भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2202, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2202

[ 6/168-178 छठा अध्याय 185 श्रीरघुनाथका भागनेका विचार :- “सेवक रक्षक आर কেহ नाहि सङ्गे। पलाइते आमार भाल एइत प्रसङ्गे॥” 170॥ अनुवाद-आधे रास्ते पहुँचनेपर श्रीरघुनाथदासने अपने गुरुदेवके चरणोंमें निवेदन किया,—“मैं उस ब्राह्मणको समझा-बुझाकर आपके घरपर भेज दूँगा। आप निश्चिन्त होकर अपने घर लौट जाइये और मुझे उस ब्राह्मणके पास जानेकी आज्ञा दीजिये।” इस छलसे आज्ञा माँगकर श्रीरघुनाथदासने निश्चय किया,—“आज मेरे साथ कोई भी सेवक और प्रहरी नहीं है, मेरे यहाँसे भाग जानेके लिये बहुत अच्छा अवसर है॥” 168-170॥ अति द्रुतगतिसे भागना :- एत चिन्ति' पूर्वमुखे करिला गमन। उलटिया चाहे पाछे, नाहि कोन जन॥ 171॥ अनुवाद-ऐसा विचार करके वे पूर्वकी ओर चल दिये। वे पीछे मुड़-मुड़कर देखते, किन्तु कोई भी उनके पीछे नहीं आ रहा था॥ 171॥ पकड़े जानेकी आशङ्कासे वन-वनमें कच्चे मार्गपर दौड़ना :- श्रीचैतन्य-नित्यानन्द-चरण चिन्तिया। पथ छाड़ि' उपपथे यायेन धाञा॥ 172॥ अनुवाद-वे श्रीचैतन्य महाप्रभु तथा श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणकमलोंका स्मरण करते हुए मुख्य मार्गको छोड़कर उपपथपर दौड़ पड़े॥ 172॥ एकान्तिक रूपसे श्रीचैतन्यचरणोंका ध्यान करते हुए सारे दिनमें बहुत दूरीको पार करना और सन्ध्याके समय गोपके घरमें दूध पीकर थकी हुई देहको कुछ विश्राम :- ग्रामे-ग्रामेर पथ छाड़ि' याय वने वने। कायमनोवाक्ये चिन्ते चैतन्य-चरणे॥ 173॥ अनुवाद-वे ग्रामोंसे होकर जानेवाले मार्गको छोड़कर वनोंसे होकर जा रहे थे। वे काय, मन तथा वाक्यसे श्रीचैतन्यदेवके चरणकमलोंका ही स्मरण कर रहे थे॥ 173॥ पञ्चदश-क्रोश-पथ चलि' गेला एकदिने। सन्ध्याकाले रहिला एक गोपेर बाखाने॥ 174॥ अनुवाद-उन्होंने पन्द्रह कोसका मार्ग एक दिनमें ही तय कर लिया और सन्ध्याके समय एक ग्वालेकी गोशालामें विश्राम किया॥ 174॥ अनुभाष्य—'बाखान',—गोशाला, गोष्ठ॥ 174॥ उपवासी देखि' गोप दुग्ध आनि' दिला। सेइ दुग्ध पान करि' पड़िया रहिला॥ 175॥ अनुवाद-उनको भूखा देखकर ग्वालेने उन्हें दूध लाकर दिया। श्रीरघुनाथदास दूधको पीकर रात्रिमें विश्राम करनेके लिये वहीं लेट गये॥ 175॥ अगले दिन प्रातःकाल श्रीरघुनाथको नहीं देखकर कोलाहल और उन्हें ढूँढ़नेके लिये पिताके द्वारा पुरी जा रहे यात्रियोंके पास पत्र और लोग भेजना :- एथा सेवक रक्षक ताँरे ना देखिया। ताँर गुरुपाशे वार्त्ता पुछिलेन गिया॥ 176॥ अनुवाद-इधर श्रीरघुनाथदासके सेवक और प्रहरी उनको घरमें नहीं देखकर उनके गुरु श्रीयदुनन्दनाचार्यके पास जाकर उनके विषयमें पूछने लगे॥ 176॥ तेँह कहे,—“आज्ञा मागि' गेला निज-घर।” 'पलाइल रघुनाथ'—उठिल कोलाहल॥ 177॥ अनुवाद-श्रीयदुनन्दनाचार्यने कहा,—“रघुनाथ मुझसे आज्ञा लेकर अपने घर चला गया है।” 'रघुनाथ घरसे भाग गया है'—सर्वत्र यह कोलाहल मच गया॥ 177॥ ताँर पिता कहे,—“गौड़ेर भक्तगण। प्रभुस्थाने नीलाचले करिला गमन॥ 178॥