श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2201, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें184 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/161-169 ] श्रीयदुनन्दनका परिचय :- वासुदेव-दत्तेर तैँह हय ‘अनुगृहीत’। रघुनाथेर 'गुरु' तैँह हय 'पुरोहित' ॥ 161 ॥ अद्वैत-आचार्येर तैँह 'शिष्य अन्तरङ्ग'। आचार्य-आज्ञाते माने चैतन्ये 'प्राणधन' ॥ 162 ॥ अनुवाद—श्रीयदुनन्दन आचार्य श्रीवासुदेव-दत्तके कृपापात्र थे और श्रीरघुनाथके गुरु एवं पुरोहित थे। वे श्रीअद्वैताचार्यके अन्तरङ्ग शिष्य थे और वे श्रीअद्वैताचार्यकी आज्ञानुसार श्रीचैतन्य महाप्रभुको अपना प्राणधन मानते थे॥ 161-162 ॥ अनुभाष्य—इस वचनसे भी जाना जाता है कि श्रीअद्वैताचार्यकी आज्ञाको नहीं माननेवाले उनके मतविरोधी पाखण्डियोंके द्वारा स्वयंको उनका अनुगत कहकर परिचय देनेपर भी वे शुद्धभक्तिके प्रतिकूल भावके वशीभूत होकर श्रीमन्महाप्रभुको जीवोंके नित्य उपास्य स्वयं भगवान् 'श्रीकृष्ण' नहीं मानते थे। श्रीयदुनन्दन श्रीमद् अद्वैतप्रभुके श्रीचैतन्यमें प्राण समर्पित करनेवाले अन्तरङ्ग शिष्य होनेके कारण विष्णु और वैष्णवोंमें सामान्य-जाति-बुद्धिके दोषसे कभी भी दूषित नहीं थे। श्रीवासुदेव-दत्त ठाकुरके ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न नहीं होनेपर भी यदुनन्दनाचार्य उन्हें अपने ऊपर कृपा करनेवाले 'गुरु' ही मानते थे॥ 161-162 ॥ श्रीरघुनाथके द्वारा श्रीयदुनन्दनको प्रणाम :- अङ्गने आसिया तैँहो यबे दाण्डाइला। रघुनाथ आसि' तबे दण्डवत् कैला ॥ 163 ॥ अनुवाद—जब श्रीयदुनन्दन आचार्य श्रीरघुनाथके घरके आङ्गनमें आकर खड़े हुए, तब श्रीरघुनाथने आकर उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया॥ 163 ॥ ताँर एक शिष्य ताँर ठाकुरेर सेवा करे। सेवा छाड़ियाछे, तारे साधिबार तरे ॥ 164 ॥ विग्रह-अर्चनका त्यागकर जानेवाले शिष्यको प्रातःकालीनकी आरती करनेके लिये अनुरोध करनेके लिये श्रीरघुनाथको साथमें लेना :- रघुनाथे कहे, — “तारे करह साधन। सेवा येन करे, आर नाहिक ब्राह्मण ॥” 165 ॥ अनुवाद—श्रीयदुनन्दन आचार्यके एक शिष्य उनके ठाकुरजीकी सेवा करते थे, किन्तु वे सेवाको छोड़कर चले गये। श्रीयदुनन्दनाचार्यने उन्हींको समझाने हेतु श्रीरघुनाथसे कहा, — “तुम उसे समझा-बुझाकर सेवा करनेके लिये ले आओ, क्योंकि मेरे पास ठाकुरजीकी सेवा करनेके लिये अन्य कोई ब्राह्मण नहीं है॥” 164-165 ॥ रात्रिके अन्तमें पहरा देनेवालोंकी गहरी नींद :- एत कहि' रघुनाथे लञा चलिला। रक्षक सब शेषरात्रे निद्राय पड़िला ॥ 166 ॥ अनुवाद—श्रीयदुनन्दनाचार्य यह कहकर श्रीरघुनाथदासको अपने साथ लेकर चल दिये। रात्रिका अन्तिम प्रहर होनेके कारण सभी प्रहरी गहरी नींदमें सोये हुए थे॥ 166 ॥ श्रीरघुनाथका गुरुके पीछे-पीछे जाना; दोनोंका आचार्यके घरकी ओर जाना :- आचार्येर घर इहार पूर्व दिशाते। कहिते शुनिते दुँहे चले सेइ पथे ॥ 167 ॥ अनुवाद—श्रीयदुनन्दनाचार्यका घर श्रीरघुनाथदासके घरकी पूर्व दिशामें था। वे दोनों परस्परमें वार्तालाप करते हुए आचार्यके घरकी ओर चल पड़े॥ 167 ॥ मार्गमें बुद्धिमान् श्रीरघुनाथके द्वारा इस सुयोगसे गुरुसे कृष्णभजनके उद्देश्यसे विदायीकी आज्ञा ग्रहण :- अर्द्धपथे रघुनाथ कहे गुरुर चरणे। “आमि सेइ विप्रे साधि' पाठाइमु तोमा-स्थाने ॥ 168 ॥ तुमि घरे याह सुखे—मोरे आज्ञा हय।” एइ छले आज्ञा मागि' करिला निश्चय ॥ 169 ॥