भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2203

186 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/178–186 ] सेइ-सङ्गे रघुनाथ गेल पलाञा। दश जन याह, तारे आनह धरिया ॥”179 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथके पिताने सेवकों तथा प्रहरियोंसे कहा,—“गौड़ीय भक्त महाप्रभुके पास नीलाचल गये हैं। उनके साथ रघुनाथ भी यहाँसे भाग गया है। दस लोग जाओ और उसे पकड़कर ले आओ॥”178-179 ॥ शिवानन्दे पत्री दिल विनय करिया। ‘आमार पुत्रेरे तुमि दिबा बाहुड़िया॥’180 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदासके पिताने श्रीशिवानन्द सेनके नाम विनती करते हुए एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने कहा,—‘आप मेरे पुत्रको अवश्य ही लौटाकर भेज देना॥’180 ॥ अनुभाष्य—‘बाहुड़िया’,—लौटाकर; श्रीशिवानन्द सेन गौड़देशसे यात्रियोंको लेकर नीलाचल जाते थे, इसलिये उनके साथ रघुनाथके होनेका अनुमान करके, रघुनाथको लौटाकर भेजनेके लिये उनके पास एक अनुरोध पत्रके साथ दस लोगोंको भी भेजा॥ 180 ॥ झाँकरा पर्यन्त गेल सेइ दश जने। झाँकराते पाइल गिया वैष्णवेर गणे॥ 181 ॥ अनुवाद—वे दस लोग जब झाँकरा नामक स्थानपर पहुँचे, तब उन्हें वैष्णवोंकी मण्डली मिल गयी॥ 181 ॥ भेजे गये लोगोंके द्वारा श्रीशिवानन्दको पत्र देना और श्रीरघुनाथके विषयमें जिज्ञासा :— पत्री दिया शिवानन्दे वार्त्ता पुछिल। शिवानन्द कहे,—“ताँह एथा ना आइल॥”182 ॥ अनुवाद—उन लोगोंने श्रीशिवानन्द सेनको पत्र पकड़ाकर उनसे श्रीरघुनाथदासके विषयमें पूछा। श्रीशिवानन्द सेनने कहा,—“रघुनाथ हमारे पास तो नहीं आया है॥”182 ॥ श्रीशिवानन्दके द्वारा अपनी अनभिज्ञता बताना, श्रीरघुनाथको नहीं देखकर पत्र लानेवालोंका घर लौटना :— बाहुड़िया सेइ दश जन आइल घर। ताँर माता-पिता हइल चिन्तित अन्तर ॥ 183 ॥ अनुवाद—वे दस लोग लौटकर घर आ गये। श्रीरघुनाथदासके माता-पिता भीतरसे बहुत चिन्तित हो गये॥ 183 ॥ महाप्रभुके प्रेममें अपनेको भुलाकर श्रीरघुनाथका महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्तिके लिये पुरी जानेके मार्गपर सुतीव्र शारीरिक कष्टको सहन करना :— एथा रघुनाथ-दास प्रभाते उठिया। पूर्वमुख छाड़िया दक्षिण-मुख हञा ॥ 184 ॥ अनुवाद—इधर श्रीरघुनाथदास प्रातःकाल उठकर पूर्व दिशाकी ओर नहीं चलकर दक्षिण-दिशाकी ओर चल दिये॥ 184 ॥ छत्रभोग पार हञा छाड़िया सराण। कुग्राम-कुग्राम दिया करिल प्रयाण ॥ 185 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ छत्रभोगको पार करनेके पश्चात् प्रशस्त मार्गको छोड़कर सामान्य सामान्य गाँवोंसे होते हुए चलने लगे॥ 185 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सामान्य सामान्य गाँवोंसे होकर गये॥ 185 ॥ अनुभाष्य—‘सराण’,—प्रशस्त मार्ग। ‘छत्रभोग’,—वर्तमान समयमें यह स्थान 24 परगणा जिलेके मथुरापुरके अन्तर्गत गङ्गाके ‘छाड़-खाड़ि’के नामसे परिचित और ‘जयनगर-मजिलपुर’-नामक प्रसिद्ध दो गाँवोंके निकट अवस्थित है। पहले इस स्थानपर गङ्गा प्रवाहित होती थी। जो छत्रभोगको काँसाइ-नदी मानते हैं, उनका मत-भ्रान्त है॥ 185 ॥ भक्षण नाहि, समस्त दिवस गमन। क्षुधा नाहि बाधे, चैतन्यचरण-प्राप्त्ये मन॥ 186 ॥