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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

170 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/31–40 ] वजीरको बतलाकर श्रीरघुनाथका बन्धन-खोलना :- उजिरे कहिया रघुनाथे छाड़ाइल। प्रीति करि' रघुनाथे कहिते लागिल ॥ 31 ॥ श्रीहिरण्यदासकी स्वार्थपरायणता और धनके लोभके कारण लोभी मुस्लिम चौधरीके द्वारा भर्त्सना :- “तोमार ज्येठा निर्बुद्धि अष्टलक्ष खाय। आमि—भागी, आमारे किछु दिवारे युयाय ॥ 32 ॥ श्रीरघुनाथके प्रति स्नेह-आर्द्रताके कारण दोनोंका मिलन करवाना :- याह तुमि, तोमार ज्येठारे मिलाह आमारे। ये-मते भाल हय करुन, भार दिलुँ तोरे ॥” 33 ॥ अनुवाद—उस म्लेच्छ चौधरीने वजीरको कहकर श्रीरघुनाथ दासको छुड़वाया और उन्हें बहुत प्यारसे कहने लगा, —“तुम्हारे ताऊ मन्दबुद्धि हैं, वह अकेले आठ लाख मुद्राएँ खा रहे हैं। मैं भी तो उसका भागीदार हूँ, उसमें-से कुछ तो मुझे भी देना चाहिये। अब तुम जाकर अपने ताऊसे मुझे मिलवानेका प्रबन्ध करो। वे जिस प्रकारसे उचित हो, वैसा करें। मैं इसका सारा दायित्व उनके ऊपर छोड़ रहा हूँ॥” 31–33 ॥ रघुनाथ आसि' तबे ज्येठारे मिलाइल। म्लेच्छ-सहित वश कैला—सब शान्त हैल ॥ 34 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ दासने छूटकर अपने ताऊजीको मुस्लिम चौधरीसे मिलवाया। इस प्रकार श्रीरघुनाथ दासने उन दोनोंका समझौता करवा दिया और सब कुछ शान्त हो गया ॥ 34 ॥ इस प्रकार वर्षके अन्तमें पुनः भागनेका प्रयास :- एइमत रघुनाथेर वत्सरेक गेल। द्वितीय वत्सरे पलाइते मन कैल ॥ 35 ॥ अनुवाद—इस प्रकार ज़मीनदारीका कार्य कुशलतासे सम्भालते श्रीरघुनाथ दासका एक वर्ष व्यतीत हो गया। दूसरे वर्ष उन्होंने घर छोड़कर जानेका विचार बनाया ॥ 35 ॥ रात्रिमें भागना, मार्गमें पकड़े जाना और घरमें लाना :- रात्रे उठि' एकेला चलिला पालाञा। दूर हैते पिता ताँरे आनिल धरिया ॥ 36 ॥ अनुवाद—एक रात श्रीरघुनाथ दास उठकर अकेले घरसे निकल पड़े और घरसे दूर चले गये, किन्तु उनके पिताजी उन्हें वहाँसे भी पकड़कर ले आये ॥ 36 ॥ पुनः पुनः भागना और पकड़े जानेपर बाँधे जाना :- एइमते बारे बारे पलाय, धरि' आने। तबे ताँर माता कहे ताँर पिता-सने ॥ 37 ॥ पुत्रके बन्धनके लिये पत्नीके द्वारा अनुरोध करनेपर श्रीगोवर्धनदासकी उक्ति :- “पुत्र ‘बातुल’ हइल, राखह बान्धिया।” ताँर पिता कहे तारे निर्विण्ण हञा ॥ 38 ॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीरघुनाथ दास बार बार घरसे भाग जाते और उनके पिता उन्हें पकड़कर ले आते। तब श्रीरघुनाथदासकी माताने उनके पितासे कहा, —“हमारा पुत्र पागल हो गया है, आप उसे बाँधकर रखो।” श्रीरघुनाथदासके पिताने दुःखित होकर उनसे कहा— ॥ 37–38 ॥ अनुभाष्य—'निर्विण्ण',—कातर अथवा दुःखित ॥ 38 ॥ “इन्द्रसम ऐश्वर्य, स्त्री अप्सरा-सम। ए सब बान्धिते नारिलेक याँर मन ॥ 39 ॥ देहके जनक अथवा शौक्र जन्मदाता पिता जीवके प्रारब्ध- अप्रारब्ध कर्मनाशक नित्यप्रभु अथवा ईश्वर नहीं :- दड़िर बन्धने ताँरे राखिबा केमते? जन्मदाता पिता नारे ‘प्रारब्ध’ खण्डाइते ॥ 40 ॥ अनुवाद— “इन्द्रके समान ऐश्वर्य और अप्सराके समान स्त्री—ये सब भी जिसके मनको नहीं बाँध सके, तो फिर उसे रस्सीके बन्धनमें बाँधकर कैसे रखोगी? जन्मदाता पिता भी पुत्रके प्रारब्धको नहीं मिटा सकता ॥ 39–40 ॥

[ 6/40-49 छठा अध्याय 171 अमृतप्रवाह भाष्य—'प्रारब्ध'—पूर्व जन्मोंके वे सब कर्म, जो फलोन्मुखी हुए हैं॥40॥ श्रीचैतन्यमें आविष्ट सेवक ही मुक्त अथवा अप्राकृत :- चैतन्यचन्द्रेर कृपा हञाछे इँहारे। चैतन्यप्रभुर 'बातुल' के राखिते पारे??"41॥ अनुवाद—इसपर श्रीचैतन्यचन्द्रकी कृपा हुई है। श्रीचैतन्य महाप्रभुके लिये 'पागल' व्यक्तिको कौन बाँधकर रख सकता है?"41॥ श्रीनित्यानन्दप्रभुके पाणिहाटीमें आनेपर श्रीरघुनाथके द्वारा उनके चरण-दर्शन :- तबे रघुनाथ किछु विचारिला मने। नित्यानन्द-गोसाञिर पाश चलिला आर दिने॥42॥ अनुवाद—तब श्रीरघुनाथदासने मनमें कुछ विचार किया और अगले दिन वे श्रीनित्यानन्द-गोसाईंके दर्शनके लिये चल दिये॥42॥ श्रीनित्यानन्दप्रभुके साथ बहुतसे सेवक और कीर्त्तन-गान करनेवाले :- पाणिहाटि-ग्रामे पाइला प्रभुर दरशन। कीर्त्तनीया सेवक सङ्गे आर बहुजन॥43॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदासको पाणिहाटि-ग्राममें श्रीनित्यानन्द प्रभुके दर्शन हुए। श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ कीर्त्तन करनेवाले और अन्यान्य बहुतसे सेवक थे॥43॥ गङ्गाके तटपर वृक्षके नीचे बने चबूतरेपर श्रीनित्यानन्द प्रभु एवं उनके सङ्गिगणोंका नीचे बैठना :- गङ्गातीरे वृक्ष-मूले पिण्डार उपरे। बसियाछेन प्रभु—येन सूर्योदय करे॥44॥ अनुवाद—गङ्गाके तटपर वृक्षके नीचे बने चबूतरेपर बैठे हुए श्रीनित्यानन्द प्रभुका ऐसा तेज था मानो सूर्य उदित हुए हों॥44॥ श्रीनित्यानन्दके दर्शनसे श्रीरघुनाथका विस्मय और दण्डवत् प्रणाम :- तले-उपरे बहुभक्त हञाछे वेष्टित। देखि' प्रभुर प्रभाव, रघुनाथ-विस्मित॥45॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु चबूतरेके चारों ओर भूमिपर बैठे हुए बहुतसे भक्तोंसे घिरे हुए थे। श्रीनित्यानन्द प्रभुके प्रभावको देखकर श्रीरघुनाथदास विस्मित हो गये॥45॥ दण्डवत् हञा पड़िला कतदूरे। सेवक कहे,—'रघुनाथ दण्डवत् करे॥'46॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदासने बहुत दूरसे ही श्रीनित्यानन्द प्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया। श्रीनित्यानन्द प्रभुके सेवकने कहा,—'रघुनाथ आपको दण्डवत् प्रणाम कर रहा है॥'46॥ अन्तरङ्ग और निजजन मानकर श्रीरघुनाथके प्रति श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कृपा :- शुनि' प्रभु कहे,—"चोरा दिलि दरशन। आय, आय, आजि तोर करिमु दण्डन॥"47॥ अनुवाद—यह सुनकर श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,—'हे चोर, आज तुम दिखायी दिये हो। आओ, आओ, आज मैं तुम्हें दण्ड दूँगा॥"47॥ श्रीरघुनाथके सिरपर अपने चरण रखकर कृपा :- प्रभु बोलाय, तेंहो निकटे ना करे गमन। आकर्षिया ताँर माथे धरिला चरण॥48॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु श्रीरघुनाथदासको बुला रहे थे, परन्तु वे उनके निकट नहीं जा रहे थे। श्रीनित्यानन्द प्रभुने उन्हें बलपूर्वक अपनी ओर खींचकर उनके सिरपर अपने चरणकमल रख दिये॥48॥ श्रीनित्यानन्दकी अहैतुकी दया :- कौतुकी नित्यानन्द सहजे दयामय। रघुनाथे कहे किछु हञा सदय॥49॥

172 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/49-58 ] अपने भक्तोंके भोजन करानेके लिये श्रीरघुनाथको आदेशरूपी दण्ड देना; अर्थात् दण्ड-महोत्सव-लीलाके द्वारा धनवान भोगी विषयीका नित्यानन्दगणों अर्थात् शुद्धभक्तोंकी सेवासे ही कंजूसिरूपी अनर्थका नाश और नित्यमङ्गल उदयरूपी शिक्षा प्रदान करना :- “निकटे ना आइस, चोरा, भाग' दूरे दूरे। आजि लाग् पाञाछि, दण्डिमु तोमारे ॥ 50 ॥ दधि, चिड़ा भक्षण कराह मोर गणे।” शुनि' आनन्द हैल रघुनाथेर मने ॥ 51 ॥ अनुवाद—कौतुक करनेवाले श्रीनित्यानन्द प्रभु स्वभावसे ही दयामय हैं। सदय होकर उन्होंने श्रीरघुनाथसे कहा,—“ओ चोर! तुम निकटमें नहीं आ रहे हो, दूर-दूर भागते रहते हो। किन्तु आज तुम पकड़में आ गये हो, मैं तुम्हें दण्ड दूँगा। तुम दही और चिड़वा लाकर मेरे भक्तोंको खिलाओ।” श्रीनित्यानन्द प्रभुके वचन सुनकर श्रीरघुनाथदासके हृदयमें बहुत आनन्द हुआ ॥ 49-51 ॥ अनुभाष्य—'लाग्',—स्पर्श, साक्षात्कार, सन्धान, सङ्ग ॥ 50 ॥ अपने गाँवसे चिड़ा-महोत्सवके लिये द्रव्यादि मँगावाना :- सेइक्षणे निज-लोक पाठाइला ग्रामे । भक्ष्यद्रव्य लोक सब ग्राम हैते आने ॥ 52 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदासने उसी समय अपने सेवकोंको सारी खाद्य-सामग्री लेकर वहाँ लानेके लिये गाँवमें भेजा ॥ 52 ॥ चिड़ा, दधि, दुग्ध, सन्देश, आर चिनि, कला। सब द्रव्य आनाञा चौदिके धरिला ॥ 53 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदासने चिड़वा, दही, दूध, सन्देश, चीनी और केला—इन सब सामग्रियोंको मँगवाकर चारों ओर रख दिया ॥ 53 ॥ महोत्सव-वर्णन :- 'महोत्सव'-नाम शुनि' ब्राह्मण-सज्जन। आसिते लागिल लोक असंख्य-गणन ॥ 54 ॥ अनुवाद—'महोत्सव'का नाम सुनकर ब्राह्मण और सज्जन व्यक्ति वहाँपर आने लगे। इस प्रकार वहाँ असंख्य लोग एकत्रित हो गये ॥ 54 ॥ आर ग्रामान्तर हैते सामग्री आनिल। शत दुइ-चारि होल्ना आनाइल ॥ 55 ॥ अनुवाद—लोगोंकी इतनी बड़ी संख्या देखकर श्रीरघुनाथ दासने अन्य-अन्य गाँवोंसे भी खाद्य-सामग्री मँगवायी। उन्होंने दो-चार सौ मिट्टीके बने पात्र भी मँगवाये ॥ 55 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'होल्ना',—मिट्टीके विशेष पात्र (माल्सा अर्थात् मिट्टीके छोटे पात्र) ॥ 55 ॥ बड़ बड़ मृत्कुण्डिका आनाइल पाँच साते। एक विप्र प्रभु लागि' चिड़ा भिजाय ताते ॥ 56 ॥ अनुवाद—उन्होंने पाँच-सात बड़ी-बड़ी मिट्टीकी बनी हाण्डियाँ भी मँगवायी। एक ब्राह्मण उन हाण्डियोंमें श्रीनित्यानन्द प्रभुकी प्रसन्नताके लिये चिड़वा भिगोने लगे ॥ 56 ॥ एक-ठाञि तप्त-दुग्धे चिड़ा भिजाञा। अर्द्धेक छानिल दधि, चिनि, कला दिया ॥ 57 ॥ अनुवाद—एक स्थानपर उन हाण्डियोंमें गर्म दूधमें चिड़वा भिगोया गया। उसमें-से आधे चिड़वेमें दही, चीनी तथा केला मिलाया गया ॥ 57 ॥ अर्द्धेक घनावृत-दुग्धेते छानिल। चाँपाकला, चिनि, घृत, कर्पूर ताते दिल ॥ 58 ॥ अनुवाद—बचे हुए आधे चिड़वेको घने दूधमें मिला दिया। फिर उसमें चाँपाकलाके नामसे प्रसिद्ध विशेष

[ 6/58-66 छठा अध्याय 173 केले, चीनी, घी और कर्पूरको भी मिला दिया॥ 58 ॥ प्रभुका चबूतरेके ऊपर बैठना :- धूति परि' प्रभु यदि पिण्डाते बसिला। सातकुण्डी विप्र ताँर आगेते धरिला ॥ 59 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु जब नयी धोती पहनकर चबूतरेपर बैठे, तब ब्राह्मणने सात बड़ी हाण्डियाँ उनके सामने रख दीं ॥ 59 ॥ वटवृक्षके नीचे चबूतरेके ऊपर प्रभुके सङ्गी भक्तोंका बैठना :- चबुतरा-उपरे यत प्रभुर निजगणे। बड़ बड़ लोक बसिला मण्डली-रचने ॥ 60 ॥ श्रीनित्यानन्दप्रभुके गणोंका बैठना :- रामदास, सुन्दरानन्द, दास-गदाधर। मुरारि, कमलाकर, सदाशिव, पुरन्दर ॥ 61 ॥ धनञ्जय, जगदीश, परमेश्वर-दास। महेश, गौरीदास, होड़-कृष्णदास ॥ 62 ॥ उद्धारण आदि यत, आर निजजन। उपरे बसिला सब, के करे गणन?? 63 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके अपने अन्तरङ्ग भक्त श्रीरामदास, श्रीसुन्दरानन्द, श्रीदास-गदाधर, श्रीमुरारि, श्रीकमलाकर, श्रीसदाशिव, श्रीपुरन्दर, श्रीधनञ्जय, श्रीजगदीश, श्रीपरमेश्वर दास, श्रीमहेश, श्रीगौरीदास, श्रीहोड़ कृष्णदास और श्रीउद्धारण दत्त आदि श्रीनित्यानन्द प्रभुके चारों ओर मण्डली बनाकर चबूतरेपर ही बैठ गये। चबूतरेपर बैठनेवाले जितने सब भक्त थे उनकी कौन गणना कर सकता है ? 60-63 ॥ अनुभाष्य— 'चबूतरा',—आङ्गन, ड्योढ़ी, घरकी भूमिके अन्यान्य स्थानोंसे संलग्न ऊँचा स्थान। 'रामदास',—अभिरामठाकुर (गोपाल), आदुलीला 10/116 और 118 संख्या एवं आदुलीला 11/13 और 16 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'सुन्दरानन्द',—आदुलीला 11/23 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'दास-गदाधर',—आदुलीला 10/53 संख्याका अनुभाष्य और आदुलीला 11/13, 14, 17 संख्या देखें। 'मुरारि',—इस स्थानपर मुरारि-चैतन्यदास (नित्यानन्द-गण, इसलिये 'मुरारि गुप्त' नहीं)—आदुलीला 11/20 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'कमलाकर',—आदुलीला 11/24 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'सदाशिव',—आदुलीला 11/38 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'पुरन्दर',—आदुलीला 11/28 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'धनञ्जय',—आदुलीला 11/31 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'जगदीश',—आदुलीला 11/30 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'परमेश्वर-दास',—आदुलीला 11/29 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'महेश',—आदुलीला 11/32 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'गौरीदास',—आदुलीला 11/26 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'कृष्णदास होड़',—आदुलीला 11/47 संख्याका अनुभाष्य देखें। 'उद्धारण',—आदुलीला 11/41 संख्याका अनुभाष्य देखें॥ 60-63 ॥ वैष्णवोंमें जातिबुद्धि रहित ब्राह्मणोंके द्वारा महाप्रसादका सम्मान :- शुनि' पण्डित भट्टाचार्य यत विप्र आइला। मान्य करि' प्रभु सबारे उपरे बसाइला ॥ 64 ॥ अनुवाद—महोत्सवकी बात सुनकर पण्डित, भट्टाचार्य आदि जितने ब्राह्मण आये, श्रीनित्यानन्द प्रभुने उन सबको सम्मानपूर्वक ऊपर चबूतरेपर बैठाया ॥ 64 ॥ दुइ दुइ मृत्कुण्डिका सबार आगे दिल। एके दुग्ध-चिड़ा, आरे दधि-चिड़ा कैल ॥ 65 ॥ अनुवाद—दो-दो मिट्टीके पात्र सबके आगे रखे गये। एक पात्रमें घने दूधमें मिलाया गया चिड़वा और दूसरेमें दही आदिमें मिलाया गया चिड़वा परोसा गया ॥ 65 ॥ आर यत लोक सब चौतरा-तलाने। मण्डली-बन्धे बसिला, तार ना हय गणने ॥ 66 ॥

174 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/66-76 ] अनुवाद-चबूतरेके चारों ओर भूमिपर मण्डली बनाकर जितने लोग बैठे थे, उनकी भी गणना नहीं की जा सकती॥ 66 ॥ एकेक जनारे दुइ दुइ होल्ना दिल। दधि-चिड़ा, दुग्ध-चिड़ा, दुइते भिजाइल॥ 67 ॥ अनुवाद-प्रत्येक व्यक्तिको दो-दो मिट्टीके पात्र दिये गये। उनमेंसे एकमें दहीमें भिगोया चिड़वा और दूसरेमें घने दूधमें भिगोया चिड़वा था॥ 67 ॥ कोन कोन विप्र उपरे स्थान ना पाञा। दुइ होल्नाय चिड़ा भिजाय गङ्गातीरे गिया॥ 68 ॥ अनुवाद-कुछ-कुछ ब्राह्मण चबूतरेके ऊपर स्थान नहीं मिलनेपर दोनों मिट्टीके पात्रोंको लेकर गङ्गाके तटपर चले गये और वहीं चिड़वेको भिगोने लगे॥ 68 ॥ तीरे स्थान ना पाञा आर कत जन। जले नामि' दधि-चिड़ा करये भक्षण॥ 69 ॥ अनुवाद-और कितने ही लोगोंको गङ्गाके तटपर भी स्थान नहीं मिला, इसलिये वे गङ्गाके जलमें खड़े होकर दही-चिड़वा आदि खाने लगे॥ 69 ॥ केह उपरे, केह तले, केह गङ्गातीरे। बिशजन तिन-ठाञि परिवेषन करे॥ 70 ॥ अनुवाद-कोई चबूतरेके ऊपर, कोई चबूतरेके नीचे भूमिपर, कोई गङ्गाके तटपर बैठा हुआ था। तीनों स्थानोंपर बैठे इन सभी व्यक्तियोंको बीस जन भोजन परिवेषण करने (परोसने) लगे॥ 70 ॥ प्रसादके साथ श्रीराघव-पण्डितका वहाँ आगमन :- हेनकाले आइला तथा राघव पण्डित। हासिते लागिला देखि' हञा विस्मित॥ 71 ॥ अनुवाद-उसी समय श्रीराघव पण्डित वहाँपर आ गये। उस महोत्सवको देखकर वे आश्चर्यचकित होकर हँसने लगे॥ 71 ॥ सर्वप्रथम श्रीनित्यानन्दको, बादमें भक्तोंको प्रसाद-प्रदान :- नि-सकड़ि नानामत प्रसाद आनिला। प्रभुरे आगे दिया भक्तगणे बाँटि दिला॥ 72 ॥ अनुवाद-श्रीराघव पण्डित अनेक प्रकारका नि-सकड़ि प्रसाद लेकर आये। उन्होंने पहले एक भाग श्रीनित्यानन्दके आगे रखा और बचा हुआ अन्य भक्तोंमें बाँट दिया॥ 72 ॥ अनुभाष्य-'नि-सकड़ि', -जो सकड़ि (अन्नके स्पर्शसे अपवित्र) नहीं है॥ 72 ॥ भोजन करनेके लिये श्रीनित्यानन्द प्रभुसे अनुरोध :- प्रभुरे कहे, - "तोमा लागि' भोग लागाइल। तुमि इँहा उत्सव कर, घरे प्रसाद रहिल॥" 73 ॥ अनुवाद-श्रीराघव पण्डितने श्रीनित्यानन्द प्रभुसे कहा, - "मैंने आपके लिये घरमें भोग लगाया है और आप यहाँपर उत्सव कर रहे हैं। आपके लिये घरमें प्रसाद रखा हुआ है॥" 73 ॥ श्रीनित्यानन्द प्रभुको गोपाभिमानमें व्रजलीलाका उद्दीपन :- प्रभु कहे, - "ए द्रव्य दिने करिये भोजन। रात्र्ये तोमार घरे प्रसाद करिमु भक्षण॥ 74 ॥ सखाओंके साथ यमुना तटपर पुलिन-भोजन-आनन्द :- गोप-जाति आमि बहु गोपगण-सङ्गे। आमि सुख पाइ एइ पुलिनभोजन-रङ्गे॥" 75 ॥ अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा, - "मुझे अभी दिनमें यह सब खाने दो, रात्रिके समय तुम्हारे घरपर प्रसाद ग्रहण करूँगा। मैं गोप-जातिका हूँ तथा मेरे साथ बहुतसे गोप हैं। मुझे इन सबके साथ नदीके तटपर पुलिन भोजन करनेमें बहुत आनन्द होता है॥" 74-75 ॥ श्रीराघवका भी वहाँ भोजन करना :- राघवे बसाइा दुइ कुण्डी देओयाइला। राघव द्विविध चिड़ा ताते भिजाइला॥ 76 ॥ अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीराघव पण्डितको

[ 6/76-85 छठा अध्याय 175 बैठाया और उन्हें दो मिट्टीके पात्र दिलवाये। श्रीराघव पण्डितने दो प्रकारका चिड़वा उनमें भिगोया॥ 76॥ महाप्रभुको महोत्सवके बीचमें ध्यानके माध्यमसे लाना :- सकल-लोकेर चिड़ा पूर्ण यबे हइल। ध्याने तबे प्रभु महाप्रभुरे आनिल ॥ 77 ॥ अनुवाद-जब समस्त भक्तोंमें चिड़वा वितरित हो गया, तब श्रीनित्यानन्द प्रभु ध्यानमें महाप्रभुको वहाँपर ले आये ॥ 77 ॥ महाप्रभुके सङ्गमें श्रीनित्यानन्द प्रभुका भोगका दर्शन :- महाप्रभु आइला देखि' निताइ उठिला । ताँरे लञा सबार चिड़ा देखिते लागिला ॥ 78 ॥ अनुवाद-महाप्रभुको आये देखकर श्रीनित्यानन्द प्रभु उठकर खड़े हो गये। महाप्रभुको अपने साथ लेकर वे सभीको दिये गये चिड़वाको देखने लगे ॥ 78 ॥ महाप्रभुके मुखमें एक-एक ग्रास-प्रदान :- सकल कुण्डीर, होल्नार चिड़ार एक एक ग्रास। महाप्रभुर मुखे देन करि' परिहास ॥ 79 ॥ अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभुने सभी मिट्टीके बने पात्रोंमें-से एक-एक ग्रास लिया और परिहास करते हुए उन्हें महाप्रभुके मुखमें दे दिया ॥ 79 ॥ महाप्रभुके द्वारा भी श्रीनिताइके मुखमें एकग्रास प्रदान :- हासि' महाप्रभु आर एक ग्रास लञा। ताँर मुखे दिया खाओयाय हासिया हासिया ॥ 80 ॥ अनुवाद-मुस्कुराते हुए महाप्रभुने भी एक अन्य ग्रास लेकर हँसते-हँसते श्रीनित्यानन्द प्रभुके मुखमें देकर उन्हें खिला दिया ॥ 80 ॥ भक्तोंके चारों ओर श्रीनिताइके द्वारा भ्रमणके आनन्दका दर्शन :- एइमत निताइ बुले सकल मण्डले। दाण्डञा रङ्ग देखे वैष्णव-सकले ॥ 81 ॥ अनुवाद-इस प्रकार श्रीनित्यानन्द प्रभुने सभी मण्डलियोंमें भ्रमण किया और सभी वैष्णव खड़े होकर इस आनन्दोत्सवको देख रहे थे ॥ 81 ॥ दोनोंका आनन्द-किसीके लिये अदृश्य, सुकृतिसम्पन्न किसीके लिये दृश्य :- कि करिया बेड़ाय, -इहा केह नाहि जाने। महाप्रभुर दर्शन पाय कोन भाग्यवाने ॥ 82 ॥ अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभु किसलिये भ्रमण कर रहे थे, -इसे कोई भी नहीं जानता था। किसी-किसी सौभाग्यशाली व्यक्तिको ही महाप्रभुके दर्शन हो रहे थे॥ 82 ॥ महाप्रभुके लिये दो पात्रोंमें दूध-चिड़ा और दो पात्रोंमें दही-चिड़ा :- तबे हासि' नित्यानन्द बसिला आसने। चारि कुण्डी आरोया चिड़ा राखिला दाहिने ॥ 83 ॥ अनुवाद-तब श्रीनित्यानन्द प्रभु मुस्कुराकर अपने आसनपर बैठ गये, उन्होंने चार हाण्डियोंमें आरोया-चिड़वा डालकर अपनी दायीं ओर रख दिया ॥ 83 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'आरोया-चिड़ा', - धानको उबालनेके बदले धूपमें तपाकर प्राप्त चावलोंका चिड़वा ॥ 83 ॥ महाप्रभु और श्रीनित्यानन्दप्रभुका भोजन :- आसन दिया महाप्रभुरे ताँहा बसाइला। दुइ भाइ तबे चिड़ा खाइते लागिला ॥ 84 ॥ अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभुने वहाँपर महाप्रभुको आसन देकर बैठाया। तब दोनों भाई चिड़वा खाने लगे ॥ 84 ॥ श्रीनिताइका भावावेश :- देखि' नित्यानन्दप्रभु आनन्दित हैला। कत कत भावावेश प्रकाश करिला ॥ 85 ॥ अनुवाद-महाप्रभुको अपने साथ खाते देखकर

176 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/85–93 ] श्रीनित्यानन्द प्रभु बहुत आनन्दित हुए और उन्होंने अनेक भावावेशोंको प्रकाशित किया ॥ 85 ॥ हरिध्वनिके साथ भोजनका आदेश :- आज्ञा दिला, —'हरि बलि' करह भोजन'। 'हरि' 'हरि'-ध्वनि उठि' भरिल भुवन ॥ 86 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने सभीको आज्ञा दी, —'हरि बोलते हुए भोजन करो।' सभी भक्तोंकी ऐसी समवेत 'हरि' 'हरि' ध्वनि उठी कि उससे सारा ब्रह्माण्ड भर गया ॥ 86 ॥ वैष्णवोंका भोजन और व्रजके पुलिनभोजनका उद्दीपन :- 'हरि' 'हरि' बलि' वैष्णव करये भोजन। पुलिन-भोजन सबार हइल स्मरण ॥ 87 ॥ अनुवाद—समस्त वैष्णव 'हरि' 'हरि' बोलते हुए भोजन करने लगे, तो उन सबको व्रजमें श्रीकृष्ण और श्रीबलरामका सखाओंके साथ पुलिन-भोजनका स्मरण हो आया ॥ 87 ॥ श्रीरघुनाथके ऊपर दोनों प्रभुओंकी कृपा :- नित्यानन्द, महाप्रभु—कृपालु, उदार। रघुनाथेर भाग्ये एत कैला अङ्गीकार ॥ 88 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु और महाप्रभु नितान्त कृपालु और उदार हैं। यह तो श्रीरघुनाथदासका सौभाग्य था कि उन दोनोंने उनके द्वारा प्रदत्त चिड़वा आदि अङ्गीकार किया ॥ 88 ॥ श्रीनित्यानन्दके प्रेमके वशीभूत महाप्रभु :- नित्यानन्द-प्रभाव-कृपा जानिबे कोन् जन? महाप्रभु आनि' कराय पुलिन-भोजन ॥ 89 ॥ अनुवाद—उन श्रीनित्यानन्द प्रभुके प्रभाव और उनकी कृपाको कौन जान सकता है? उन्होंने महाप्रभुको लाकर पुलिन-भोजन कराया ॥ 89 ॥ अभिराम-ठाकुरादिको गोपभावसे यमुनातटपर पुलिन-भोजनका उद्दीपन :- श्रीरामदासादि गोप प्रेमाविष्ट हैला। गङ्गातीरे 'यमुना-पुलिन'-ज्ञान कैला ॥ 90 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके पार्षद श्रीरामदासादि गोप प्रेममें आविष्ट हो गये, उन्होंने गङ्गाके तटको यमुनाका पुलिन समझा ॥ 90 ॥ द्रव्य-विक्रयी व्यक्तियोंका अपनी वस्तुओंको बेचनेके लिये आना, बिक्रीमके द्वारा अर्थ-लाभ, पुन: बेची गयी वस्तुओंके प्रसाद बननेके बाद उनका भोजन :- महोत्सव शुनि' पसारि' नाना-ग्राम हैते। चिड़ा, दधि, सन्देश, कला आनिल बेचिते ॥ 91 ॥ अनुवाद—महोत्सवकी बात सुनकर अनेक गाँवोंसे पंसारी लोग चिड़वा, दूध, सन्देश तथा केला बेचनेके लिये ले आये ॥ 91 ॥ अनुभाष्य—'पसारि',—वस्तुएँ अथवा समान बेचनेवाले, दुकानदार ॥ 91 ॥ यत द्रव्य लञा आइसे, सब मूल्य करि' लय। तार द्रव्य मूल्य दिया ताहारे खाओयाय ॥ 92 ॥ अनुवाद—पंसारी लोग जितना सामान लेकर आये, श्रीरघुनाथदासने उनका मूल्य तय कर लिया। फिर उन सबका मूल्य देकर उनसे सब कुछ खरीद लिया और बादमें उन्हीं पंसारी लोगोंको ही वही वस्तुएँ खिला दीं ॥ 92 ॥ आनेवाले सभी व्यक्तियोंके द्वारा ही भोजन :- कौतुक देखिते आइल यत यत जन। सेइ चिड़ा, दधि, कला करिल भक्षण ॥ 93 ॥ अनुवाद—इस कौतुकको देखनेके लिये जितने भी लोग आये, उन्हें भी चिड़वा, दही तथा केला आदि वितरित किया गया और उन्होंने भी इन सबको खाया ॥ 93 ॥

[ 6/94-103 छठा अध्याय 177 आचमनके बाद श्रीनिताइके द्वारा श्रीरघुनाथको भुक्तावशेष-प्रदान :- भोजन करि' नित्यानन्द आचमन कैला। चारि कुण्डीर अवशेष रघुनाथे दिला॥ 94॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने भोजन करनेके पश्चात् आचमन किया और चारों हाण्डियोंमें बचा हुआ भोजन श्रीरघुनाथको दे दिया॥ 94॥ भक्तोंमें प्रसादका वितरण :- आर तिन कुण्डिकाय अवशेष छिल। ग्रासे-ग्रासे करि' विप्र सब भक्ते दिल॥ 95॥ अनुवाद—अन्य तीन हाण्डियोंमें भी चिड़वा-दही आदि बचा हुआ था। एक ब्राह्मणने उनमेंसे एक-एक ग्रास सभी भक्तोंमें बाँट दिया॥ 95॥ चन्दन-ताम्बूलके द्वारा प्रभुकी सेवा :- पुष्पमाला विप्र आनि' प्रभु-गले दिल। चन्दन आनिया प्रभुर सर्वाङ्गे लेपिल॥ 96॥ अनुवाद—तब एक ब्राह्मणने पुष्पमाला लाकर श्रीनित्यानन्द प्रभुके गलेमें पहनायी और चन्दन लाकर श्रीनित्यानन्द प्रभुके समस्त अङ्गोंपर उसका लेपन किया॥ 96॥ सेवक ताम्बूल लञा करे समर्पण। हासिया हासिया प्रभु करये चर्वण॥ 97॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके एक सेवकने ताम्बुल लाकर उन्हें समर्पित किया। श्रीनित्यानन्द प्रभु मुस्कुराते हुए उसको चबाने लगे॥ 97॥ सभी भक्तोंको उनके अवशेषकी प्राप्ति :- माला-चन्दन-ताम्बूल शेष ये आछिल। श्रीहस्ते प्रभु सबाकारे बाँटि' दिल॥ 98॥ अनुवाद—जितना माला-चन्दन तथा ताम्बुल बचा हुआ था, श्रीनित्यानन्द प्रभुने स्वयं अपने हाथोंसे उसे समस्त भक्तोंमें बाँट दिया॥ 98॥ प्रभुके अवशेषको प्राप्त करनेपर श्रीरघुनाथको आनन्द :- आनन्दित रघुनाथ प्रभुर 'शेष' पाञा। आपणार गण-सह खाइला बाँटिया॥ 99॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदास श्रीनित्यानन्द प्रभुके उच्छिष्ट प्रसादको प्राप्त करके बहुत आनन्दित हुए और उन्होंने उसे अपने साथियोंके साथ मिल-बाँटकर खाया॥ 99॥ इसलिये ही चिड़ा-दधि-महोत्सव-संज्ञा :- एइ त' कहिलुँ नित्यानन्देर विहार। 'चिड़ा-दधि-महोत्सव'-नामे ख्याति यार॥ 100॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने श्रीनित्यानन्द प्रभुके विहारका वर्णन किया, जिसकी 'चिड़ा-दधि-महोत्सव'के नामसे ख्याति है॥ 100॥ सन्ध्याके समय राघव-मन्दिरमें कीर्त्तन :- प्रभु विश्राम कैला, यदि दिन-शेष हैल। राघव-मन्दिरे तबे कीर्त्तन आरम्भिल॥ 101॥ अनुवाद—चिड़ा-दधि-महोत्सवके समाप्त होनेपर श्रीनित्यानन्द प्रभुने कुछ समय विश्राम किया। जब सन्ध्याका समय हुआ, तब श्रीनित्यानन्द प्रभु श्रीराघव पण्डितके घरमें पहुँचे और कीर्तन आरम्भ किया॥ 101॥ कीर्त्तनमें श्रीनित्यानन्द प्रभुका नृत्य :- भक्त सब नाचाञा नित्यानन्द-राय। शेषे नृत्य करे प्रेमे जगत् भासाय॥ 102॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने कीर्तनमें पहले सभी भक्तोंको नचाया और अन्तमें उन्होंने स्वयं भी नृत्य किया तथा इस प्रकार सम्पूर्ण जगत्‌को प्रेममें निमग्न कर दिया॥ 102॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीनित्यानन्दके नृत्यका दर्शन :- महाप्रभु ताँर नृत्य करेन दरशन। सबे नित्यानन्द देखे, ना देखे अन्यजन॥ 103॥ अनुवाद—महाप्रभु भी श्रीनित्यानन्द प्रभुके नृत्यको

178 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/103-112 ] देख रहे थे। इसे केवल श्रीनित्यानन्द प्रभु ही देख पा रहे थे, अन्य कोई भी नहीं॥ 103 ॥ महाप्रभुके नृत्यकी ही श्रीनित्यानन्दके अनुपम नृत्यके साथ एकमात्र तुलना :- नित्यानन्देर नृत्य, —येन ताँहार नर्त्तने। उपमा दिवार नाहि ए-तिन भुवने ॥ 104 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके नृत्यके समान ही श्रीनित्यानन्द प्रभुके नृत्यकी उपमा देनेके लिये त्रिभुवनमें कुछ भी नहीं है ॥ 104 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीनित्यानन्दप्रभुके नृत्यके माधुर्यका दर्शन :- नृत्येर माधुरी केबा वर्णिवारे पारे। महाप्रभु आइसे सेइ नृत्य देखिबारे ॥ 105 ॥ अनुवाद—जिसे देखनेके लिये स्वयं महाप्रभु आते हैं, ऐसे श्रीनित्यानन्द प्रभुके नृत्यकी माधुरीका कौन वर्णन कर सकता है ॥ 105 ॥ नृत्यके कारण विश्राम करनेके बाद श्रीनिताइका अपने भक्तों सहित श्रीराघवके घरमें रात्रि-भोजन :- नृत्य करि' प्रभु यबे विश्राम करिला। भोजनेर लागि' पण्डित निवेदन कैला ॥ 106 ॥ अनुवाद—नृत्य करनेके पश्चात् जब श्रीनित्यानन्द प्रभुने विश्राम कर लिया, तब श्रीराघव पण्डितने आकर उन्हें भोजन करनेके लिये निवेदन किया ॥ 106 ॥ श्रीनिताइके दायीं ओर महाप्रभुके भोजन करनेके लिये आसन :- भोजने बसिला प्रभु निजगण लञा। महाप्रभुर आसन डाहिने पातिया ॥ 107 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु अपने गणोंके साथ भोजन करनेके लिये बैठे और उन्होंने अपनी दायीं ओर महाप्रभुके लिये आसन बिछाया ॥ 107 ॥ महाप्रभुको उसपर बैठे देखकर श्रीराघवको हर्ष :- महाप्रभु आसि' सेइ आसने बसिल। देखि' राघवरे मने आनन्द बाड़िल ॥ 108 ॥ अनुवाद—महाप्रभु आकर उस आसनपर बैठ गये। यह देखकर श्रीराघव पण्डितके मनमें आनन्द बढ़ने लगा ॥ 108 ॥ सर्वप्रथम दोनों प्रभु, बादमें भक्तोंके द्वारा प्रसाद-सेवन :- दुइभाइ-आगे प्रसाद आनिया धरिला। सकल वैष्णवे पिछे परिवेशान कैला ॥ 109 ॥ अनुवाद—श्रीराघव पण्डितने दोनों भाइयोंके सामने प्रसाद लाकर सजाया और बादमें उन्होंने समस्त वैष्णवोंको भी प्रसाद परोसा ॥ 109 ॥ श्रीराघवके घरमें प्रसादकी विचित्रताका वर्णन :- नानाप्रकार पिठा, पायस, दिव्य शाल्य-अन्न। अमृत निन्दये ऐछे विविध व्यञ्जन ॥ 110 ॥ अनुवाद—उस प्रसादमें अनेक प्रकारके पीठा-पाना, खीर, दिव्य शाल्य-चावलादि अनेक प्रकारके व्यञ्जन अमृतके स्वादको भी पराभूत करनेवाले थे ॥ 110 ॥ श्रीराघवके घरमें प्रस्तुत नैवेद्यादि-महाप्रभुको नित्यप्रिय :- राघव-ठाकुरेर प्रसाद अमृतेर सार। महाप्रभु याहा खाइते आइसे बार बार ॥ 111 ॥ अनुवाद—श्रीराघव पण्डितके द्वारा निवेदित प्रसाद अमृतका सार स्वरूप होता था। उसे खानेके लिये महाप्रभु बारम्बार उनके घरपर आते थे ॥ 111 ॥ महाप्रभुके उद्देश्यसे प्रतिदिन पृथक् भोग और महाप्रभुके द्वारा उसको ग्रहण करना :- पाक करि' राघव यबे भोग लागाय। महाप्रभुर लागि' भोग पृथक् बाड़य ॥ 112 ॥ अनुवाद—रसोई बनानेके बाद जब श्रीराघव पण्डित भोग लगाते, तो वे महाप्रभुके लिये अलगसे भोग लगाते थे ॥ 112 ॥

[ 6/113-121 छठा अध्याय 179 प्रतिदिन महाप्रभु करेन भोजन। मध्ये मध्ये प्रभु ताँरे देन दरशन ॥ 113 ॥ अनुवाद—महाप्रभु प्रतिदिन श्रीराघव पण्डितके घरपर भोजन करते और बीच-बीचमें उनको अपने दर्शन देते॥ 113 ॥ श्रीराघवके द्वारा दोनों प्रभुओंके भोजनका सम्पादन :— दुइ भाइरे राघव आनि’ परिवेशे। यत्न करि’ खाओयाय, ना रहे अवशेषे ॥ 114 ॥ अनुवाद—श्रीराघव पण्डित दोनों भाइयोंको (महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुको) बुलाकर परोसते और बहुत प्रीतिसे उन्हें खिलाते। इसलिये दोनों भाई सब कुछ खा लेते और कुछ भी अवशेष नहीं बचता॥ 114 ॥ दोनों प्रभुओंके द्वारा सम्पूर्णरूपसे बहुत प्रकारके विचित्र प्रसादका सेवन :— कत उपहार आने, हेन नाहि जानि। राघवेर घरे रान्धे राधा-ठाकुराणी ॥ 115 ॥ अनुवाद—वे कितने प्रकारके व्यञ्जन-पकवानादि लेकर आते उसे कोई भी नहीं जान सकता। वास्तवमें श्रीराघव पण्डितके घरपर स्वयं श्रीराधा-ठाकुराणी ही भोजन पकाती थीं॥ 115 ॥ श्रीराघवके घरमें स्वयं श्रीराधिकाका श्रीकृष्णके उद्देश्यसे अमृतको भी निन्दित करनेवाले भोजन बनाना :— दुर्वासार ठाञि तैं हो पाञाछेन वर। अमृत हइते पाक ताँर अधिक मधुर ॥ 116 ॥ अनुवाद—श्रीराधा-ठाकुराणीको दुर्वासा ऋषिसे वरदान मिला था कि उनके द्वारा बनायी गयी भोजन सामग्री अमृतसे भी अधिक मधुर होगी॥ 116 ॥ दोनों प्रभुओंको उनके भोजनको खानेमें आनन्द :— सुगन्धि सुन्दर प्रसाद—माधुर्येर सार। दुइ भाइ ताहा खाञा सन्तोष अपार ॥ 117 ॥ अनुवाद—श्रीराघव पण्डितके द्वारा परोसा गया सुगन्धित सुन्दर प्रसाद माधुर्यका सार था, दोनों भाई उसे खाकर अत्यन्त सन्तुष्ट होते ॥ 117 ॥ सभी भक्तोंका बैठना, श्रीरघुनाथको भोजनके लिये अनुरोध, श्रीरघुनाथके द्वारा बादमें बैठना स्वीकार :— भोजने बसिते रघुनाथे कहे सर्वजन। पण्डित कहे,—“इँह पाछे करिबे भोजन ॥” 118 ॥ अनुवाद—सभी भक्तोंने श्रीरघुनाथको भी बैठकर भोजन करनेके लिये कहा। किन्तु श्रीराघव पण्डितने उनसे कहा,—“यह बादमें भोजन करेगा॥” 118 ॥ भक्तोंका गले तक भरकर भोजन और आचमन :— भक्तगण आकण्ठ भरिया करिल भोजन। ‘हरि’ ध्वनि करि’ उठि’ कैला आचमन ॥ 119 ॥ अनुवाद—सभी भक्तोंने गले तक भरकर भोजन किया तथा ‘हरि’ ध्वनि करते हुए उठकर आचमन किया॥ 119 ॥ आचमनके बाद दोनों प्रभुओंको माला तथा चन्दन पहनाना :— भोजन करि’ दुइ भाइ कैला आचमन। राघव आनि’ पराइला माल्य-चन्दन ॥ 120 ॥ अनुवाद—दोनों भाइयोंने भी भोजन करके आचमन किया। श्रीराघव पण्डितने लाकर उन दोनोंको माला पहनायी और चन्दन लगाया॥ 120 ॥ दोनों प्रभुओंके द्वारा ताम्बूल-खाना; सभीको अवशेषकी प्राप्ति :— बिड़ा खाओयाइला, कैला चरण-वन्दन। भक्तगणे दिला बिड़ा, माल्य-चन्दन ॥ 121 ॥ अनुवाद—श्रीराघव पण्डितने दोनों भाइयोंको ताम्बूल खिलाया और उनके चरणोंकी वन्दना की। उन्होंने उपस्थित भक्तोंको भी ताम्बूल तथा माला-चन्दन आदि प्रदान किया॥ 121 ॥ अनुभाष्य—‘बिड़ा’,—सजाया हुआ ताम्बूल, पानका बीड़ा॥ 121 ॥

180 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/122-133 ] स्नेहकृपामय श्रीराघवके द्वारा श्रीरघुनाथको दोनों प्रभुओंका उच्छिष्ट-पात्र प्रदान :- राघवेर कृपा रघुनाथेर उपरे। दुइ भाइएर अवशिष्ट पात्र दिला ताँरे॥ 122॥ महाप्रभुके उच्छिष्टके सेवनसे ही श्रीरघुनाथका गृहत्याग-सामर्थ्य :- कहिला,—“चैतन्य-प्रभु करियाछेन भोजन। ताँर शेष पाइले, तोमार खण्डिबे बन्धन॥” 123॥ अनुवाद—स्नेहकृपामय श्रीराघव पण्डितने श्रीरघुनाथको दोनों भाइयोंका उच्छिष्ट पात्र देकर कहा,—“श्रीचैतन्य महाप्रभुने भोजन किया है, उनका उच्छिष्ट पानेसे तुम्हारा संसारका बन्धन कट जायेगा॥” 122-123॥ भगवान्‌के अवस्थान और स्वभावका निर्णय :- भक्त-चित्ते भक्त-गृहे सदा अवस्थान। कभु गुप्त, कभु व्यक्त, स्वतन्त्र भगवान्॥ 124॥ अनुवाद—भगवान् भक्तके चित्तमें अथवा भक्तके घरमें सदा वास करते हैं। कभी यह गुप्तरूपसे और कभी व्यक्तरूपसे होता है, क्योंकि भगवान् स्वतन्त्र हैं॥ 124॥ महाप्रभुके विभु होनेमें संशय करनेवालोंका विनाश :- सर्वत्र 'व्यापक' प्रभुर सदा सर्वत्र वास। इहाते संशय यार, सेइ याय नाश॥ 125॥ अनुवाद—सर्वत्र व्यापक महाप्रभुका सदा सभी स्थानोंपर वास होता है। इसमें जिसे संशय होता है, उसका सर्वनाश हो जाता है॥ 125॥ अगले दिन प्रातः स्नानके बाद वृक्षके नीचे बैठे श्रीनिताइके निकट श्रीरघुनाथके द्वारा श्रीचैतन्यचरणकी प्राप्तिके लिये निवेदन :- प्राते नित्यानन्द गङ्गास्नान करिया। सेइ वृक्षमूले बसिला निजगण लञा॥ 126॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु प्रातःकालमें गङ्गास्नान करके अपने गणोंके साथ उसी वृक्षके नीचे बैठ गये॥ 126॥ रघुनाथ आसि' कैला चरण-वन्दन। राघवपण्डित-द्वारा कैला निवेदन॥ 127॥ “अधम पामर मुइ हीन जीवाधम! मोर इच्छा हय—पाङ चैतन्यचरण॥ 128॥ वामन हञा चान्द धरिबारे चाय। अनेक यत्न कैनु, ताते कभु सिद्ध नय॥ 129॥ यतबार पलाइ आमि गृहादि छाड़िया। पिता, माता—दुइ मोरे राखये बान्धिया॥ 130॥ श्रीनित्यानन्द (गुरु)-कृपाके बिना श्रीचैतन्यपद- प्राप्ति असम्भव, उनकी कृपासे अयोग्यमें भी उनकी प्राप्तिकी योग्यता :- तोमार कृपा बिना केह 'चैतन्य' ना पाय। तुमि कृपा कैले ताँरे अधमेह पाय॥ 131॥ श्रीनित्यानन्द (गुरु)के चरणोंमें श्रीचैतन्यचरण प्राप्त करनेके लिये कृपा-भिक्षाकी कर्त्तव्यता :- अयोग्य मुइ निवेदन करिते करि भय। मोरे 'चैतन्य' देह' गोसाञि हञा सदय॥ 132॥ मोर माथे पद धरि' करह प्रसाद। 'निर्विघ्ने चैतन्य पाङ'—कर आशीर्वाद॥” 133॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथने आकर श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणोंकी वन्दना की और उन्होंने श्रीराघव पण्डितके माध्यमसे श्रीनित्यानन्द प्रभुको निवेदन किया,—“मैं अधम, पापी, निराश्रय और अधम जीव हूँ। मेरी इच्छा होती है कि मैं श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंका आश्रय प्राप्त करूँ। बौने व्यक्तिकी चन्द्रको पकड़नेकी इच्छा करने जैसे मैंने भी अनेक प्रयत्न किये, किन्तु उसमें कभी भी सफल नहीं हो पाया। मैंने जितनी बार भी घर आदि छोड़कर भागनेका प्रयास किया, मेरे माता-पिता—दोनोंने मुझे पकड़कर बाँधकर रख दिया। आपकी कृपाके बिना किसीको भी श्रीचैतन्य महाप्रभुकी

[ 6/127-143 छठा अध्याय 181 प्राप्ति नहीं होती। किन्तु यदि आप कृपा करें तो अधम व्यक्तिको भी महाप्रभुके चरणकमलोंका आश्रय प्राप्त हो जाता है। मैं अयोग्य हूँ, इसलिये आपसे निवेदन करनेमें भी भय करता हूँ कि हे गोसाईं! आप मेरे प्रति विशेषरूपसे दयावान् होकर मुझे श्रीचैतन्यदेवके चरणकमलोंमें आश्रय प्रदान कीजिये। मेरे सिरपर अपने चरणकमल रखकर मुझपर कृपा कीजिये कि मैं निर्विघ्न रूपसे श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंका आश्रय प्राप्त करूँ॥” 127-133॥ श्रीरघुनाथकी श्रीचैतन्यचरण प्राप्त करनेकी व्याकुलताको देखकर उन्हें कृपाशीर्वाद प्रदान करनेके लिये श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा शुद्धभक्तोंके निकट आवेदन :- शुनि' हासि कहे प्रभु सब भक्तगणे। “इँहार विषयसुख—इन्द्रसुख-समे॥ 134॥ चैतन्य-कृपाते से नाहि भाय मने। सबे आशीर्वाद कर—पाउक चैतन्य-चरणे॥ 135॥ श्रीकृष्ण-चरणकमलोंकी गन्धकी महिमा और आकर्षण-शक्ति :- कृष्णपादपद्म-गन्ध येइ जन पाय। ब्रह्मलोक-आदि सुख ताँरे नाहि भाय॥” 136॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथके निवेदनको सुनकर श्रीनित्यानन्द प्रभु मुस्कुराये और उन्होंने सभी भक्तोंसे कहा,—“रघुनाथदासके पास इन्द्रके समान सांसारिक विषय सुख हैं, किन्तु श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कृपासे वे सब सुख इसके मनको नहीं भाते। इसलिये आप सभी इसे आशीर्वाद दीजिये कि इसे श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंका आश्रय प्राप्त हो। जिन्हें श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी सुगन्धकी प्राप्ति होती है, उन्हें ब्रह्मलोकादिके सुख भी नहीं भाते॥” 134-136॥ श्रीमद्भागवत (5/14/43) में— यो दुस्त्यजान् दारसुतान् सुहृद्राज्यं हृदिस्पृशः। जहौ युवैव मलवदुत्तमःश्लोकलालसः॥ 137॥ अनुवाद—भरत महाराजने उत्तमःश्लोक श्रीकृष्णको प्राप्त करनेकी लालसासे युवावस्थामें ही हृदयग्राहिणी पत्नी, पुत्र, सुहृत् और राज्यादिका मलकी भाँति परित्याग किया था;—यही जातभाव व्यक्तिकी विरक्तिका लक्षण है॥ 137॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 23/24 संख्या देखें॥ 137॥ श्रीरघुनाथके सिरपर चरण रखकर श्रीनित्यानन्दप्रभुके द्वारा उनकी महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्तिका वर्णन :- तबे रघुनाथे प्रभु निकटे बोलाइला। ताँर माथे पद धरि' कहिते लागिला॥ 138॥ “तुमि कराइला एइ पुलिन-भोजन। तोमाय कृपा करि' गौर कैला आगमन॥ 139॥ कृपा करि' कैला चिड़ा-दुग्ध भोजन। नृत्य देखि' रात्र्ये कैला प्रसाद-भक्षण॥ 140॥ श्रीरघुनाथके प्रति कृपापूर्वक श्रीगौरका आविर्भाव और भोजनके फलसे श्रीरघुनाथका विघ्न-नाश :- तोमा उद्धारिते गौर आइला आपने। छुटिल तोमार यत विघ्नादि-बन्धने॥ 141॥ श्रीनित्यानन्द प्रभुकी भविष्यवाणी :- स्वरूपेर स्थाने तोमा करिबे समर्पणे। 'अन्तरङ्ग' भृत्य बलि' राखिबे चरणे॥ 142॥ निर्विघ्न श्रीचैतन्यचरण प्राप्तिका आशीर्वाद प्रदान :- निश्चिन्त हञा याह आपन-भवन। अचिरे निर्विघ्ने पाबे चैतन्य-चरण॥” 143॥ अनुवाद—तब श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीरघुनाथदासको अपने निकट बुलाया और उनके सिरपर अपने चरणकमल रखकर उनसे कहने लगे,—“तुमने जो यह पुलिन-भोजन करवाया, श्रीगौरसुन्दर यहाँ तुम्हारे ऊपर कृपा प्रदर्शित करनेके लिये आये थे। श्रीगौरसुन्दरने तुमपर कृपा करके दूध-चिड़वेका भोजन भी किया। रात्रिके समयमें भक्तोंके नृत्यको देखकर उन्होंने प्रसाद भी ग्रहण किया। श्रीगौरसुन्दर स्वयं तुम्हारा उद्धार

182 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/138-152 ] करनेके लिये आये थे, अब समझ लो कि तुम्हारी जो भी विघ्न-बाधाएँ थीं, वे सब दूर हो गयी हैं। महाप्रभु तुम्हें स्वरूप दामोदरको समर्पित कर देंगे और तुम्हें अपना अन्तरङ्ग सेवक कहकर अपने चरणकमलोंमें स्थान देंगे। तुम निश्चिन्त होकर अपने घर लौट जाओ। अतिशीघ्र निर्विघ्न ही तुम्हें श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंके आश्रयकी प्राप्ति होगी॥” 138-143॥ भक्तोंके द्वारा श्रीरघुनाथको आशीर्वाद दिलवाना; श्रीरघुनाथके द्वारा भक्तोंके चरणोंकी वन्दना :— सब भक्तद्वारे ताँरे आशीर्वाद कराइला। ताँ-सबार चरण रघुनाथ वन्दिला॥ 144॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने समस्त भक्तोंके द्वारा श्रीरघुनाथदासको आशीर्वाद दिलवाया और श्रीरघुनाथदासने भी समस्त भक्तोंके चरणोंकी वन्दना की॥ 144॥ श्रीराघवके साथ गुप्त स्थानपर परामर्श :— प्रभु-आज्ञा लञा वैष्णवेर आज्ञा लइला। राघव-सहिते निभृते युक्ति करिला॥ 145॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदासने श्रीनित्यानन्द प्रभुसे आज्ञा लेनेके पश्चात् उपस्थित समस्त वैष्णवोंसे आज्ञा ली तथा उन्होंने श्रीराघव पण्डितके साथ एकान्तमें कुछ परामर्श किया॥ 145॥ प्रभुके भण्डारीके हाथमें प्रणामीके रूपमें धन-प्रदान :— युक्ति करि' शत मुद्रा, सोणा तोला-साते। निभृते दिला प्रभुर भाण्डारीर हाते॥ 146॥ इस बातको प्रभुके निकट गुप्त रखनेका अनुरोध :— ताँरे निषेधिला,—“प्रभुरे एबे ना कहिबा। निज-घरे याबेन यबे, तबे निवेदिबा॥” 147॥ अनुवाद—श्रीराघव पण्डितसे परामर्श करनेके उपरान्त श्रीरघुनाथने श्रीनित्यानन्द प्रभुके भण्डारीको एकान्तमें एक सौ स्वर्णकी मुद्राएँ तथा सात तोला सोना दिया और उनसे कहा,—“आप अभी यह बात श्रीनित्यानन्द प्रभुको मत बतलाना। जब वे अपने वासस्थानपर पहुँच जायेंगे, तभी उन्हें इस विषयमें बतलाना॥” 146-147॥ श्रीराघवके द्वारा श्रीरघुनाथको अपने गृहमें स्थापित विग्रहोंके दर्शन कराके यथोचित सम्मान प्रदान :— तबे राघव पण्डित ताँरे घरे लञा गेला। ठाकुर दर्शन कराञा माला-चन्दन दिला॥ 148॥ वैष्णव-चरण-पूजाके योग्य आदर्शको दिखलाकर श्रीरघुनाथके द्वारा धनी विषयी लोगोंको शिक्षा-प्रदान :— अनेक 'प्रसाद' दिला पथे खाइबारे। तबे पुनः रघुनाथ कहे पण्डितेरे॥ 149॥ “प्रभुर सङ्गे यत महान्त, भृत्य, आश्रित जन। पूजिते चाहिये आमि सबार चरण॥ 150॥ बिश, पञ्चाश, दश, बार, पञ्चदश, द्वय। मुद्रा देह' विचारिया योग्य यत हय॥” 151॥ अनुवाद—तब श्रीराघव पण्डित श्रीरघुनाथदासको अपने घरमें ले गये और उन्हें अपने घरमें सेवित श्रीठाकुरजीके दर्शन करवाकर माला और चन्दन प्रदान किया। उन्होंने श्रीरघुनाथदासको मार्गमें खानेके लिये बहुत प्रसाद दिया। तब श्रीरघुनाथदासने पुनः श्रीराघव पण्डितसे कहा,—“श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ जितने भी महान् भक्त, उनके सेवक और आश्रित जन हैं, मैं उन सबके भी चरणोंकी पूजा करना चाहता हूँ। आप विचार करके उन सबके अधिकारके अनुसार बीस, पन्द्रह, बारह, दस अथवा पाँच—जितनी मुद्राएँ उचित समझें, वे उन्हें दे दीजिये॥” 148-151॥ सभीको अभिनन्दन पत्र और प्रणामी-प्रदान :— सब लेखा करिया राघव-पाश दिला। याँर नामे यत राघव चिठि लेखाइला॥ 152॥ अनुवाद—तब श्रीरघुनाथदासने कुल प्रणामीका लेखा-जोखा करके श्रीराघव पण्डितको प्रदान किया और उसके अनुसार श्रीराघव पण्डितने किस भक्तको

[ 6/152-160 छठा अध्याय 183 कितनी प्रणामी प्रदान करनी चाहिये, इस विषयमें अपना विचार लिखवाया ॥152॥ एकशत मुद्रा आर सोणा तोला-द्वय। पण्डितेर आगे दिल करिया विनय ॥153॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदासने विनयपूर्वक श्रीराघव पण्डितके सामने एक सौ स्वर्ण मुद्राएँ और दो तोला सोना रख दिया ॥153॥ श्रीनिताइकी कृपा प्राप्त करके श्रीराघवको प्रणाम करनेके बाद श्रीरघुनाथका अपने घरपर आगमन :- ताँर पदधूलि लञा स्वगृहे आइला। नित्यानन्द-कृपा पाञा कृतार्थ मानिला ॥154॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदास श्रीराघव पण्डितके चरणकमलोंकी धूलिको लेकर अपने घरमें लौट आये। श्रीरघुनाथदास श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कृपाको प्राप्त करके स्वयंको कृतार्थ मानने लगे॥154॥ तबसे घरके बाहरी स्थानपर ही रहना :- सेइ हैते अभ्यन्तरे ना करेन गमन। बाहिरे दुर्गामण्डपे करेन शयन ॥155॥ अनुवाद—उस दिनसे वे अपने घरके भीतर अपने शयन-कक्षमें नहीं जाते थे। अपितु वे घरके बाहर दुर्गा-मण्डपमें ही सो जाते॥155॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अभ्यन्तर',—भीतरवाले कक्ष॥155॥ पहरा देनेवाले रक्षक :- ताँहा जागि' रहे सब रक्षकगण। पलाइते करेन नाना उपाय चिन्तन ॥156॥ अनुवाद—दुर्गा-मण्डपके बाहर रक्षा-कर्मचारी जागकर पहरा देते थे। श्रीरघुनाथदास अपने घरसे भागनेके अनेक उपायोंकी चिन्ता करते॥156॥ महाप्रभुके दर्शनोंके लिये वर्षाकालमें गौड़ीय-भक्तोंकी पुरी-यात्रा :- हेनकाले गौड़देशेर सब भक्तगण। प्रभुरे देखिते नीलाचले करिला गमन ॥157॥ अनुवाद—उस समय गौड़देशके सभी भक्त महाप्रभुके दर्शनोंके लिये नीलाचलकी ओर चल पड़े॥157॥ सबके समक्ष गौड़ीय भक्तोंके साथ जानेसे पकड़े जानेकी आशङ्कासे पुरी यात्राके लिये असमर्थता :- ताँ-सबार सङ्गे रघुनाथ याइते ना पारे। प्रसिद्ध प्रकट सङ्ग, तबहि धरा पड़े॥158॥ अनुवाद—उन सबके साथ तो श्रीरघुनाथदास जा नहीं सकते थे, क्योंकि गौड़ीय भक्तोंकी यात्रा इतनी प्रसिद्ध थी कि वे अनायास ही पकड़े जाते॥158॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गौरभक्त जब नीलाचल जाते, तब उनका सङ्ग सब लोगोंमें प्रसिद्ध और प्रकट हो जाता। उनके साथ जानेसे बादमें पिता पकड़कर ले आयेंगे, इसी भयसे वे उनके साथ नहीं जा सकते थे॥158॥ श्रीरघुनाथके महाप्रभुके साथ मिलनके वृत्तान्तका वर्णन; श्रीरघुनाथके सौभाग्यका दिन :- एइमत चिन्तिते दैवे एकदिने। बाहिरे देवीमण्डपे करियाछेन शयने ॥159॥ रात्रिके अन्तिम-भागमें गुरु श्रीयदुनन्दनके साथ साक्षात्कार :- दण्ड-चारि रात्रि यबे आछे अवशेष। यदुनन्दन-आचार्य तबे करिला प्रवेश ॥160॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीरघुनाथदास घरसे भागनेके उपायकी चिन्ता करते रहते। एक दिन जब वे अपने घरके बाहरमें बने दुर्गामण्डपमें सो रहे थे और रात्रि समाप्त होनेमें चार दण्ड समय रह गया था, उस समय दैवयोगसे श्रीयदुनन्दन आचार्यने उनके घरमें प्रवेश किया॥159-160॥

184 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/161-169 ] श्रीयदुनन्दनका परिचय :- वासुदेव-दत्तेर तैँह हय ‘अनुगृहीत’। रघुनाथेर 'गुरु' तैँह हय 'पुरोहित' ॥ 161 ॥ अद्वैत-आचार्येर तैँह 'शिष्य अन्तरङ्ग'। आचार्य-आज्ञाते माने चैतन्ये 'प्राणधन' ॥ 162 ॥ अनुवाद—श्रीयदुनन्दन आचार्य श्रीवासुदेव-दत्तके कृपापात्र थे और श्रीरघुनाथके गुरु एवं पुरोहित थे। वे श्रीअद्वैताचार्यके अन्तरङ्ग शिष्य थे और वे श्रीअद्वैताचार्यकी आज्ञानुसार श्रीचैतन्य महाप्रभुको अपना प्राणधन मानते थे॥ 161-162 ॥ अनुभाष्य—इस वचनसे भी जाना जाता है कि श्रीअद्वैताचार्यकी आज्ञाको नहीं माननेवाले उनके मतविरोधी पाखण्डियोंके द्वारा स्वयंको उनका अनुगत कहकर परिचय देनेपर भी वे शुद्धभक्तिके प्रतिकूल भावके वशीभूत होकर श्रीमन्महाप्रभुको जीवोंके नित्य उपास्य स्वयं भगवान् 'श्रीकृष्ण' नहीं मानते थे। श्रीयदुनन्दन श्रीमद् अद्वैतप्रभुके श्रीचैतन्यमें प्राण समर्पित करनेवाले अन्तरङ्ग शिष्य होनेके कारण विष्णु और वैष्णवोंमें सामान्य-जाति-बुद्धिके दोषसे कभी भी दूषित नहीं थे। श्रीवासुदेव-दत्त ठाकुरके ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न नहीं होनेपर भी यदुनन्दनाचार्य उन्हें अपने ऊपर कृपा करनेवाले 'गुरु' ही मानते थे॥ 161-162 ॥ श्रीरघुनाथके द्वारा श्रीयदुनन्दनको प्रणाम :- अङ्गने आसिया तैँहो यबे दाण्डाइला। रघुनाथ आसि' तबे दण्डवत् कैला ॥ 163 ॥ अनुवाद—जब श्रीयदुनन्दन आचार्य श्रीरघुनाथके घरके आङ्गनमें आकर खड़े हुए, तब श्रीरघुनाथने आकर उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया॥ 163 ॥ ताँर एक शिष्य ताँर ठाकुरेर सेवा करे। सेवा छाड़ियाछे, तारे साधिबार तरे ॥ 164 ॥ विग्रह-अर्चनका त्यागकर जानेवाले शिष्यको प्रातःकालीनकी आरती करनेके लिये अनुरोध करनेके लिये श्रीरघुनाथको साथमें लेना :- रघुनाथे कहे, — “तारे करह साधन। सेवा येन करे, आर नाहिक ब्राह्मण ॥” 165 ॥ अनुवाद—श्रीयदुनन्दन आचार्यके एक शिष्य उनके ठाकुरजीकी सेवा करते थे, किन्तु वे सेवाको छोड़कर चले गये। श्रीयदुनन्दनाचार्यने उन्हींको समझाने हेतु श्रीरघुनाथसे कहा, — “तुम उसे समझा-बुझाकर सेवा करनेके लिये ले आओ, क्योंकि मेरे पास ठाकुरजीकी सेवा करनेके लिये अन्य कोई ब्राह्मण नहीं है॥” 164-165 ॥ रात्रिके अन्तमें पहरा देनेवालोंकी गहरी नींद :- एत कहि' रघुनाथे लञा चलिला। रक्षक सब शेषरात्रे निद्राय पड़िला ॥ 166 ॥ अनुवाद—श्रीयदुनन्दनाचार्य यह कहकर श्रीरघुनाथदासको अपने साथ लेकर चल दिये। रात्रिका अन्तिम प्रहर होनेके कारण सभी प्रहरी गहरी नींदमें सोये हुए थे॥ 166 ॥ श्रीरघुनाथका गुरुके पीछे-पीछे जाना; दोनोंका आचार्यके घरकी ओर जाना :- आचार्येर घर इहार पूर्व दिशाते। कहिते शुनिते दुँहे चले सेइ पथे ॥ 167 ॥ अनुवाद—श्रीयदुनन्दनाचार्यका घर श्रीरघुनाथदासके घरकी पूर्व दिशामें था। वे दोनों परस्परमें वार्तालाप करते हुए आचार्यके घरकी ओर चल पड़े॥ 167 ॥ मार्गमें बुद्धिमान् श्रीरघुनाथके द्वारा इस सुयोगसे गुरुसे कृष्णभजनके उद्देश्यसे विदायीकी आज्ञा ग्रहण :- अर्द्धपथे रघुनाथ कहे गुरुर चरणे। “आमि सेइ विप्रे साधि' पाठाइमु तोमा-स्थाने ॥ 168 ॥ तुमि घरे याह सुखे—मोरे आज्ञा हय।” एइ छले आज्ञा मागि' करिला निश्चय ॥ 169 ॥

[ 6/168-178 छठा अध्याय 185 श्रीरघुनाथका भागनेका विचार :- “सेवक रक्षक आर কেহ नाहि सङ्गे। पलाइते आमार भाल एइत प्रसङ्गे॥” 170॥ अनुवाद-आधे रास्ते पहुँचनेपर श्रीरघुनाथदासने अपने गुरुदेवके चरणोंमें निवेदन किया,—“मैं उस ब्राह्मणको समझा-बुझाकर आपके घरपर भेज दूँगा। आप निश्चिन्त होकर अपने घर लौट जाइये और मुझे उस ब्राह्मणके पास जानेकी आज्ञा दीजिये।” इस छलसे आज्ञा माँगकर श्रीरघुनाथदासने निश्चय किया,—“आज मेरे साथ कोई भी सेवक और प्रहरी नहीं है, मेरे यहाँसे भाग जानेके लिये बहुत अच्छा अवसर है॥” 168-170॥ अति द्रुतगतिसे भागना :- एत चिन्ति' पूर्वमुखे करिला गमन। उलटिया चाहे पाछे, नाहि कोन जन॥ 171॥ अनुवाद-ऐसा विचार करके वे पूर्वकी ओर चल दिये। वे पीछे मुड़-मुड़कर देखते, किन्तु कोई भी उनके पीछे नहीं आ रहा था॥ 171॥ पकड़े जानेकी आशङ्कासे वन-वनमें कच्चे मार्गपर दौड़ना :- श्रीचैतन्य-नित्यानन्द-चरण चिन्तिया। पथ छाड़ि' उपपथे यायेन धाञा॥ 172॥ अनुवाद-वे श्रीचैतन्य महाप्रभु तथा श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणकमलोंका स्मरण करते हुए मुख्य मार्गको छोड़कर उपपथपर दौड़ पड़े॥ 172॥ एकान्तिक रूपसे श्रीचैतन्यचरणोंका ध्यान करते हुए सारे दिनमें बहुत दूरीको पार करना और सन्ध्याके समय गोपके घरमें दूध पीकर थकी हुई देहको कुछ विश्राम :- ग्रामे-ग्रामेर पथ छाड़ि' याय वने वने। कायमनोवाक्ये चिन्ते चैतन्य-चरणे॥ 173॥ अनुवाद-वे ग्रामोंसे होकर जानेवाले मार्गको छोड़कर वनोंसे होकर जा रहे थे। वे काय, मन तथा वाक्यसे श्रीचैतन्यदेवके चरणकमलोंका ही स्मरण कर रहे थे॥ 173॥ पञ्चदश-क्रोश-पथ चलि' गेला एकदिने। सन्ध्याकाले रहिला एक गोपेर बाखाने॥ 174॥ अनुवाद-उन्होंने पन्द्रह कोसका मार्ग एक दिनमें ही तय कर लिया और सन्ध्याके समय एक ग्वालेकी गोशालामें विश्राम किया॥ 174॥ अनुभाष्य—'बाखान',—गोशाला, गोष्ठ॥ 174॥ उपवासी देखि' गोप दुग्ध आनि' दिला। सेइ दुग्ध पान करि' पड़िया रहिला॥ 175॥ अनुवाद-उनको भूखा देखकर ग्वालेने उन्हें दूध लाकर दिया। श्रीरघुनाथदास दूधको पीकर रात्रिमें विश्राम करनेके लिये वहीं लेट गये॥ 175॥ अगले दिन प्रातःकाल श्रीरघुनाथको नहीं देखकर कोलाहल और उन्हें ढूँढ़नेके लिये पिताके द्वारा पुरी जा रहे यात्रियोंके पास पत्र और लोग भेजना :- एथा सेवक रक्षक ताँरे ना देखिया। ताँर गुरुपाशे वार्त्ता पुछिलेन गिया॥ 176॥ अनुवाद-इधर श्रीरघुनाथदासके सेवक और प्रहरी उनको घरमें नहीं देखकर उनके गुरु श्रीयदुनन्दनाचार्यके पास जाकर उनके विषयमें पूछने लगे॥ 176॥ तेँह कहे,—“आज्ञा मागि' गेला निज-घर।” 'पलाइल रघुनाथ'—उठिल कोलाहल॥ 177॥ अनुवाद-श्रीयदुनन्दनाचार्यने कहा,—“रघुनाथ मुझसे आज्ञा लेकर अपने घर चला गया है।” 'रघुनाथ घरसे भाग गया है'—सर्वत्र यह कोलाहल मच गया॥ 177॥ ताँर पिता कहे,—“गौड़ेर भक्तगण। प्रभुस्थाने नीलाचले करिला गमन॥ 178॥

186 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/178–186 ] सेइ-सङ्गे रघुनाथ गेल पलाञा। दश जन याह, तारे आनह धरिया ॥”179 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथके पिताने सेवकों तथा प्रहरियोंसे कहा,—“गौड़ीय भक्त महाप्रभुके पास नीलाचल गये हैं। उनके साथ रघुनाथ भी यहाँसे भाग गया है। दस लोग जाओ और उसे पकड़कर ले आओ॥”178-179 ॥ शिवानन्दे पत्री दिल विनय करिया। ‘आमार पुत्रेरे तुमि दिबा बाहुड़िया॥’180 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदासके पिताने श्रीशिवानन्द सेनके नाम विनती करते हुए एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने कहा,—‘आप मेरे पुत्रको अवश्य ही लौटाकर भेज देना॥’180 ॥ अनुभाष्य—‘बाहुड़िया’,—लौटाकर; श्रीशिवानन्द सेन गौड़देशसे यात्रियोंको लेकर नीलाचल जाते थे, इसलिये उनके साथ रघुनाथके होनेका अनुमान करके, रघुनाथको लौटाकर भेजनेके लिये उनके पास एक अनुरोध पत्रके साथ दस लोगोंको भी भेजा॥ 180 ॥ झाँकरा पर्यन्त गेल सेइ दश जने। झाँकराते पाइल गिया वैष्णवेर गणे॥ 181 ॥ अनुवाद—वे दस लोग जब झाँकरा नामक स्थानपर पहुँचे, तब उन्हें वैष्णवोंकी मण्डली मिल गयी॥ 181 ॥ भेजे गये लोगोंके द्वारा श्रीशिवानन्दको पत्र देना और श्रीरघुनाथके विषयमें जिज्ञासा :— पत्री दिया शिवानन्दे वार्त्ता पुछिल। शिवानन्द कहे,—“ताँह एथा ना आइल॥”182 ॥ अनुवाद—उन लोगोंने श्रीशिवानन्द सेनको पत्र पकड़ाकर उनसे श्रीरघुनाथदासके विषयमें पूछा। श्रीशिवानन्द सेनने कहा,—“रघुनाथ हमारे पास तो नहीं आया है॥”182 ॥ श्रीशिवानन्दके द्वारा अपनी अनभिज्ञता बताना, श्रीरघुनाथको नहीं देखकर पत्र लानेवालोंका घर लौटना :— बाहुड़िया सेइ दश जन आइल घर। ताँर माता-पिता हइल चिन्तित अन्तर ॥ 183 ॥ अनुवाद—वे दस लोग लौटकर घर आ गये। श्रीरघुनाथदासके माता-पिता भीतरसे बहुत चिन्तित हो गये॥ 183 ॥ महाप्रभुके प्रेममें अपनेको भुलाकर श्रीरघुनाथका महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्तिके लिये पुरी जानेके मार्गपर सुतीव्र शारीरिक कष्टको सहन करना :— एथा रघुनाथ-दास प्रभाते उठिया। पूर्वमुख छाड़िया दक्षिण-मुख हञा ॥ 184 ॥ अनुवाद—इधर श्रीरघुनाथदास प्रातःकाल उठकर पूर्व दिशाकी ओर नहीं चलकर दक्षिण-दिशाकी ओर चल दिये॥ 184 ॥ छत्रभोग पार हञा छाड़िया सराण। कुग्राम-कुग्राम दिया करिल प्रयाण ॥ 185 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ छत्रभोगको पार करनेके पश्चात् प्रशस्त मार्गको छोड़कर सामान्य सामान्य गाँवोंसे होते हुए चलने लगे॥ 185 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सामान्य सामान्य गाँवोंसे होकर गये॥ 185 ॥ अनुभाष्य—‘सराण’,—प्रशस्त मार्ग। ‘छत्रभोग’,—वर्तमान समयमें यह स्थान 24 परगणा जिलेके मथुरापुरके अन्तर्गत गङ्गाके ‘छाड़-खाड़ि’के नामसे परिचित और ‘जयनगर-मजिलपुर’-नामक प्रसिद्ध दो गाँवोंके निकट अवस्थित है। पहले इस स्थानपर गङ्गा प्रवाहित होती थी। जो छत्रभोगको काँसाइ-नदी मानते हैं, उनका मत-भ्रान्त है॥ 185 ॥ भक्षण नाहि, समस्त दिवस गमन। क्षुधा नाहि बाधे, चैतन्यचरण-प्राप्त्ये मन॥ 186 ॥

[ 6/186-193 छठा अध्याय 187 अनुवाद—श्रीरघुनाथदास खानेकी चिन्ता नहीं करके सारा दिन चलते रहते। भूख उनको कोई बाधा नहीं दे रही थी, क्योंकि श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्ति करनेकी कामनामें ही उनका मन डूबा हुआ था॥ 186॥ कभु चर्वण, कभु रन्थन, कभु दुग्धपान। यबे येइ मिले, ताहे राखे निज-प्राण॥ 187॥ अनुवाद—वे कभी चना आदि कुछ चबानेके लिये मिलता तो उसे चबा लेते, कभी कोई पकी हुई खानेकी वस्तु मिलती तो उसे खा लेते और कभी दूध मिलनेपर उसे पी लेते। इस प्रकार जब जो भी मिल जाता, वे उससे ही अपने प्राणोंकी रक्षा करते॥ 187॥ बारह दिनोंमें पुरीमें आगमन, मार्गमें केवल तीन दिन अन्न-ग्रहण :- बार-दिने चलि' गेला श्रीपुरुषोत्तम। पथे तिनदिन मात्र करिला भोजन ॥ 188 ॥ अनुवाद—इस प्रकार वे बारह दिन चलकर श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्र पहुँच गये। मार्गमें उन्होंने केवल तीन दिन ही भोजन किया॥ 188॥ श्रीस्वरूपादिके साथ बैठे महाप्रभुके निकट आकर श्रीरघुनाथका दण्डवत् प्रणाम, श्रीमुकुन्दके द्वारा उनका परिचय देना :- स्वरूपादि-सह गोसाञि आछेन बसिया। हेनकाले रघुनाथ मिलिल आसिया ॥ 189 ॥ अनुवाद—महाप्रभु श्रीस्वरूप दामोदर आदि भक्तोंके साथ बैठे हुए थे, उस समय श्रीरघुनाथदास आकर उनसे मिले॥ 189 ॥ अङ्गनेते दूरे रहि' करेन प्रणिपात। मुकुन्द-दत्त कहे,—"एइ आइल रघुनाथ ॥" 190 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदासने आङ्गनमें दूरसे ही प्रणाम किया। तब श्रीमुकुन्द दत्तने कहा,—'रघुनाथ आया है॥' 190॥ महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना, महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :- प्रभु कहेन,—'आइस', तँहो धरिला चरण। उठि' प्रभु कृपाय ताँरे कैला आलिङ्गन ॥ 191 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—'आओ, आओ।' ऐसा सुनकर श्रीरघुनाथदासने आकर महाप्रभुके चरणकमलोंको पकड़ लिया। महाप्रभुने उठकर कृपा करते हुए श्रीरघुनाथको आलिङ्गन किया॥ 191॥ श्रीस्वरूपादि भक्तोंको प्रणाम, सभीके द्वारा आलिङ्गन :- स्वरूपादि सब भक्तेर चरण वन्जिला। प्रभु-कृपा देखि' सबे आलिङ्गन कैला ॥ 192 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथने श्रीस्वरूप आदि समस्त भक्तोंके चरणकमलोंकी वन्दना की। श्रीरघुनाथके प्रति महाप्रभुकी कृपाको देखकर सभी भक्तों ने भी श्रीरघुनाथको आलिङ्गन किया॥ 192॥ नित्यसिद्ध श्रीरघुनाथके गृह-त्यागके उपलक्षमें अनर्थयुक्त भक्तिसाधकोंको शिक्षा-प्रदान; महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्णकृपाके माहात्म्यका वर्णन :- प्रभु कहे,—"कृष्णकृपा बलिष्ठ सबा हैते। तोमारे काड़िल विषय-विष्ठा-गर्त हैते ॥" 193 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—"कृष्णकृपा सबसे अधिक बलशाली है, उसने ही तुम्हारा विषय-विष्ठारूपी गड्ढेसे उद्धार किया है॥" 193॥ अनुभाष्य—प्राचीन कर्मफल आदिकी अपेक्षा श्रीकृष्णकृपा—अधिकतर सामर्थ्यसे युक्त है। श्रीकृष्णकी इस कृपाने ही तुम्हारा विषयरूपी मलके गड्ढेसे उद्धार किया है। विषयके प्रति अनुरागी होनेपर जीव अपने बलसे उसे त्याग नहीं कर सकता; विशेषतः शुद्धकृष्णदास जीवके लिये विषय—मलरूपी गड्ढेके समान हैं। महाप्रभुने श्रील रघुनाथको निर्विषयी जानकर भी दुःखी विषयी

188 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/193-198 ] लोगोंको शिक्षा देनेके लिये ही श्रीरघुनाथदासको उपलक्ष्य करके ऐसा कहा ॥ 193 ॥ श्रीरघुनाथकी एकान्तिकी श्रीगौरकृष्णनिष्ठा :- रघुनाथ कहे मने, — ‘कृष्ण नाहि जानि। तव कृपा काड़िल आमा,—एइ आमि मानि॥’ 194 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथने मन-ही-मन कहा, —“मैं श्रीकृष्णको नहीं जानता हूँ। मैं तो यही मानता हूँ कि आपकी कृपाने ही मेरा उद्धार किया है॥” 194 ॥ महाप्रभुके द्वारा हिरण्य और गोवर्धनका चरित्र-वर्णन :- प्रभु कहेन,—“तोमार पिता-ज्येठा दुइ जने। चक्रवर्त्ती-सम्बन्धे आमि 'आजा' करि' माने ॥ 195 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —“मैं तुम्हारे पिता और ताऊको श्रीनीलाम्बर चक्रवर्त्तीके सम्बन्धसे अपना 'नाना' ही मानता हूँ॥ 195 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-नीलाम्बर चक्रवर्त्तीके सम्बन्धसे मैं उन्हें 'आजा' अर्थात् नाना मानता हूँ॥ 195 ॥ अनुभाष्य-श्रीनीलाम्बर चक्रवर्त्ती रघुनाथके पिता और उनके बड़े भाईको अपनेसे आयुमें छोटा सम्भ्रान्त कायस्थ जानकर 'भाई' कहकर पुकारते थे और दोनों भाई भी श्रीनीलाम्बरको आयुमें बड़े ब्राह्मण जानकर 'बड़े भाई' कहकर सम्बोधित करते थे, श्रीमन्महाप्रभु नानाके भाई होनेके सम्बन्धसे उन्हें भी अपने 'रहस्य अर्थात् परिहासका पात्र' समझते थे। इस सम्बोधनसे अनेक लोगोंको ऐसा भ्रम हो सकता है कि श्रीरघुनाथ महाप्रभुकी अपेक्षा आयुमें बहुत बड़े थे, किन्तु वास्तवमें ऐसा नहीं है ॥ 195 ॥ चक्रवर्त्तीर दुँहे हय भ्रातृरूप दास। अतएव तारे आमि करि परिहास ॥ 196 ॥ अनुवाद-तुम्हारे पिता और ताऊ-दोनों श्रीनीलाम्बर चक्रवर्त्तीके छोटे भाईरूपी दास हैं। इसलिये मैं उनके विषयमें परिहास कर रहा हूँ॥ 196 ॥ विषयरूपी विषका सेवन-आत्मसंहारक अर्थात् जीवके स्वरूप अथवा चिद्बल-प्राप्तिका भीषण विघ्नस्वरूप :- तोमार बाप-ज्येठा-विषयविष्ठा-गर्त्तेर कीड़ा। सुख करि' माने विषय-विषेर महापीड़ा ॥ 197 ॥ अनुवाद-तुम्हारे पिता और ताऊ-दोनों विषयरूपी मलके गड्ढेके कीड़े हैं। वे विषयरूपी विषकी महापीड़ाको भी सुख मानते हैं॥ 197 ॥ अनुभाष्य- 'विषय' अपने भोक्ता विषयीको महाक्लेश प्रदान करता है, तथापि विषयोंमें आविष्ट चित्तवाले सांसारिक लोग उन महाक्लेश प्रदान करनेवाले विषयोंको सुख मानते हैं। जड़ेन्द्रियोंके भोगके विषय-त्याग-योग्य मलके गड्ढेके समान है। विषयोंमें अभिनिविष्ट जीव-घृणित मलके कीटके समान है अर्थात् पारमार्थिक दृष्टिमें जड़भोक्ता प्राकृत विषयी - मलके गड्ढेके कीड़ेके समान है एवं उस कीड़ेके रूपमें महानन्दसे नितान्त-घृणित विषयरूपी मलके आस्वादनमें प्रमत्त है ॥ 197 ॥ भोक्ताके अभिमानमें अथवा देहात्मबुद्धिके कारण अन्याभिलाष, कर्म और ज्ञान-मिश्र, होनेपर भी अप्रतिकूल विष्णु-वैष्णवोंके आनुगत्यका आभास अथवा लौकिकी श्रद्धा शुद्धभक्ति नहीं, कनिष्ठ-अधिकार मात्र :- यद्यपि ब्रह्मण्य करे ब्राह्मणेर सहाय। 'शुद्धवैष्णव' नहे, 'वैष्णवेर प्राय' ॥ 198 ॥ अनुवाद-यद्यपि तुम्हारे पिता और ताऊ-दोनों ब्राह्मणोंकी सहायता करते हैं, तथापि वे 'शुद्धवैष्णव' नहीं, अपितु 'वैष्णव-प्राय' हैं ॥ 198 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-वैष्णवोंकी भाँति वेशभूषा और देवसेवा आदिके रहनेपर भी शुद्ध वैष्णव नहीं हो सकते, क्योंकि जब तक 'अन्याभिलाषिता-शून्य' आदि शुद्धभक्तिके लक्षण नहीं हों, तब तक दीक्षादि प्राप्त होनेपर भी 'वैष्णवप्राय' ही रहते हैं ॥ 198 ॥ अनुभाष्य-हिरण्य और गोवर्धन-दोनों भाई ही ब्राह्मणोंका सम्मान करनेवाले, उनके पालक, पोषक

[ 6/198-205 छठा अध्याय 189 और सहायता करनेवाले थे। इसलिये सांसारिक लौकिक-विचारमें श्रेष्ठ और 'सज्जन' कहलाकर आदरणीय और साधारण लोक-समाजमें 'वैष्णव'के रूपमें परिचित होनेपर भी पारमार्थिक शुद्धभक्तोंके विचारसे वे 'शुद्धवैष्णव' नहीं थे; परन्तु शुद्धवैष्णवगण उन्हें 'वैष्णवप्राय' अथवा 'वैष्णवाभास' अर्थात् 'कनिष्ठ' अथवा 'अबोध' (विद्वेषी नहीं) समझते थे॥198॥ श्रीकृष्णप्रीतिकी इच्छाको छोड़कर इन्द्रिय-ज्ञानसे भोग अथवा त्यागरूपी विषयोंके अनुशीलनके फलसे सामान्य श्रद्धा-बीजकी भी स्तब्धता और संसार-वृद्धि :- तथापि विषयेर स्वभाव-हय महा-अन्ध। सेइ कर्म कराय, याते हय भवबन्ध ॥ 199॥ अनुवाद-तथापि विषयका स्वभाव ही ऐसा है कि वह विषयी व्यक्तिको सम्पूर्ण रूपसे अन्धा बना देता है और उससे वही कार्य करवाता है, जिससे भवबन्धन होता है॥ 199॥ अनुभाष्य-विषयी भोगी शुद्धभक्तिका परित्याग करके कर्मी, ज्ञानी अथवा अन्याभिलाषी होनेके कारण अपने-अपने द्वारा अनुष्ठित कर्म-ज्ञान आदिके अनुष्ठानके द्वारा ही अनजानेमें विषयोंमें जड़ीभूत बन जाते हैं॥ 199॥ नित्यसिद्ध श्रीरघुनाथका विषयभोग नहीं रहनेके कारण, अनर्थयुक्त साधकको ही महाप्रभुका उपदेश :- हेन 'विषय' हैते कृष्ण उद्धारिला तोमा। कहन ना याय कृष्णकृपार महिमा ॥ ” 200 ॥ अनुवाद-ऐसे विषयसे श्रीकृष्णने तुम्हारा उद्धार किया है। श्रीकृष्णकी कृपाकी महिमाका वर्णन नहीं किया जा सकता॥” 200॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरघुनाथको श्रीदामोदरस्वरूपके हाथोंमें समर्पित करना :- रघुनाथेर क्षीणता-मालिन्य देखिया। स्वरूपेरे कहेन प्रभु कृपार्द्रचित्त हञा ॥ 201 ॥ “एइ रघुनाथे आमि सँपिनु तोमारे। पुत्र-भृत्य-रूपे तुमि कर अङ्गीकारे ॥ 202 ॥ वैद्य-रघुनाथ, भट्ट-रघुनाथ और स्वरूपानुग दास-रघुनाथ :- तिन 'रघुनाथ'-नाम हय मोर स्थाने। 'स्वरूपेर रघु'—आजि हैते इहार नामे ॥ ” 203 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने देखा कि श्रीरघुनाथदासके द्वारा बारह दिन यात्रा और उपवास करनेसे उसका शरीर क्षीण और मलिन हो गया है, तो उनका हृदय कृपासे द्रवीभूत हो गया और उन्होंने श्रीस्वरूप दामोदरसे कहा,-“मैं इस रघुनाथको तुम्हें सौंपता हूँ, तुम इसे अपने पुत्र अथवा दासके रूपमें स्वीकार करो। मेरे तीन भक्तोंका नाम 'रघुनाथ' है। आजसे इसका नाम 'स्वरूपका रघु' है॥” 201-203॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'तिन रघुनाथ', - वैद्य-रघुनाथ (आदिलीला 11/22 संख्या देखें), भट्ट-रघुनाथ और दास-रघुनाथ ॥ 203 ॥ एत कहि' रघुनाथेर हस्त धरिला। स्वरूपेर हस्ते ताँरे समर्पण कैला ॥ 204 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने यह कहकर श्रीरघुनाथदासका हाथ पकड़कर उन्हें श्रीस्वरूप दामोदरके हाथोंमें समर्पित कर दिया॥ 204॥ महाप्रभुके आदेशसे श्रीस्वरूपका श्रीरघुनाथको अङ्गीकार करना :- स्वरूप कहे,-'महाप्रभुर ये आज्ञा हैल।' एत कहि' रघुनाथे पुनः आलिङ्गिल ॥ 205 ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरने श्रीरघुनाथदासको अङ्गीकार करते हुए कहा,-“महाप्रभुकी जैसी आज्ञा है, मुझे स्वीकार है।” यह कहकर उन्होंने पुनः श्रीरघुनाथको आलिङ्गन किया॥ 205॥