श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2200, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 6/152-160 छठा अध्याय 183 कितनी प्रणामी प्रदान करनी चाहिये, इस विषयमें अपना विचार लिखवाया ॥152॥ एकशत मुद्रा आर सोणा तोला-द्वय। पण्डितेर आगे दिल करिया विनय ॥153॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदासने विनयपूर्वक श्रीराघव पण्डितके सामने एक सौ स्वर्ण मुद्राएँ और दो तोला सोना रख दिया ॥153॥ श्रीनिताइकी कृपा प्राप्त करके श्रीराघवको प्रणाम करनेके बाद श्रीरघुनाथका अपने घरपर आगमन :- ताँर पदधूलि लञा स्वगृहे आइला। नित्यानन्द-कृपा पाञा कृतार्थ मानिला ॥154॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदास श्रीराघव पण्डितके चरणकमलोंकी धूलिको लेकर अपने घरमें लौट आये। श्रीरघुनाथदास श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कृपाको प्राप्त करके स्वयंको कृतार्थ मानने लगे॥154॥ तबसे घरके बाहरी स्थानपर ही रहना :- सेइ हैते अभ्यन्तरे ना करेन गमन। बाहिरे दुर्गामण्डपे करेन शयन ॥155॥ अनुवाद—उस दिनसे वे अपने घरके भीतर अपने शयन-कक्षमें नहीं जाते थे। अपितु वे घरके बाहर दुर्गा-मण्डपमें ही सो जाते॥155॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अभ्यन्तर',—भीतरवाले कक्ष॥155॥ पहरा देनेवाले रक्षक :- ताँहा जागि' रहे सब रक्षकगण। पलाइते करेन नाना उपाय चिन्तन ॥156॥ अनुवाद—दुर्गा-मण्डपके बाहर रक्षा-कर्मचारी जागकर पहरा देते थे। श्रीरघुनाथदास अपने घरसे भागनेके अनेक उपायोंकी चिन्ता करते॥156॥ महाप्रभुके दर्शनोंके लिये वर्षाकालमें गौड़ीय-भक्तोंकी पुरी-यात्रा :- हेनकाले गौड़देशेर सब भक्तगण। प्रभुरे देखिते नीलाचले करिला गमन ॥157॥ अनुवाद—उस समय गौड़देशके सभी भक्त महाप्रभुके दर्शनोंके लिये नीलाचलकी ओर चल पड़े॥157॥ सबके समक्ष गौड़ीय भक्तोंके साथ जानेसे पकड़े जानेकी आशङ्कासे पुरी यात्राके लिये असमर्थता :- ताँ-सबार सङ्गे रघुनाथ याइते ना पारे। प्रसिद्ध प्रकट सङ्ग, तबहि धरा पड़े॥158॥ अनुवाद—उन सबके साथ तो श्रीरघुनाथदास जा नहीं सकते थे, क्योंकि गौड़ीय भक्तोंकी यात्रा इतनी प्रसिद्ध थी कि वे अनायास ही पकड़े जाते॥158॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गौरभक्त जब नीलाचल जाते, तब उनका सङ्ग सब लोगोंमें प्रसिद्ध और प्रकट हो जाता। उनके साथ जानेसे बादमें पिता पकड़कर ले आयेंगे, इसी भयसे वे उनके साथ नहीं जा सकते थे॥158॥ श्रीरघुनाथके महाप्रभुके साथ मिलनके वृत्तान्तका वर्णन; श्रीरघुनाथके सौभाग्यका दिन :- एइमत चिन्तिते दैवे एकदिने। बाहिरे देवीमण्डपे करियाछेन शयने ॥159॥ रात्रिके अन्तिम-भागमें गुरु श्रीयदुनन्दनके साथ साक्षात्कार :- दण्ड-चारि रात्रि यबे आछे अवशेष। यदुनन्दन-आचार्य तबे करिला प्रवेश ॥160॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीरघुनाथदास घरसे भागनेके उपायकी चिन्ता करते रहते। एक दिन जब वे अपने घरके बाहरमें बने दुर्गामण्डपमें सो रहे थे और रात्रि समाप्त होनेमें चार दण्ड समय रह गया था, उस समय दैवयोगसे श्रीयदुनन्दन आचार्यने उनके घरमें प्रवेश किया॥159-160॥