श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2204, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 6/186-193 छठा अध्याय 187 अनुवाद—श्रीरघुनाथदास खानेकी चिन्ता नहीं करके सारा दिन चलते रहते। भूख उनको कोई बाधा नहीं दे रही थी, क्योंकि श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्ति करनेकी कामनामें ही उनका मन डूबा हुआ था॥ 186॥ कभु चर्वण, कभु रन्थन, कभु दुग्धपान। यबे येइ मिले, ताहे राखे निज-प्राण॥ 187॥ अनुवाद—वे कभी चना आदि कुछ चबानेके लिये मिलता तो उसे चबा लेते, कभी कोई पकी हुई खानेकी वस्तु मिलती तो उसे खा लेते और कभी दूध मिलनेपर उसे पी लेते। इस प्रकार जब जो भी मिल जाता, वे उससे ही अपने प्राणोंकी रक्षा करते॥ 187॥ बारह दिनोंमें पुरीमें आगमन, मार्गमें केवल तीन दिन अन्न-ग्रहण :- बार-दिने चलि' गेला श्रीपुरुषोत्तम। पथे तिनदिन मात्र करिला भोजन ॥ 188 ॥ अनुवाद—इस प्रकार वे बारह दिन चलकर श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्र पहुँच गये। मार्गमें उन्होंने केवल तीन दिन ही भोजन किया॥ 188॥ श्रीस्वरूपादिके साथ बैठे महाप्रभुके निकट आकर श्रीरघुनाथका दण्डवत् प्रणाम, श्रीमुकुन्दके द्वारा उनका परिचय देना :- स्वरूपादि-सह गोसाञि आछेन बसिया। हेनकाले रघुनाथ मिलिल आसिया ॥ 189 ॥ अनुवाद—महाप्रभु श्रीस्वरूप दामोदर आदि भक्तोंके साथ बैठे हुए थे, उस समय श्रीरघुनाथदास आकर उनसे मिले॥ 189 ॥ अङ्गनेते दूरे रहि' करेन प्रणिपात। मुकुन्द-दत्त कहे,—"एइ आइल रघुनाथ ॥" 190 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदासने आङ्गनमें दूरसे ही प्रणाम किया। तब श्रीमुकुन्द दत्तने कहा,—'रघुनाथ आया है॥' 190॥ महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना, महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :- प्रभु कहेन,—'आइस', तँहो धरिला चरण। उठि' प्रभु कृपाय ताँरे कैला आलिङ्गन ॥ 191 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—'आओ, आओ।' ऐसा सुनकर श्रीरघुनाथदासने आकर महाप्रभुके चरणकमलोंको पकड़ लिया। महाप्रभुने उठकर कृपा करते हुए श्रीरघुनाथको आलिङ्गन किया॥ 191॥ श्रीस्वरूपादि भक्तोंको प्रणाम, सभीके द्वारा आलिङ्गन :- स्वरूपादि सब भक्तेर चरण वन्जिला। प्रभु-कृपा देखि' सबे आलिङ्गन कैला ॥ 192 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथने श्रीस्वरूप आदि समस्त भक्तोंके चरणकमलोंकी वन्दना की। श्रीरघुनाथके प्रति महाप्रभुकी कृपाको देखकर सभी भक्तों ने भी श्रीरघुनाथको आलिङ्गन किया॥ 192॥ नित्यसिद्ध श्रीरघुनाथके गृह-त्यागके उपलक्षमें अनर्थयुक्त भक्तिसाधकोंको शिक्षा-प्रदान; महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्णकृपाके माहात्म्यका वर्णन :- प्रभु कहे,—"कृष्णकृपा बलिष्ठ सबा हैते। तोमारे काड़िल विषय-विष्ठा-गर्त हैते ॥" 193 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—"कृष्णकृपा सबसे अधिक बलशाली है, उसने ही तुम्हारा विषय-विष्ठारूपी गड्ढेसे उद्धार किया है॥" 193॥ अनुभाष्य—प्राचीन कर्मफल आदिकी अपेक्षा श्रीकृष्णकृपा—अधिकतर सामर्थ्यसे युक्त है। श्रीकृष्णकी इस कृपाने ही तुम्हारा विषयरूपी मलके गड्ढेसे उद्धार किया है। विषयके प्रति अनुरागी होनेपर जीव अपने बलसे उसे त्याग नहीं कर सकता; विशेषतः शुद्धकृष्णदास जीवके लिये विषय—मलरूपी गड्ढेके समान हैं। महाप्रभुने श्रील रघुनाथको निर्विषयी जानकर भी दुःखी विषयी