊसे मुझे मिलवानेका प्रबन्ध करो। वे जिस प्रकारसे उचित हो, वैसा करें। मैं इसका सारा दायित्व उनके ऊपर छोड़ रहा हूँ॥” 31–33 ॥ रघुनाथ आसि' तबे ज्येठारे मिलाइल। म्लेच्छ-सहित वश कैला—सब शान्त हैल ॥ 34 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ दासने छूटकर अपने ताऊजीको मुस्लिम चौधरीसे मिलवाया। इस प्रकार श्रीरघुनाथ दासने उन दोनोंका समझौता करवा दिया और सब कुछ शान्त हो गया ॥ 34 ॥ इस प्रकार वर्षके अन्तमें पुनः भागनेका प्रयास :- एइमत रघुनाथेर वत्सरेक गेल। द्वितीय वत्सरे पलाइते मन कैल ॥ 35 ॥ अनुवाद—इस प्रकार ज़मीनदारीका कार्य कुशलतासे सम्भालते श्रीरघुनाथ दासका एक वर्ष व्यतीत हो गया। दूसरे वर्ष उन्होंने घर छोड़कर जानेका विचार बनाया ॥ 35 ॥ रात्रिमें भागना, मार्गमें पकड़े जाना और घरमें लाना :- रात्रे उठि' एकेला चलिला पालाञा। दूर हैते पिता ताँरे आनिल धरिया ॥ 36 ॥ अनुवाद—एक रात श्रीरघुनाथ दास उठकर अकेले घरसे निकल पड़े और घरसे दूर चले गये, किन्तु उनके पिताजी उन्हें वहाँसे भी पकड़कर ले आये ॥ 36 ॥ पुनः पुनः भागना और पकड़े जानेपर बाँधे जाना :- एइमते बारे बारे पलाय, धरि' आने। तबे ताँर माता कहे ताँर पिता-सने ॥ 37 ॥ पुत्रके बन्धनके लिये पत्नीके द्वारा अनुरोध करनेपर श्रीगोवर्धनदासकी उक्ति :- “पुत्र ‘बातुल’ हइल, राखह बान्धिया।” ताँर पिता कहे तारे निर्विण्ण हञा ॥ 38 ॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीरघुनाथ दास बार बार घरसे भाग जाते और उनके पिता उन्हें पकड़कर ले आते। तब श्रीरघुनाथदासकी माताने उनके पितासे कहा, —“हमारा पुत्र पागल हो गया है, आप उसे बाँधकर रखो।” श्रीरघुनाथदासके पिताने दुःखित होकर उनसे कहा— ॥ 37–38 ॥ अनुभाष्य—'निर्विण्ण',—कातर अथवा दुःखित ॥ 38 ॥ “इन्द्रसम ऐश्वर्य, स्त्री अप्सरा-सम। ए सब बान्धिते नारिलेक याँर मन ॥ 39 ॥ देहके जनक अथवा शौक्र जन्मदाता पिता जीवके प्रारब्ध- अप्रारब्ध कर्मनाशक नित्यप्रभु अथवा ईश्वर नहीं :- दड़िर बन्धने ताँरे राखिबा केमते? जन्मदाता पिता नारे ‘प्रारब्ध’ खण्डाइते ॥ 40 ॥ अनुवाद— “इन्द्रके समान ऐश्वर्य और अप्सराके समान स्त्री—ये सब भी जिसके मनको नहीं बाँध सके, तो फिर उसे रस्सीके बन्धनमें बाँधकर कैसे रखोगी? जन्मदाता पिता भी पुत्रके प्रारब्धको नहीं मिटा सकता ॥ 39–40 ॥