श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 6/186-193 छठा अध्याय 187 अनुवाद—श्रीरघुनाथदास खानेकी चिन्ता नहीं करके सारा दिन चलते रहते। भूख उनको कोई बाधा नहीं दे रही थी, क्योंकि श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्ति करनेकी कामनामें ही उनका मन डूबा हुआ था॥ 186॥ कभु चर्वण, कभु रन्थन, कभु दुग्धपान। यबे येइ मिले, ताहे राखे निज-प्राण॥ 187॥ अनुवाद—वे कभी चना आदि कुछ चबानेके लिये मिलता तो उसे चबा लेते, कभी कोई पकी हुई खानेकी वस्तु मिलती तो उसे खा लेते और कभी दूध मिलनेपर उसे पी लेते। इस प्रकार जब जो भी मिल जाता, वे उससे ही अपने प्राणोंकी रक्षा करते॥ 187॥ बारह दिनोंमें पुरीमें आगमन, मार्गमें केवल तीन दिन अन्न-ग्रहण :- बार-दिने चलि' गेला श्रीपुरुषोत्तम। पथे तिनदिन मात्र करिला भोजन ॥ 188 ॥ अनुवाद—इस प्रकार वे बारह दिन चलकर श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्र पहुँच गये। मार्गमें उन्होंने केवल तीन दिन ही भोजन किया॥ 188॥ श्रीस्वरूपादिके साथ बैठे महाप्रभुके निकट आकर श्रीरघुनाथका दण्डवत् प्रणाम, श्रीमुकुन्दके द्वारा उनका परिचय देना :- स्वरूपादि-सह गोसाञि आछेन बसिया। हेनकाले रघुनाथ मिलिल आसिया ॥ 189 ॥ अनुवाद—महाप्रभु श्रीस्वरूप दामोदर आदि भक्तोंके साथ बैठे हुए थे, उस समय श्रीरघुनाथदास आकर उनसे मिले॥ 189 ॥ अङ्गनेते दूरे रहि' करेन प्रणिपात। मुकुन्द-दत्त कहे,—"एइ आइल रघुनाथ ॥" 190 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदासने आङ्गनमें दूरसे ही प्रणाम किया। तब श्रीमुकुन्द दत्तने कहा,—'रघुनाथ आया है॥' 190॥ महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना, महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :- प्रभु कहेन,—'आइस', तँहो धरिला चरण। उठि' प्रभु कृपाय ताँरे कैला आलिङ्गन ॥ 191 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—'आओ, आओ।' ऐसा सुनकर श्रीरघुनाथदासने आकर महाप्रभुके चरणकमलोंको पकड़ लिया। महाप्रभुने उठकर कृपा करते हुए श्रीरघुनाथको आलिङ्गन किया॥ 191॥ श्रीस्वरूपादि भक्तोंको प्रणाम, सभीके द्वारा आलिङ्गन :- स्वरूपादि सब भक्तेर चरण वन्जिला। प्रभु-कृपा देखि' सबे आलिङ्गन कैला ॥ 192 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथने श्रीस्वरूप आदि समस्त भक्तोंके चरणकमलोंकी वन्दना की। श्रीरघुनाथके प्रति महाप्रभुकी कृपाको देखकर सभी भक्तों ने भी श्रीरघुनाथको आलिङ्गन किया॥ 192॥ नित्यसिद्ध श्रीरघुनाथके गृह-त्यागके उपलक्षमें अनर्थयुक्त भक्तिसाधकोंको शिक्षा-प्रदान; महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्णकृपाके माहात्म्यका वर्णन :- प्रभु कहे,—"कृष्णकृपा बलिष्ठ सबा हैते। तोमारे काड़िल विषय-विष्ठा-गर्त हैते ॥" 193 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—"कृष्णकृपा सबसे अधिक बलशाली है, उसने ही तुम्हारा विषय-विष्ठारूपी गड्ढेसे उद्धार किया है॥" 193॥ अनुभाष्य—प्राचीन कर्मफल आदिकी अपेक्षा श्रीकृष्णकृपा—अधिकतर सामर्थ्यसे युक्त है। श्रीकृष्णकी इस कृपाने ही तुम्हारा विषयरूपी मलके गड्ढेसे उद्धार किया है। विषयके प्रति अनुरागी होनेपर जीव अपने बलसे उसे त्याग नहीं कर सकता; विशेषतः शुद्धकृष्णदास जीवके लिये विषय—मलरूपी गड्ढेके समान हैं। महाप्रभुने श्रील रघुनाथको निर्विषयी जानकर भी दुःखी विषयी
188 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/193-198 ] लोगोंको शिक्षा देनेके लिये ही श्रीरघुनाथदासको उपलक्ष्य करके ऐसा कहा ॥ 193 ॥ श्रीरघुनाथकी एकान्तिकी श्रीगौरकृष्णनिष्ठा :- रघुनाथ कहे मने, — ‘कृष्ण नाहि जानि। तव कृपा काड़िल आमा,—एइ आमि मानि॥’ 194 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथने मन-ही-मन कहा, —“मैं श्रीकृष्णको नहीं जानता हूँ। मैं तो यही मानता हूँ कि आपकी कृपाने ही मेरा उद्धार किया है॥” 194 ॥ महाप्रभुके द्वारा हिरण्य और गोवर्धनका चरित्र-वर्णन :- प्रभु कहेन,—“तोमार पिता-ज्येठा दुइ जने। चक्रवर्त्ती-सम्बन्धे आमि 'आजा' करि' माने ॥ 195 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —“मैं तुम्हारे पिता और ताऊको श्रीनीलाम्बर चक्रवर्त्तीके सम्बन्धसे अपना 'नाना' ही मानता हूँ॥ 195 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-नीलाम्बर चक्रवर्त्तीके सम्बन्धसे मैं उन्हें 'आजा' अर्थात् नाना मानता हूँ॥ 195 ॥ अनुभाष्य-श्रीनीलाम्बर चक्रवर्त्ती रघुनाथके पिता और उनके बड़े भाईको अपनेसे आयुमें छोटा सम्भ्रान्त कायस्थ जानकर 'भाई' कहकर पुकारते थे और दोनों भाई भी श्रीनीलाम्बरको आयुमें बड़े ब्राह्मण जानकर 'बड़े भाई' कहकर सम्बोधित करते थे, श्रीमन्महाप्रभु नानाके भाई होनेके सम्बन्धसे उन्हें भी अपने 'रहस्य अर्थात् परिहासका पात्र' समझते थे। इस सम्बोधनसे अनेक लोगोंको ऐसा भ्रम हो सकता है कि श्रीरघुनाथ महाप्रभुकी अपेक्षा आयुमें बहुत बड़े थे, किन्तु वास्तवमें ऐसा नहीं है ॥ 195 ॥ चक्रवर्त्तीर दुँहे हय भ्रातृरूप दास। अतएव तारे आमि करि परिहास ॥ 196 ॥ अनुवाद-तुम्हारे पिता और ताऊ-दोनों श्रीनीलाम्बर चक्रवर्त्तीके छोटे भाईरूपी दास हैं। इसलिये मैं उनके विषयमें परिहास कर रहा हूँ॥ 196 ॥ विषयरूपी विषका सेवन-आत्मसंहारक अर्थात् जीवके स्वरूप अथवा चिद्बल-प्राप्तिका भीषण विघ्नस्वरूप :- तोमार बाप-ज्येठा-विषयविष्ठा-गर्त्तेर कीड़ा। सुख करि' माने विषय-विषेर महापीड़ा ॥ 197 ॥ अनुवाद-तुम्हारे पिता और ताऊ-दोनों विषयरूपी मलके गड्ढेके कीड़े हैं। वे विषयरूपी विषकी महापीड़ाको भी सुख मानते हैं॥ 197 ॥ अनुभाष्य- 'विषय' अपने भोक्ता विषयीको महाक्लेश प्रदान करता है, तथापि विषयोंमें आविष्ट चित्तवाले सांसारिक लोग उन महाक्लेश प्रदान करनेवाले विषयोंको सुख मानते हैं। जड़ेन्द्रियोंके भोगके विषय-त्याग-योग्य मलके गड्ढेके समान है। विषयोंमें अभिनिविष्ट जीव-घृणित मलके कीटके समान है अर्थात् पारमार्थिक दृष्टिमें जड़भोक्ता प्राकृत विषयी - मलके गड्ढेके कीड़ेके समान है एवं उस कीड़ेके रूपमें महानन्दसे नितान्त-घृणित विषयरूपी मलके आस्वादनमें प्रमत्त है ॥ 197 ॥ भोक्ताके अभिमानमें अथवा देहात्मबुद्धिके कारण अन्याभिलाष, कर्म और ज्ञान-मिश्र, होनेपर भी अप्रतिकूल विष्णु-वैष्णवोंके आनुगत्यका आभास अथवा लौकिकी श्रद्धा शुद्धभक्ति नहीं, कनिष्ठ-अधिकार मात्र :- यद्यपि ब्रह्मण्य करे ब्राह्मणेर सहाय। 'शुद्धवैष्णव' नहे, 'वैष्णवेर प्राय' ॥ 198 ॥ अनुवाद-यद्यपि तुम्हारे पिता और ताऊ-दोनों ब्राह्मणोंकी सहायता करते हैं, तथापि वे 'शुद्धवैष्णव' नहीं, अपितु 'वैष्णव-प्राय' हैं ॥ 198 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-वैष्णवोंकी भाँति वेशभूषा और देवसेवा आदिके रहनेपर भी शुद्ध वैष्णव नहीं हो सकते, क्योंकि जब तक 'अन्याभिलाषिता-शून्य' आदि शुद्धभक्तिके लक्षण नहीं हों, तब तक दीक्षादि प्राप्त होनेपर भी 'वैष्णवप्राय' ही रहते हैं ॥ 198 ॥ अनुभाष्य-हिरण्य और गोवर्धन-दोनों भाई ही ब्राह्मणोंका सम्मान करनेवाले, उनके पालक, पोषक
[ 6/198-205 छठा अध्याय 189 और सहायता करनेवाले थे। इसलिये सांसारिक लौकिक-विचारमें श्रेष्ठ और 'सज्जन' कहलाकर आदरणीय और साधारण लोक-समाजमें 'वैष्णव'के रूपमें परिचित होनेपर भी पारमार्थिक शुद्धभक्तोंके विचारसे वे 'शुद्धवैष्णव' नहीं थे; परन्तु शुद्धवैष्णवगण उन्हें 'वैष्णवप्राय' अथवा 'वैष्णवाभास' अर्थात् 'कनिष्ठ' अथवा 'अबोध' (विद्वेषी नहीं) समझते थे॥198॥ श्रीकृष्णप्रीतिकी इच्छाको छोड़कर इन्द्रिय-ज्ञानसे भोग अथवा त्यागरूपी विषयोंके अनुशीलनके फलसे सामान्य श्रद्धा-बीजकी भी स्तब्धता और संसार-वृद्धि :- तथापि विषयेर स्वभाव-हय महा-अन्ध। सेइ कर्म कराय, याते हय भवबन्ध ॥ 199॥ अनुवाद-तथापि विषयका स्वभाव ही ऐसा है कि वह विषयी व्यक्तिको सम्पूर्ण रूपसे अन्धा बना देता है और उससे वही कार्य करवाता है, जिससे भवबन्धन होता है॥ 199॥ अनुभाष्य-विषयी भोगी शुद्धभक्तिका परित्याग करके कर्मी, ज्ञानी अथवा अन्याभिलाषी होनेके कारण अपने-अपने द्वारा अनुष्ठित कर्म-ज्ञान आदिके अनुष्ठानके द्वारा ही अनजानेमें विषयोंमें जड़ीभूत बन जाते हैं॥ 199॥ नित्यसिद्ध श्रीरघुनाथका विषयभोग नहीं रहनेके कारण, अनर्थयुक्त साधकको ही महाप्रभुका उपदेश :- हेन 'विषय' हैते कृष्ण उद्धारिला तोमा। कहन ना याय कृष्णकृपार महिमा ॥ ” 200 ॥ अनुवाद-ऐसे विषयसे श्रीकृष्णने तुम्हारा उद्धार किया है। श्रीकृष्णकी कृपाकी महिमाका वर्णन नहीं किया जा सकता॥” 200॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरघुनाथको श्रीदामोदरस्वरूपके हाथोंमें समर्पित करना :- रघुनाथेर क्षीणता-मालिन्य देखिया। स्वरूपेरे कहेन प्रभु कृपार्द्रचित्त हञा ॥ 201 ॥ “एइ रघुनाथे आमि सँपिनु तोमारे। पुत्र-भृत्य-रूपे तुमि कर अङ्गीकारे ॥ 202 ॥ वैद्य-रघुनाथ, भट्ट-रघुनाथ और स्वरूपानुग दास-रघुनाथ :- तिन 'रघुनाथ'-नाम हय मोर स्थाने। 'स्वरूपेर रघु'—आजि हैते इहार नामे ॥ ” 203 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने देखा कि श्रीरघुनाथदासके द्वारा बारह दिन यात्रा और उपवास करनेसे उसका शरीर क्षीण और मलिन हो गया है, तो उनका हृदय कृपासे द्रवीभूत हो गया और उन्होंने श्रीस्वरूप दामोदरसे कहा,-“मैं इस रघुनाथको तुम्हें सौंपता हूँ, तुम इसे अपने पुत्र अथवा दासके रूपमें स्वीकार करो। मेरे तीन भक्तोंका नाम 'रघुनाथ' है। आजसे इसका नाम 'स्वरूपका रघु' है॥” 201-203॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'तिन रघुनाथ', - वैद्य-रघुनाथ (आदिलीला 11/22 संख्या देखें), भट्ट-रघुनाथ और दास-रघुनाथ ॥ 203 ॥ एत कहि' रघुनाथेर हस्त धरिला। स्वरूपेर हस्ते ताँरे समर्पण कैला ॥ 204 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने यह कहकर श्रीरघुनाथदासका हाथ पकड़कर उन्हें श्रीस्वरूप दामोदरके हाथोंमें समर्पित कर दिया॥ 204॥ महाप्रभुके आदेशसे श्रीस्वरूपका श्रीरघुनाथको अङ्गीकार करना :- स्वरूप कहे,-'महाप्रभुर ये आज्ञा हैल।' एत कहि' रघुनाथे पुनः आलिङ्गिल ॥ 205 ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरने श्रीरघुनाथदासको अङ्गीकार करते हुए कहा,-“महाप्रभुकी जैसी आज्ञा है, मुझे स्वीकार है।” यह कहकर उन्होंने पुनः श्रीरघुनाथको आलिङ्गन किया॥ 205॥
190 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/206-214 ] महाप्रभुका अनुपम-भक्तवात्सल्य; श्रीगोविन्दको श्रीरघुनाथके प्रति आदर और सेवा करनेकी आज्ञा देना :- चैतन्येर भक्तवात्सल्य कहिते ना पारि। गोविन्देरे कहे रघुनाथे दया करि' ॥ 206 ॥ “पथे इँह करियाछे बहुत लङ्घन। कतदिन कर इहार भाल सन्तर्पण ॥”207 ॥ अनुवाद—मैं श्रीचैतन्य महाप्रभुके भक्तवात्सल्यका वर्णन नहीं कर सकता, उन्होंने श्रीरघुनाथके प्रति दयावान होकर श्रीगोविन्दसे कहा,—“रघुनाथने मार्गमें बहुत दिनों तक उपवास आदि किया है। तुम कुछ दिनों तक इसकी भली-भाँति सेवा करो कि यह पुनः पूर्ण स्वस्थ हो जाय॥”206-207 ॥ अनुभाष्य—'लङ्घन',—उपवास आदि; 'सन्तर्पण',— सेवा ॥ 207 ॥ श्रीरघुनाथको समुद्रस्नान करके श्रीजगन्नाथके दर्शनके बाद प्रसादका सम्मान करनेका आदेश :- रघुनाथे कहे,—“याञा, कर सिन्धुस्नान। जगन्नाथ देखि' आसि' करह भोजन ॥”208 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीरघुनाथको कहा,—“जाकर समुद्रमें स्नान करो। फिर भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन करके आकर भोजन करो॥”208 ॥ भक्तोंके साथ श्रीरघुनाथका मिलन :- एत बलि' प्रभु मध्याह्न करिते उठिला। रघुनाथदास सब भक्तेरे मिलिला ॥ 209 ॥ श्रीरघुनाथको महाप्रभुकी कृपा प्राप्त करते देख भक्तोंके द्वारा उनके सौभाग्यकी प्रशंसा :- रघुनाथे प्रभुर कृपा देखि' भक्तगण। विस्मित हञा करे ताँर भाग्य-प्रशंसन ॥ 210 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु मध्याह्न-कृत्य करनेके लिये उठे और श्रीरघुनाथदास सभी भक्तोंसे मिले। श्रीरघुनाथदासके प्रति महाप्रभुकी कृपाको देखकर सभी भक्त विस्मित हो गये और वे उनके सौभाग्यकी प्रशंसा करने लगे ॥ 209-210 ॥ समुद्रस्नानके बाद श्रीजगन्नाथके दर्शन करके श्रीरघुनाथको श्रीगोविन्दकी कृपासे महाप्रभुके भुक्त-अवशेषकी प्राप्ति :- रघुनाथ समुद्रे याञा स्नान करिला। जगन्नाथ देखि' गोविन्द-पाश आइला ॥ 211 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ दासने समुद्रमें जाकर स्नान किया और श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करके श्रीगोविन्दके पास आये ॥ 211 ॥ प्रभुर अवशिष्ट पात्र गोविन्द ताँरे दिला। आनन्दित हञा महाप्रसाद पाइला ॥ 212 ॥ अनुवाद—श्रीगोविन्दने श्रीरघुनाथ दासको महाप्रभुका उच्छिष्ट प्रसाद दिया और श्रीरघुनाथ दासने आनन्दित होकर महाप्रसाद पाया ॥ 212 ॥ पाँच दिन श्रीस्वरूपके निकट रहकर महाप्रभुके प्रसादकी प्राप्ति :- एइमत रहे तैँह स्वरूप-चरणे। गोविन्द प्रसाद ताँरे देन पञ्च दिने ॥ 213 ॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीरघुनाथ दास श्रीस्वरूप दामोदरके श्रीचरणाश्रयमें रहने लगे। श्रीगोविन्दने पाँच दिनों तक प्रतिदिन उन्हें महाप्रभुका उच्छिष्ट प्रसाद दिया ॥ 213 ॥ अगले दिनसे श्रीरघुनाथके द्वारा रात्रिमें सिंहद्वारपर प्रसादके प्रार्थीके रूपमें प्रतीक्षा :- आर दिन हैते 'पुष्प-अञ्जलि' देखिया। सिंहद्वारे खाड़ा रहे आहार लागिया ॥ 214 ॥ अनुवाद—अगले अर्थात् छठे दिनसे श्रीरघुनाथ दास रात्रिमें भगवान् श्रीजगन्नाथदेवकी पुष्पाञ्जलि-सेवाके दर्शन करके भोजनकी भिक्षाके लिये सिंहद्वारपर खड़े रहने लगे ॥ 214 ॥ अनुभाष्य—'पुष्प-अञ्जलि',—रात्रिकालमें श्रीजगन्नाथकी पुष्पाञ्जलि-सेवा ॥ 214 ॥
[ 6/215–223 छठा अध्याय 191
घर जानेके लिये उद्यत श्रीजगन्नाथदेवके गृहस्थ सेवकोंके द्वारा रात्रिमें पूजाके अन्तमें द्वारपर खड़े प्रसादके प्रार्थी वैष्णवोंको प्रसाद-दान करनेकी रीति :— जगन्नाथेर सेवक यत—‘विषयीर गण’। सेवा सारि' रात्र्ये करे गृहेते गमन ॥ 215 ॥ सिंहद्वारे अन्नार्थी वैष्णवे देखिया। पसारिर ठाञि अन्न देन कृपा त' करिया ॥ 216 ॥ अनुवाद—भगवान् श्रीजगन्नाथदेवके सेवक जो कि विषयी अर्थात् गृहस्थ हैं, वे अपनी सेवा समाप्त करके रात्रिके समय अपने घर जाते हैं। तब सिंहद्वारपर भोजनकी भिक्षाके लिये खड़े वैष्णवोंको देखकर वे कृपा करके दुकानदारसे मूल्य देकर वैष्णवोंको भोजन दिलवा देते हैं॥ 215–216 ॥
पुरुषोत्तमक्षेत्रमें निष्किञ्चन विरक्त भक्तोंके व्यवहारका वर्णन :— एइमत सर्वकाल आछे व्यवहार। निष्किञ्चन भक्त खाड़ा हय सिंहद्वार ॥ 217 ॥ सर्वदिन करेन वैष्णव नाम-सङ्कीर्त्तन। स्वच्छन्दे करेन जगन्नाथ-दरशन ॥ 218 ॥ केह छत्रे याञा खाय, येबा किछु पाय। केह रात्रे भिक्षा लागि' सिंहद्वारे रय ॥ 219 ॥ अनुवाद—सदासे यही प्रथा चली आ रही है कि निष्किञ्चन भक्त सिंहद्वारपर खड़े हो जाते हैं। वैष्णवगण सारा दिन नाम-सङ्कीर्तन करते हैं और अपनी इच्छाके अनुरूप भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन करते हैं। कुछ वैष्णव छत्रमें जाकर जो कुछ मिलता है, उसे खा लेते हैं। और कुछ वैष्णव भिक्षाके लिये रात्रिके समय सिंहद्वारपर खड़े हो जाते हैं॥ 217–219 ॥
महाप्रभुके भक्तोंका व्यवहार; श्रीकृष्णकी प्रीतिके उद्देश्यसे अपने भोगका त्याग अथवा अखिल चेष्टा :— महाप्रभुर भक्तगणेर वैराग्य प्रधान। याहा देखि' प्रीत हन गौर-भगवान् ॥ 220 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके भक्तोंमें वैराग्य प्रधान है, जिसे देखकर भगवान् श्रीगौरसुन्दर बहुत प्रसन्न होते हैं॥ 220 ॥ अनुभाष्य—अभक्त विषयी और शुद्धभक्त—दोनों ही भली प्रकारसे निरपेक्षरूपमें देखनेपर समझ सकते हैं कि महाप्रभुके भक्त—सांसारिक-भोग-तात्पर्य-परायण नहीं हैं अर्थात् इन्द्रियतर्पण और सुखभोगादिको त्याग करके श्रीकृष्णकी सेवाके लिये श्रीकृष्णसे अतिरिक्त समस्त विषयोंके प्रति उदासीन हैं। उनकी विषय त्यागकर अहैतुकी और अप्रतिहता [निरन्तर तैल-धारावत्] अलौकिकी श्रीकृष्णसेवा—साधारण लोगोंकी दृष्टिकी समझके परे है, भगवान् श्रीगौरसुन्दर श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्यान्य विषयोंसे विरक्त व्यक्तिके शुद्धभजनकी चतुरताको देखकर बहुत प्रसन्न होते हैं॥ 220 ॥
महाप्रभुको श्रीगोविन्दके द्वारा श्रीरघुनाथके सिंहद्वारपर प्रसादके लिये प्रतीक्षा करनेका संवाद देना :— प्रभुरे गोविन्द कहे,—“रघुनाथ 'प्रसाद' ना लय। रात्र्ये सिंहद्वारे खाड़ा हञा मागि' खाय ॥” 221 ॥ अनुवाद—श्रीगोविन्दने महाप्रभुसे कहा,—“रघुनाथदास अब यहाँ प्रसाद नहीं लेते। वे रात्रिमें सिंहद्वारपर खड़े होकर भिक्षा माँगकर खाते हैं॥” 221 ॥
श्रीरघुनाथको गृहत्यागी या 'वैरागी'की संज्ञा; उनके वैराग्यसे महाप्रभुको सन्तोष :— शुनि' तुष्ट हञा प्रभु कहिते लागिल। “भाल कैल, वैरागीर धर्म आचरिल ॥ 222 ॥ अनुवाद—श्रीगोविन्दकी बात सुनकर महाप्रभु सन्तुष्ट होकर कहने लगे,—“रघुनाथने अच्छा ही किया कि वह वैरागी व्यक्तिके धर्मका आचरण कर रहा है॥ 222 ॥
महाप्रभुके द्वारा वैरागी या गृहत्यागी व्यक्तिके वैध और अवैध आचरण या धर्मका वर्णन :— वैरागी करिबे सदा नाम-सङ्कीर्त्तन। मागिया खाञा करे जीवन-रक्षण ॥ 223 ॥
192 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/223-229 ] अनुवाद—वैरागी व्यक्तिको सदा नाम-सङ्कीर्तन करना चाहिये। और जीवनकी रक्षाके लिये उसे माँगकर कुछ खा लेना चाहिये॥ 223 ॥ वैरागी हञा येबा करे परापेक्षा। कार्यसिद्धि नहे, कृष्ण करेन उपेक्षा ॥ 224 ॥ अनुवाद—वैरागी होकर भी जो दूसरोंकी अपेक्षा रखता है, तो उसके भजनकी सिद्धि नहीं होती और श्रीकृष्ण भी उसकी उपेक्षा कर देते हैं॥ 224 ॥ वैरागी हञा करे जिह्वार लालस। परमार्थ याय, आर हय रसेर वश ॥ 225 ॥ अनुवाद—वैरागी होकर जो जिह्वाके स्वादकी लालसा करता है उसका परमार्थ छूट जाता है और वह स्वादिष्ट भोजनके रसके वशीभूत हो जाता है॥ 225 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'रस',—तीखा, मीठा, खट्टा, नमकीन, कड़वा और कषाय-रस॥ 225 ॥ वैरागीर कृत्य—सदा नाम-सङ्कीर्त्तन। शाक-पत्र-फल-मूले उदर-भरण ॥ 226 ॥ अनुवाद—वैरागी व्यक्तिका कर्त्तव्य सदा नाम-सङ्कीर्तन करना ही है। और उसे सहज ही प्राप्त शाक, पत्र, फल, मूल आदि ग्रहणकर उदरपूर्ति करनी चाहिये ॥ 226 ॥ अनुभाष्य—हःभःविः—बीसवें विलासके अन्तमें— “कृतान्येतानि तु प्रायो गृहिणां धनिनां सताम्। लिखितानि न तु त्यक्तपरिग्रह महात्मनाम्॥ प्रभाते चार्द्धरात्रे च मध्याह्ने दिवसक्षये। कीर्त्तयन्ति हरिं ये वै ते तरन्ति भवार्णवम्॥ एवमेकान्तिनां प्रायः कीर्त्तनं स्मरणं प्रभोः। कुर्वतां परमप्रीत्या कृत्यमन्यन्न रोचते॥” हरिभक्तिविलासमें लिखित अनुष्ठानावली गृहस्थ धनी वैष्णवप्राय व्यक्तियोंके लिये है, सर्वपरित्यागी विरक्त एकान्तिक-नामाश्रित शुद्धवैष्णवोंके लिये नहीं है। प्रातःकालमें, मध्यरात्रिमें, मध्याह्नमें और सन्ध्यामें अर्थात् अष्टकालमें ही जो हरिका कीर्तन करता है, वही भवसागरसे पार होता है। एकान्तिक शुद्धभक्त परम प्रीतिके सहित प्रभुका कीर्तन और स्मरणादि किया करते हैं, उनका कीर्तनादिके अतिरिक्त अन्य कोई अनुष्ठान नहीं है। श्रीजीव गोस्वामी प्रभुके द्वारा रचित भक्तिसन्दर्भ (283 संख्यामें)— “यद्यपि श्रीभागवतमते पञ्चरात्रादिवदर्चनमार्गस्यावश्यकत्वं नास्ति, तद्विनापि शरणापत्त्यादीनामेकतरेणापि पुरुषार्थसिद्धेरभिहितत्वात्, ...।” [अर्थात् “यद्यपि श्रीमद्भागवतके मतानुसार अर्चनके बिना भी शरणागति आदिके जिस किसी एक अङ्गके भी द्वारा ही पुरुषार्थ-सिद्धि होती है, ऐसा होनेसे श्रीमद्भागवतके मतानुसार पञ्चरात्रादिकी भाँति अर्चन- मार्गकी आवश्यकता नहीं है, तथापि ...।] ॥ 226 ॥ जिह्वार लालसे येइ इति-उति धाय। शिश्नोदर-परायण कृष्ण नाहि पाय ॥ ”227 ॥ अनुवाद—जो जिह्वाके रसास्वादनकी लालसासे इधर-उधर भागता रहता है, ऐसा व्यक्ति जननेन्द्रियों और उदरके परायण होकर भगवान् श्रीकृष्णको प्राप्त नहीं कर सकता॥ ”227 ॥ गृहत्यागी साधकोंके मङ्गलके लिये स्वयंको वैसा मानकर श्रीरघुनाथके द्वारा श्रीस्वरूपसे अपने कर्त्तव्यकी जिज्ञासा :— आर दिन रघुनाथ स्वरूप-चरणे। आपनार कृत्य लागि' कैला निवेदने ॥ 228 ॥ “कि लागि' छाड़ाइला घर, ना जानि उद्देश। कि मोर कर्त्तव्य, प्रभु करुन उपदेश ॥ ”229 ॥ अनुवाद—अगले दिन श्रीरघुनाथदासने श्रीस्वरूप दामोदरके श्रीचरणोंमें अपना कर्त्तव्य जाननेके लिये निवेदन करते हुए कहा,—“मैंने किसलिये घर छोड़ा है, मैं इसका उद्देश्य नहीं जानता हूँ। मेरा क्या कर्त्तव्य
[ 6/228–238 छठा अध्याय 193 है? कृपया इस विषयमें मुझे उपदेश प्रदान करें?" 228-229 ॥ स्वयं मौन रहकर श्रीरघुनाथके द्वारा श्रीस्वरूप और श्रीगोविन्दके द्वारा महाप्रभुके साथ वार्तालाप :- प्रभुर आगे कथामात्र ना कहे रघुनाथ। स्वरूप-गोविन्दद्वारा कहाय निज-बात्॥ 230 ॥ अनुवाद-श्रीरघुनाथ दास महाप्रभुके आगे कोई भी बात नहीं करते थे। वे श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीगोविन्दके द्वारा ही महाप्रभुसे अपने हृदयकी बात कहलवाते थे॥ 230 ॥ एकदिन श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुसे श्रीरघुनाथके कर्त्तव्यकी जिज्ञासा :- प्रभुर आगे स्वरूप निवेदिला आर दिने। “रघुनाथ निवेदय प्रभुर चरणे ॥ 231 ॥ कि मोर कर्त्तव्य, मुञि ना जानि उद्देश। आपनि श्रीमुखे मोरे करुन उपदेश ॥" 232 ॥ अनुवाद-अगले दिन श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुसे निवेदन करते हुए कहा, - “रघुनाथ आपके चरणकमलोंमें निवेदन कर रहा है 'मेरा क्या कर्त्तव्य है, मेरे जीवनका क्या उद्देश्य है, मैं इस विषयमें कुछ नहीं जानता। इसलिये आप (महाप्रभु) स्वयं मुझे अपने श्रीमुखसे इस विषयमें उपदेश प्रदान करें।'” 231-232 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरघुनाथको श्रीस्वरूपको अपने शिक्षागुरुके रूपमें वरण करनेका आदेश :- हासि' महाप्रभु रघुनाथेरे कहिल। “तोमार उपदेष्टा करि' स्वरूपेरे दिल ॥ 233 ॥ माध्व-गौड़ीयोंके नित्यप्रभु या गुरु श्रीदामोदरस्वरूप ही समस्त साध्य-साधन-तत्त्वके आचार्य :- 'साध्य'-'साधन'-तत्त्व शिख इँहार स्थाने। आमि यत नाहि जानि, इँहो तत जाने ॥ 234 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने मुस्कुराते हुए श्रीरघुनाथ दाससे कहा, - “मैंने स्वरूप दामोदरको तुम्हारा उपदेष्टा नियुक्त किया है। तुम इन्हींसे ही साध्य तथा साधन तत्त्वको सीखो। मैं स्वयं उतना नहीं जानता हूँ, जितना ये जानते हैं॥ 233-234 ॥ तथापि आमार आज्ञाय यदि श्रद्धा हय। आमार एइ वाक्ये तुमि करिह निश्चय ॥ 235 ॥ महाप्रभुके द्वारा रागानुगा-भक्तके आचारका वर्णन :- ग्राम्यकथा ना शुनिबे, ग्राम्यवार्त्ता ना कहिबे। भाल ना खाइबे, आर भाल ना परिबे ॥ 236 ॥ अमानी मानद हञा कृष्णनाम सदा लबे। व्रजे राधाकृष्ण-सेवा मानसे करिबे ॥ 237 ॥ अनुवाद-तथापि यदि तुम्हारी मेरी आज्ञाके प्रति श्रद्धा है तो तुम मेरे इन वचनोंको अवश्य ही पालन करना। तुम कभी भी सांसारिक बातें मत सुनना और न ही सांसारिक बातें कहना। अच्छा (स्वादिष्ट वस्तुएँ) मत खाना तथा न ही अच्छा (सुन्दर वस्त्र) पहनना। तुम दूसरेसे सम्मानकी आशा मत रखना और सबको यथायोग्य सम्मान देते हुए सदा कृष्णनामका उच्चारण करना एवं मनके द्वारा व्रजमें राधाकृष्णकी सेवा करना॥ 235-237 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-स्त्री और पुरुष विवाहित होकर सन्तानादि उत्पन्न करके जिस संसारकी नींव डालते हैं, उस संसारके सम्बन्धमें जितनी बातें हैं, वे सब कुछ 'ग्राम्य' कथा-वार्त्ता है; वह कभी भी वैरागी अथवा वैष्णवोंके लिये सुनने अथवा बोलने योग्य नहीं है। अच्छा खाना, अच्छा पहनना, - यह भी वैरागीके लिये उचित नहीं है; अन्योंके प्रति सम्मान और स्वयं अमानी होकर सदैव कृष्णनाम करना एवं मनसे व्रजमें श्रीराधाकृष्णकी सेवा करना, - यही वैरागीका कर्त्तव्य है॥ 237 ॥ एइ त' संक्षेपे आमि कैलुँ उपदेश। स्वरूपेर ठाञि इहार पाबे सविशेष ॥ 238 ॥ अनुवाद-मैंने संक्षेपमें तुम्हें यह उपदेश प्रदान
194 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/238-246 ] किया है। स्वरूप दामोदर तुम्हें इसे विस्तारसे समझा देंगे॥ 238॥ पद्यावलीमें उद्धृत श्रीकृष्णचैतन्यचन्द्रोक्त शिक्षाष्टकका तीसरा श्लोक- तृणादपि सुनीचेन तरोरिव सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्त्तनीयः सदा हरिः ॥ "239॥ अनुवाद-जो अपनेको तृणसे भी छोटा मानते हैं, जो वृक्षके समान सहनशील हैं, अपने लिये मानशून्य हैं और दूसरोंको सम्मान प्रदान करते हैं, वे ही सदा हरिकीर्त्तन करनेके अधिकारी हैं॥ "239॥ अनुभाष्य-आदिलीला 17/31 संख्या देखें॥ 239॥ श्रीरघुनाथके द्वारा महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना, महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :- एत शुनि' रघुनाथ वन्दिला चरण। महाप्रभु कैला ताँरे कृपा-आलिङ्गन ॥ 240 ॥ अनुवाद-यह उपदेश सुनकर श्रीरघुनाथ दासने महाप्रभुके चरणकमलोंकी वन्दना की और महाप्रभुने उन्हें कृपापूर्वक आलिङ्गन प्रदान किया॥ 240॥ श्रीरघुनाथके द्वारा श्रीदामोदरस्वरूपके आनुगत्यमें श्रीगौरकृष्णकी अन्तरङ्ग-सेवा :- पुनः समर्पिला ताँरे स्वरूपेर स्थाने। 'अन्तरङ्ग सेवा' करे स्वरूपेर सने॥ 241 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने पुनः श्रीरघुनाथ दासको श्रीस्वरूप दामोदरके हाथोंमें समर्पित किया। इस प्रकार श्रीरघुनाथ दासने श्रीस्वरूप दामोदरके आनुगत्यमें अन्तरङ्ग सेवा की॥ 241 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'अन्तरङ्ग सेवा करे',-मन-ही- मनमें अपनी स्वरूप-देहमें जो व्रजसेवा है, वही 'अन्तरङ्ग' सेवा है। श्रीस्वरूप गोस्वामी-ललिता देवी हैं; उनके गणोंके मध्य प्रवेश करके श्रीदासगोस्वामी अपनी अन्तरङ्ग व्रज-सेवा करते थे॥ 241 ॥ प्रतिवर्षकी भाँति रथयात्रासे पहले गौड़ीय भक्तोंका पुरीमें आगमन :- हेनकाले आइला सब गौड़ेर भक्तगण। पूर्ववत् प्रभु सबाय करिला मिलन ॥ 242 ॥ अनुवाद-उसी समय गौड़देशके समस्त भक्त वहाँ आये और पहलेकी ही भाँति महाप्रभुने सभीसे भेंट की॥ 242॥ भक्तोंके साथ गुण्डिचा-मार्जन और बगीचेमें महोत्सव :- सबा लञा कैला प्रभु गुण्डिचा-मार्जन। सबा लञा कैला प्रभु वन्य-भोजन ॥ 243 ॥ अनुवाद-सभी भक्तोंको साथ लेकर महाप्रभुने श्रीगुण्डिचा मन्दिरका मार्जन किया और उसके पश्चात् बगीचेमें सबके साथ बैठकर भोजन किया॥ 243॥ अपने भक्तों सहित महाप्रभुका रथके आगे नृत्य; श्रीरघुनाथको विस्मय :- रथयात्राय सबा लञा करिला नर्त्तन। देखि' रघुनाथेर चमत्कार हैल मन ॥ 244 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने समस्त भक्तोंके साथ रथयात्राके समय नृत्य किया। महाप्रभुके नृत्यको देखकर श्रीरघुनाथ दास आश्चर्यचकित हो गये॥ 244॥ श्रीरघुनाथके द्वारा भक्तोंके चरणोंकी वन्दना, श्रीअद्वैतकी कृपाकी प्राप्ति :- रघुनाथ-दास यबे सबारे मिलिला। अद्वैत-आचार्य ताँरे बहु कृपा कैला ॥ 245 ॥ अनुवाद-श्रीरघुनाथ दास जब गौड़देशसे आये सब भक्तोंसे मिले तो श्रीअद्वैताचार्यने उनपर बहुत कृपा की॥ 245॥ श्रीशिवानन्दके द्वारा श्रीरघुनाथसे श्रीगोवर्धनदासके द्वारा उन्हें ढूँढ़नेकी चेष्टाका वर्णन :- शिवानन्द-सेन ताँरे कहेन विवरण। “तोमा लैते तोमार पिता पाठाइल दश जन ॥ 246 ॥
[ 6/246-256 छठा अध्याय 195 तोमारे पाठाइते पत्री पाठाइल मोरे। साथ ही रहते हैं और उनकी तो बहुत ख्याति है, उन्हें झाँकरा हइते तोमा ना पाञा गेल घरे॥"247॥ कौन नहीं जानता?251॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने श्रीरघुनाथ दाससे स्वरूपेर स्थाने तारे करियाछेन समर्पण। कहा,—"तुम्हारे पिताने तुम्हें घर लौटाकर ले जानेके प्रभुर भक्तगणेर तेंहो हय प्राणसम॥252॥ लिये दस लोगोंको भेजा था। उनके द्वारा तुम्हारे पिताने तुम्हें घर भेजनेके लिये मेरे पास एक पत्र भी लिखा अनुवाद—महाप्रभुने उनको श्रीस्वरूप दामोदरके था। वे लोग तुम्हारे नहीं मिलनेके कारण झाँकरासे हाथोंमें समर्पित किया है। वे महाप्रभुके भक्तोंके घरको लौट गये॥"246-247॥ प्राण-स्वरूप हैं॥252॥ चातुर्मास्यके अन्तमें भक्तोंके द्वारा पुरीसे गौड़में लौटना :— रात्रि-दिन करे तेंहो नाम-सङ्कीर्त्तन। चारि मास रहि' भक्तगण गौड़े गेला। क्षणमात्र नाहि छाड़े प्रभुर चरण॥253॥ शुनि' रघुनाथेर पिता मनुष्य पाठाइला॥248॥ अनुवाद—वे रात-दिन नाम-सङ्कीर्तन करते हैं। वे श्रीशिवानन्दसे श्रीगोवर्धनदासके द्वारा लोग भेजकर एक क्षणके लिये भी महाप्रभुके आनुगत्यको नहीं श्रीरघुनाथके विषयमें जिज्ञासा :— छोड़ते॥253॥ से मनुष्य शिवानन्द-सेनेरे पुछिल। “महाप्रभुर स्थाने एक 'वैष्णव' देखिल॥249॥ परम वैराग्य ताँर, नाहि भक्ष्य-परिधान। गोवर्धनरे पुत्र तेंहो, नाम—'रघुनाथ'। यैछे तैछे आहार करि' राखये पराण॥254॥ नीलाचले परिचय आछे तोमार साथ??"250॥ अनुवाद—वे तो परम वैरागी हैं। वे खाने-पहननेकी अनुवाद—चार मास तक श्रीजगन्नाथ पुरीमें रहनेके भी चिन्ता नहीं करते। वे जिस किसी प्रकारसे कुछ पश्चात् भक्त गौड़देशमें लौट गये। उनके लौट आनेकी खाकर अपने प्राणोंकी रक्षा करते हैं॥254॥ बातको सुनकर श्रीरघुनाथ दासके पिताने एक व्यक्तिको श्रीशिवानन्द सेनके पास भेजा। उस व्यक्तिने आकर दशदण्ड रात्रि गेले 'पुष्पाञ्जलि' देखिया। श्रीशिवानन्द सेनसे पूछा,—“क्या आपने महाप्रभुके सिंहद्वारे खाड़ा हय आहार लागिया॥255॥ वासस्थानपर एक वैरागीको देखा? वे श्रीगोवर्धन मजुमदारके पुत्र श्रीरघुनाथ दास हैं। क्या नीलाचलमें आपकी उनके अनुवाद—रात्रिके दस दण्ड (चार घण्टे) बीत साथ भेंट हुई?”248-250॥ जानेपर वे भगवान् श्रीजगन्नाथकी पुष्पाञ्जलिके दर्शन करके भोजनकी भिक्षाके लिये सिंहद्वारपर खड़े हो जाते श्रीशिवानन्दके द्वारा श्रीरघुनाथके तात्कालिक वैराग्य हैं॥255॥ और वैष्णवी-प्रतिष्ठाकी प्रशंसा :— शिवानन्द कहे,—“तेंहो हय प्रभुर स्थाने। केह यदि देय, तबे करये भक्षण। परम विख्यात तेंहो, केबा नाहि जाने??251॥ कभु उपवास, कभु करये चर्वण॥”256॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने कहा,—“वे महाप्रभुके अनुवाद—यदि कोई उन्हें कुछ दे देता है, तब वे उसे खा लेते हैं। अन्यथा कभी-कभी उपवास करते हैं और कभी कुछ चने आदि चबा लेते हैं॥”256॥
196 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/257-263 ] [बायाँ स्तम्भ] श्रीगोवर्धनदासके पास जाकर उस व्यक्तिके द्वारा श्रीरघुनाथके वैराग्यसे युक्त भजनके संवादका ज्ञापन :- एत शुनि' सेइ मनुष्य गोवर्धन-स्थाने। कहिल गिया सब रघुनाथ-विवरणे॥ 257॥ अनुवाद—यह सुनकर वह व्यक्ति श्रीगोवर्धन मजुमदारके पास लौट गया और उनको श्रीरघुनाथ दासके विषयमें सब कुछ बतलाया॥ 257॥ श्रीरघुनाथका कृष्णभजनके उद्देश्यसे भोगोंके त्यागके विषयमें श्रवण करके कृष्ण-भोग्य भक्तको अपना भोग्य-पुत्र मानकर पत्नी सहित गोवर्धनदासका दुःख :- शुनि' ताँर माता पिता दुःखित हइल। पुत्र-ठाञि द्रव्य-मनुष्य पाठाइल॥ 258॥ श्रीरघुनाथको देनेके लिये श्रीशिवानन्दके निकट मुद्रा, सेवक और रसोइयेको भेजना :- चारिशत मुद्रा, दुइ भृत्य, एक ब्राह्मण। शिवानन्देर ठाञि पाठाइल ततक्षण॥ 259॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ दासके ऐसे वैराग्यके विषयमें सुनकर उनके माता-पिता बहुत दुःखी हुए। इसलिये उन्होंने अपने पुत्रके पास खाने-पहननेकी वस्तुएँ और सेवक भेजनेकी व्यवस्था की। उन्होंने उसी समय चार सौ मुद्राओंके साथ दो सेवक और एक ब्राह्मणको श्रीशिवानन्द सेनके पास भेजा॥ 258-259॥ श्रीशिवानन्दका साथमें ले जानेका आश्वासन :- शिवानन्द कहे,—“तुमि याइते नारिबा। आमि याइ यबे, आमार सङ्गे याइबा॥ 260॥ एबे घर याह, यबे आमि सब चलिमु। तबे तोमा-सबाकारे सङ्गे लञा यामु॥”261॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने उन लोगोंसे कहा,—“आप सब अपने आपसे जगन्नाथपुरी नहीं जा पाओगे। जब मैं जाऊँगा, तब मेरे साथ ही जाना। अभी आप लोग अपने घर लौट जाओ। जब हम सब लोग चलेंगे, तब आप सबको मैं अपने साथ ले जाऊँगा॥”260-261॥ [दायाँ स्तम्भ] श्रीकविकर्णपूरके द्वारा स्वरचित नाटकमें श्रीरघुनाथके माहात्म्यका वर्णन :- एइ त' प्रस्तावे श्रीकविकर्णपूर। रघुनाथ-महिमा ग्रन्थे लिखिला प्रचुर॥ 262॥ 262। अनुवाद—इसी प्रसङ्गमें श्रीकविकर्णपूरने स्वरचित चैतन्यचन्द्रोदय नाटकमें श्रीरघुनाथ दासकी प्रचुर महिमाका वर्णन किया है॥ 262॥ अनुभाष्य—'ग्रन्थे',—श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटकमें॥ 262॥ श्रीयदुनन्दनाचार्य और श्रीरघुनाथके गुण :- श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटक (10/3-4)में साथी यात्रियोंके प्रति श्रीशिवानन्दकी उक्ति— आचार्यो यदुनन्दनः सुमधुरः श्रीवासुदेवप्रिय- स्तच्छिष्यो रघुनाथ इत्यधिगुणः प्राणाधिको मादृशाम्। श्रीचैतन्यकृपातिरेकसततस्निग्धः स्वरूपप्रियो वैराग्यैकनिधिर्न कस्य विदितो नीलाचले तिष्ठताम्॥ 263॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 263॥ अमृतप्रवाह भाष्य—(काञ्चनपल्ली-निवासी) श्रीवासुदेव-दत्तके प्रियपात्र [शिष्य नहीं] अति सुमधुर-मूर्ति श्रीयदुनन्दनाचार्य हैं, उनके शिष्य [कृपापात्र, दीक्षा शिष्य नहीं] ही श्रीरघुनाथ दास हैं। उनके गुणोंके कारण वे-हम सबको ही प्राणोंसे अधिक प्रिय हैं एवं वे श्रीचैतन्यकी अतिशय कृपाके द्वारा सदा स्निग्ध हैं, वे श्रीस्वरूप गोस्वामीके प्रिय और वैराग्य-राज्यकी एकमात्र निधि हैं। नीलाचलमें जो वास करते हैं, उनमेंसे उन्हें कौन नहीं जानता?263॥ अनुभाष्य— श्रीवासुदेवप्रियः (वासुदेव-दत्तठाकुरस्य प्रियः कृपापात्रं; न तु शिष्यः) सुमधुरः यदुनन्दनः आचार्यः; तच्छिष्यः (तस्य यदुनन्दनस्य शिष्यः इति कृपापात्रं, न तु तेनैव दीक्षितः इत्यर्थः) अधिगुणः (गुणैरधिकः सर्वाधिकगुणान्वितः) मादृशां (गौरप्राणानां) प्राणाधिकः (प्राणतोऽप्यधिकः प्रियः) श्रीचैतन्यकृपातिरेक-सततस्निग्धः (गौरकृपातिशयेन नित्यप्रेमवान्) स्वरूपप्रियः (दामोदर-स्वरूपानुगः) वैराग्यैकनिधिः (वैराग्यस्य एकनिधिः मुख्याश्रयः सिन्धुर्वा)
[ 6/263-270 छठा अध्याय 197 रघुनाथः (श्रीदासगोस्वामी) नीलाचले (पुरुषोत्तमक्षेत्रे) तिष्ठतां (निवसतां मध्ये) कस्य न विदितः ? [सर्वेषामेव परिचितोऽस्तीति भावः] । श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 263 ॥ श्रीरघुनाथका अतुलनीय सौभाग्य :- यः सर्वलोकैकमनोभिरुच्या सौभाग्यभूः काचिदकृष्टपच्या। यस्यां समारोपणतुल्यकालं तत्प्रेमशाखी फलवानतुल्यः ॥ 264 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 264 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो समस्त लोगोंकी मनोभिरुचिके (चित्तरञ्जनके) द्वारा कोई एक (अनिर्वचनीय) अकृष्टपच्या (स्वतःप्रकटित) सौभाग्यकी भूमि (आधार-स्वरूपा) बने थे, जिनमें बीज बोनेके समय ही (श्रीचैतन्यका) अतुल्य (अनुपम) प्रेम-शाखी (वृक्ष) फलवान् हुआ था ॥ 264 ॥ अनुभाष्य- यः (दासगोस्वामी) सर्वलोकैकमनोभिरुच्या (सर्वेषां भक्तानां लोकानाम् एका प्रधाना या मनसः अभिरुचिः प्रीतिः तया) काचित् (अनिर्वचनीया) अकृष्टपच्या (कर्षणव्यतिरेकेण पक्वा, अर्थात् साधनेन सिद्धिलाभात् पूर्वमेव साधनव्यतिरेकेण वा सिद्धा) सौभाग्यभूः (सौभाग्यभूमिः), यस्यां (भूमौ) समारोपण- तुल्यकालं (बीजवपनसमकालमेव) अतुल्यः (अनुपमः) तत्प्रेमशाखी (तत् तस्य श्रीचैतन्यस्य प्रेमा, स एव शाखी वृक्षः) फलवान् [अभवत् इति शेषः] । श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 264 ॥ शिवानन्द यैछे सेइ मनुष्ये कहिला। कर्णपूर सेइरूपे श्लोक वर्णिला ॥ 265 ॥ अनुवाद-श्रीशिवानन्द सेनने श्रीरघुनाथ दासके विषयमें जैसा उनके पिताके द्वारा भेजे गये व्यक्तिसे कहा, श्रीकविकर्णपूरने उपरोक्त श्लोकोंमें उसी बातका ही वर्णन किया है ॥ 265 ॥ गोवर्धनके द्वारा भेजे गये धन, सेवक और ब्राह्मणका वर्षाकालमें श्रीशिवानन्दके साथ पुरीमें जाना :- वर्षान्तरे शिवानन्द चले नीलाचले। रघुनाथेर सेवक, विप्र ताँर सङ्गे चले ॥ 266 ॥ अनुवाद-अगले वर्ष जब श्रीशिवानन्द सेन नीलाचलके लिये चले, तब श्रीरघुनाथ दासके पिताके द्वारा भेजे गये सेवक और एक ब्राह्मण भी श्रीशिवानन्द सेनके साथ चल दिये ॥ 266 ॥ सेइ विप्र-भृत्य, चारि-शत मुद्रा लञा। नीलाचले रघुनाथे मिलिला आसिया ॥ 267 ॥ अनुवाद-वह ब्राह्मण और सेवक चार सौ मुद्राएँ लेकर श्रीजगन्नाथ पुरीमें आये थे और वहाँ वे श्रीरघुनाथ दाससे मिले ॥ 267 ॥ श्रीरघुनाथके द्वारा उन सबको अस्वीकार करना :- रघुनाथ-दास अङ्गीकार ना करिल। द्रव्य लञा दुइजन ताँहाइ रहिल ॥ 268 ॥ अनुवाद-श्रीरघुनाथ दासने उस धन और उन सेवकों एवं ब्राह्मणको स्वीकार नहीं किया। तब एक सेवक और ब्राह्मण, ये दो व्यक्ति उन मुद्राओंको लेकर वहींपर रह गये ॥ 268 ॥ प्रतिमास श्रीरघुनाथका महाप्रभुको दो बार निमन्त्रण :- तबे रघुनाथ करि' अनेक यतन। मासे दुइदिन कैला प्रभुर निमन्त्रण ॥ 269 ॥ अनुवाद-तब श्रीरघुनाथने यत्नपूर्वक बड़े सम्मानके साथ महाप्रभुको एक मासमें दो दिन भोजनके लिये निमन्त्रण करना प्रारम्भ किया ॥ 269 ॥ उसके लिये ही श्रीरघुनाथके द्वारा गोवर्धनके द्वारा भेजे धनको लेना :- दुइ निमन्त्रणे लागे कौड़ि अष्टपण। ब्राह्मण-भृत्य-ठाञि करेन एतेक ग्रहण ॥ 270 ॥ अनुवाद-दो बार निमन्त्रणमें आठ आने खर्च होते
198 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/270–276 ] थे, इसलिये श्रीरघुनाथ दास उन ब्राह्मण और सेवकसे केवल इतना ही ग्रहण करते थे ॥ 270 ॥ अनुभाष्य—'अष्टपण'—640 कड़ा कड़ि [सबसे छोटे मूल्य-वर्गकी मुद्रा जिनका कौड़ियोंके (छोटेसे शङ्खके) द्वारा विनिमय किया जाता था] अर्थात् आठ आना [एक रुपया=16 आना] ॥ 270 ॥ दो वर्षोंके बाद महाप्रभुको निमन्त्रण करनेके कार्यका परित्याग :— एइमत निमन्त्रण वर्ष दुइ कैला। पाछे रघुनाथ निमन्त्रण छाड़ि' दिला ॥ 271 ॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीरघुनाथ दासने महाप्रभुको दो वर्ष तक निमन्त्रण किया, किन्तु दो वर्षके अन्तमें उन्होंने निमन्त्रण देना बन्द कर दिया ॥ 271 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीस्वरूपसे श्रीरघुनाथके द्वारा निमन्त्रण ना देनेके कारणकी जिज्ञासा :— मास-दुइ यबे रघुनाथ ना करे निमन्त्रण। स्वरूपे पुछिला तबे शचीर नन्दन ॥ 272 ॥ “रघु केने आमाय निमन्त्रण छाड़ि' दिल?” स्वरूप कहे,—“मने किछु विचार करिल ॥ 273 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुको श्रीरघुनाथके चित्तके भाव बतलाकर प्राकृत-विषयीको शिक्षादान; भोक्ता-अभिमानी विषयीके भोग्य जड़ीय-द्रव्य कभी भी चिन्मय श्रीविष्णुके भोग्य नहीं :— विषयीर द्रव्य लञा करि निमन्त्रण। प्रसन्न ना हय इहाय, जानि प्रभुर मन ॥ 274 ॥ अहङ्कार-विमूढ़ व्यक्तिकी भोग्य-जड़-वस्तुके द्वारा चिन्मयी श्रीविष्णु-सेवाके परिमाणकी चेष्टा— अनर्थको वर्धित करनेवाली और चित्-जड़का समन्वय करनेवाली जड़ीय-प्रतिष्ठा मात्र :— मोर द्रव्य लइते चित्त ना हय निर्मल। एइ निमन्त्रणे देखि,—'प्रतिष्ठा' मात्र फल ॥ 275 ॥ अनुवाद—जब दो मास तक श्रीरघुनाथ दासने महाप्रभुको निमन्त्रण नहीं दिया, तब शचीनन्दन श्रीगौरहरिने श्रीस्वरूप दामोदरसे पूछा, — “रघुने मुझे निमन्त्रण देना क्यों बन्द कर दिया है?” श्रीस्वरूप दामोदरने कहा, — “उसने अपने मनमें कुछ विचार किया— 'मैं विषयी व्यक्तिके धनसे महाप्रभुको निमन्त्रण करता हूँ, मैं जानता हूँ उनका हृदय इससे प्रसन्न नहीं होता है। उस धनको ग्रहण करके उसे महाप्रभुकी सेवामें लगानेसे जब मेरा चित्त ही निर्मल नहीं हो रहा, तब तो ऐसे निमन्त्रणका फल केवल जड़ीय प्रतिष्ठा ही है ॥ 272-275 ॥ अनुभाष्य—'अहं मम' [मैं और मेराके] अभिमानसे युक्त जड़ीय भोक्ताके द्वारा प्राकृत विषयीके भोग्य अर्थके द्वारा जड़ातीत सच्चिदानन्द वस्तु हरि-गुरु-वैष्णवोंकी सेवा करनेकी चेष्टा करनेपर केवल प्रतिष्ठारूपी फलको ही प्राप्त करता है, उससे वास्तविक अप्राकृत हरि-गुरु-वैष्णवोंकी सेवा नहीं होती। नित्य मङ्गलकी इच्छा रखनेवाले जीवके लिये एकान्त शरणागत होकर अर्थात् सम्पूर्ण आत्मनिवेदन करके अपने द्वारा अर्जित समस्त धनके द्वारा एवं काय-मन-वाक्य-प्राणसे अप्राकृत हरि-गुरु-वैष्णवकी सेवा करना कर्त्तव्य है ॥ 275 ॥ अबोध बालकके जैसे व्यक्तिके नित्य मङ्गलके लिये ईश्वरकी अमन्दोदय-दया :— उपरोधे प्रभु मोर मानेन निमन्त्रण। ना मानिले दुःखी हइबेक मूर्ख जन ॥ 276 ॥ अनुवाद—मेरे अनुरोधके कारण महाप्रभु निमन्त्रणको स्वीकार करते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि निमन्त्रण स्वीकार नहीं करनेसे मेरे जैसा मूर्ख व्यक्ति दुःखी होगा ॥ 276 ॥ अनुभाष्य—जन्म, ऐश्वर्य, श्रुत (विद्या), श्री (सौन्दर्य) के अभिमानमें मत्त विषयी लोग श्रीमूर्तिंकी तथाकथित सेवा करवाके [उनको अर्पित भोगको] उनका प्रसाद मानकर वैष्णवोंको प्रदान करते हैं। मूर्खतावशतः वे यह नहीं जानते कि उनकी अभक्तिमय मनोवृत्तिके द्वारा प्रदत्त कोई भी वस्तु अधोक्षज अजित (भगवान्) ग्रहण नहीं करते। इसलिये कृष्णभजन परायण निरपेक्ष अर्थात्
[ 6/276–281 छठा अध्याय 199 जड़ीय भोगोंसे विरक्त वैष्णव अनेक बार पूर्वकथित जड़भोक्ता विषयी लोगोंकी जड़ीय अभिमानकी गन्धसे मिश्रित सहायताको ग्रहण करके उनकी दासता स्वीकार नहीं करते। इससे सांसारिक धनी विषयी लोग अपनी देहादिमें अहं-बुद्धिसे उत्पन्न मूर्खताके कारण वैष्णवोंके प्रति विरोधका पोषण करते हैं और वैष्णवोंके द्वारा उनकी सहायताको स्वीकार नहीं करनेके व्यवहारसे दुःखी होते हैं॥ 276 ॥ महाप्रभुका सन्तुष्ट होना :- एत विचारिया निमन्त्रण छाड़ि' दिल।” शुनि' महाप्रभु हासि' बलिते लागिल ॥ 277 ॥ महाप्रभुके द्वारा साधक और आचार्योंके सङ्ग या व्यवहारकी विधि अथवा कर्त्तव्यका उपदेश :- “विषयीर अन्न खाइले मलिन हय मन। मलिन मन हैले, नहे कृष्णेर स्मरण ॥ 278 ॥ अनुवाद—ऐसा विचार करके रघुनाथने आपको निमन्त्रण देना छोड़ दिया।” यह सुनकर महाप्रभु मुस्कुराते हुए कहने लगे,—“विषयी व्यक्तिके द्वारा दिये गये अन्नको खानेसे मन मलिन हो जाता है। मनके मलिन होनेपर कृष्णका स्मरण नहीं हो पाता॥ 277-278 ॥ अनुभाष्य—अवैष्णव अथवा प्राकृत सहजियागण— विषयी लोग हैं। उनके अभक्तिपूर्वक प्रदान किये गये भोजनको ग्रहण करने अथवा खानेके सङ्गके फलसे साधक-वैष्णवोंका सङ्गदोष होता है, एवं उसके फलस्वरूप, साधकगण उन विषयीके जैसे स्वभावको प्राप्त करते हैं। 'अवैष्णव' और 'वैष्णव'-नामधारी प्राकृत सहजियाओंके साथ लेशमात्र प्रच्छन्न-प्रीतिके साथ भी यदि कोई छह प्रकारके सङ्ग (दान, प्रतिग्रह अर्थात् उनके द्वारा दी गयी प्रसादरूपी वस्तु-ग्रहण, उनका प्रसाद मानकर भोजन और भोजनके लिये उनको प्रवर्त्तन, गूढ़ बातका वर्णन और जिज्ञासा) करता है, तब अप्राकृत शुद्धकृष्णभक्तिके स्थानपर जड़ेन्द्रिय-तर्पणमूलक प्राकृत भोग आकर साधकको कृष्णभक्तिसे च्युत कर देते हैं। इसलिये अपनी इन्द्रियोंके तर्पणपरक विषयोंसे मलिन अशुद्ध चित्तवाले व्यक्तियोंके लिये अप्राकृत कृष्णस्मरणादिका सेवन कभी भी सम्भव नहीं है॥ 278 ॥ गृहव्रत या ग्राम्य-व्यवहारको जाननेवाले ही 'विषयी', उनका सङ्ग ही 'राजस' :- विषयीर अन्न हय 'राजस' निमन्त्रण। दाता, भोक्ता—दुँहार मलिन हय मन ॥ 279 ॥ अनुवाद—विषयी व्यक्तिके अन्नको ग्रहण करनेका निमन्त्रण 'राजसिक' निमन्त्रण है, इससे देनेवाले और ग्रहण करनेवाले—दोनोंका ही मन मलिन हो जाता है॥ 279 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'राजस' निमन्त्रण',—निमन्त्रण तीन प्रकारके होते हैं—सात्त्विक, राजसिक और तामसिक; विशुद्ध वैष्णवोंका निमन्त्रण—सात्त्विक, विषयी पुण्यवान् व्यक्तिका अन्न—राजस और पापी व्यक्तिका अन्न—तामस होता है॥ 279 ॥ ईश्वरकी अमन्दोदया दयाके फलसे सद्बुद्धिके उदित होनेपर साधकके द्वारा कर्ममिश्रा-भक्तिका त्याग और शुद्धसेवाकी प्रवृत्ति :- इँहार सङ्कोचे आमि एतदिन निल। भाल हैल—जानिया से आपनि छाड़िल ॥” 280 ॥ अनुवाद—मैंने रघुके अनुरोधपर इतने दिनों तक उसके निमन्त्रणको स्वीकार किया। अच्छा ही हुआ कि मेरे मनकी बातको जानकर उसने स्वयं ही निमन्त्रण करना छोड़ दिया॥” 280 ॥ श्रीरघुनाथके द्वारा सिंहद्वारको त्यागकर छत्रमें भोजन ग्रहण करना :- कत दिने रघुनाथ सिंहद्वार छाड़िला। छत्रे याइ' मागिया खाइते आरम्भ करिला ॥ 281 ॥ अनुवाद—कुछ दिनोंके बाद श्रीरघुनाथदासने सिंहद्वारपर खड़े होकर भिक्षा माँगना छोड़ दिया और छत्रमें जाकर माँगकर खाना आरम्भ किया॥ 281 ॥
200 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/282-287 ] महाप्रभुके द्वारा श्रीस्वरूपसे श्रीरघुनाथके सिंहद्वारको त्याग करनेके कारणकी जिज्ञासा :- गोविन्द-पाश शुनि' प्रभु पुछेन स्वरूपेरे। “रघु भिक्षा लागि' ठाड़ केने नहे सिंहद्वारे?” 282 ॥ अनुवाद-श्रीगोविन्दसे यह सुनकर महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदरसे पूछा,-“आजकल रघु भिक्षाके लिये सिंहद्वारपर खड़ा क्यों नहीं होता?” 282 ॥ अनुभाष्य- 'ठाड़',- (हिन्दी-शब्द) खड़ा ॥ 282 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा श्रीरघुनाथकी गृहत्यागी विरक्त व्यक्तियोंके आचार-आदर्शरूपी माधुकरी-भिक्षाको स्वीकार करनेका वर्णन :- स्वरूप कहे, - “सिंहद्वारे दुःख अनुभविया। छत्रे मागि' खाय मध्याह्नकाले गिया॥" 283 ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरने कहा, - “रघुनाथको सिंहद्वारपर खड़े होनेसे दुःखका अनुभव होता था। इसलिये वह आजकल मध्याह्नकालमें जाकर छत्रमें माँगकर खा लेता है॥" 283 ॥ दूसरोंकी इच्छानुसार उनसे प्राप्त होनेवाले भोजनकी प्रतीक्षा-निरपेक्ष वैराग्य-धर्मके प्रतिकूल :- प्रभु कहे, - “भाल कैल, छाड़िल सिंहद्वार। सिंहद्वारे भिक्षा-वृत्ति-वेश्यार आचार ॥ 284 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “उसने सिंहद्वारपर खड़े होना छोड़कर बहुत अच्छा किया। सिंहद्वारपर भिक्षा करनेकी वृत्ति वेश्याके आचरणके समान है॥ 284 ॥ लोगोंको देखनेमात्रसे भिक्षाकी प्राप्ति अथवा अप्राप्तिकी आशा या उसकी सम्भावनाकी कल्पना :- (श्रीकृष्णचैतन्यदेव-वाक्य) अयमागच्छति अयं दास्यति अनेन दत्तमयमपरः। समेत्ययं दास्यति अनेनापि न दत्तमन्यः समेष्यति स दास्यति ॥ 285 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 285 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'ये आ रहे हैं, ये ही देंगे; इन्होंने [पहले भी] दिया है; एक और व्यक्ति आ रहे हैं, ये देंगे, ये जो व्यक्ति चले गये, इन्होंने नहीं दिया; अन्य एक व्यक्ति आकर देंगे; - अयाचक वैरागी-वेषधारी (निरपेक्षता परित्याग करके वेश्याकी भाँति) ऐसी आशा किया करते हैं॥ 285 ॥ अनुभाष्य- [वर्त्मचारिणं कश्चित् अवलोक्य अर्थार्थी, अन्नार्थी वा स्वगतं वदति-] अयं (पथिकः) आगच्छति, अयं (वदान्यः) मां दास्यति (अर्थ-भोजनादिकं प्रदास्यति) अनेन (दात्रा पूर्वस्मिन् प्रदोषे अर्थ-भोजनादिकं) दत्तम्, अयम् अपरः (जनः समागतः); अयं समेत्य (समागत्य) दास्यति; अनेन अपि न [किञ्चित्] दत्तम्; अन्यः (दाता) समेष्यति (समागमिष्यति) स (एव) मह्यं दास्यति। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 285 ॥ माधुकरी भिक्षा ही गृहत्यागी विरक्त व्यक्तिके हरिभजनके अनुकूल :- छत्रे गिया यथा-लाभ उदर-भरण। अन्य कथा नाहि, सुखे कृष्णसङ्कीर्त्तन ॥" 286 ॥ अनुवाद-छत्रमें जाकर निःशुल्क भोजन वितरणमें-से जो कुछ भी मिल जाय, उसीसे अपना उदर भर लेनेसे अन्य किसीकी अपेक्षा नहीं करनी पड़ती और सुखसे श्रीकृष्ण-सङ्कीर्त्तन किया जा सकता है॥" 286 ॥ समस्त ब्रह्माण्डोंके गुरु श्रीरघुनाथको परमश्रेष्ठ मानकर अपने गिरिधारी-विग्रह और गान्धर्वा-रूपिणी माला प्रदान :- एत बलि' ताँरे पुनः प्रसाद करिला। 'गोवर्धनेर शिला', 'गुञ्जा-माला' ताँरे दिला ॥ 287 ॥ अनुवाद-यह कहकर महाप्रभुने श्रीरघुनाथ दासपर पुनः अन्य एक कृपा करते हुए उन्हें 'गोवर्धनकी शिला' और 'गुञ्जा-माला' प्रदान की॥ 287 ॥ अनुभाष्य- 'गोवर्धन-शिला',- श्रीगिरिधारी विग्रह; 'गुञ्जामाला',-गुञ्जाकी माला॥ 287 ॥
[ 6/287-294 छठा अध्याय 201 अमृतानुकणिका-गुञ्जाके अन्य नाम चिर्मिठी, घुंघची और रत्ती हैं। इनके भारका परिमाण समयसे परिवर्तित नहीं होता, इसलिये पूर्वकालमें भारतवर्षमें सुनार लोग इसके द्वारा सोने, हीरे आदिका भार मापते थे। इसकी इकाईको रत्ती कहते हैं; 8 रत्ती = 1 माशा; 12 माशा = 1 तोला; 1 तोला = 11.6 ग्राम ॥ 287 ॥ विग्रह और मालाकी प्राप्तिके आदि-वृत्तान्तका वर्णन :- शङ्करानन्द-सरस्वती वृन्दावन हैते आइला। तेँह सेइ शिला-गुञ्जामाला लञा गेला ॥ 288 ॥ पार्श्वे गाँथा गुञ्जामाला, गोवर्धन-शिला। दुइ वस्तु महाप्रभुर आगे आनि' दिला ॥ 289 ॥ अनुवाद-श्रीशङ्करानन्द सरस्वती जब श्रीवृन्दावनसे श्रीजगन्नाथपुरी लौटे, तब वे वहाँसे श्रीगोवर्धनकी शिला और गुञ्जामालाको अपने साथ लाये थे। श्रीजगन्नाथपुरीमें आकर उन्होंने सूत्रमें गुँथी हुई गुञ्जाकी माला और गोवर्धन-शिला-इन दोनोंको लाकर महाप्रभुके आगे रख दिया ॥ 288-289 ॥ श्रीकृष्णस्मरणके समय साक्षात् गान्धर्वा-गिरिधारी मानकर महाप्रभुके द्वारा उस माला और विग्रहका समादर :- दुइ अपूर्व वस्तु पाञा प्रभु तुष्ट हैला। स्मरणेर काले गले परेन गुञ्जामाला ॥ 290 ॥ गोवर्धन-शिला प्रभु हृदये-नेत्रे धरे। कभु नासाय घ्राण लय, कभु शिरे करे ॥ 291 ॥ नेत्रजले सेइ शिला भिजे निरन्तर। शिलारे कहेन प्रभु,-'कृष्ण-कलेवर' ॥ 292 ॥ अनुवाद-महाप्रभु इन दो अपूर्व वस्तुओंको प्राप्त करके बहुत प्रसन्न हुए। हरिनाम करते समय वे उस गुञ्जामालाको अपने गलेमें पहन लेते। गोवर्धनकी शिलाको महाप्रभु कभी अपने हृदयपर और कभी अपने नेत्रोंपर रखते। वे कभी अपनी नाकके द्वारा उसको सूँघते और कभी उसे अपने सिरपर रखते। वह शिला महाप्रभुके नेत्रोंसे प्रवाहित होनेवाले अश्रुओंके द्वारा निरन्तर भीगी रहती। महाप्रभु उस शिलाको साक्षात् श्रीकृष्णका कलेवर (शरीर) कहते थे ॥ 290-292 ॥ तीन वर्ष तक सेवा करनेके बाद श्रीरघुनाथको प्रदान :- एइमत तिनवत्सर शिला-माला धरिला। तुष्ट हञा शिला-माला रघुनाथे दिला ॥ 293 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने इस प्रकार तीन वर्ष तक शिला और मालाको अपने पास रखा। तब श्रीरघुनाथ दासके आचरणसे सन्तुष्ट होकर शिला और मालाको उन्हें प्रदान कर दिया ॥ 293 ॥ अर्चा विष्णुविग्रहमें शिला-बुद्धि और वैष्णवोंमें जाति-बुद्धि करनेवाले पाखण्डी लोगोंको शिक्षा प्रदान करनेके लिये महाप्रभुका उपदेश :- प्रभु कहे, -'एइ शिला कृष्णेर विग्रह। इँहार सेवा कर तुमि करिया आग्रह ॥ 294 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीरघुनाथ दाससे कहा, - "यह शिला श्रीकृष्णका विग्रह है, बड़ी गम्भीरतापूर्वक तुम इसकी सेवा करो ॥ 294 ॥ अनुभाष्य-'गोवर्धन-शिला',- साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन; महाप्रभुने उस शिलाको 'साक्षात् अप्राकृत कृष्णकलेवर' जानकर तीन वर्ष अङ्गीकार करके रघुनाथके हृदयमें [वैसे भावकी] स्फूर्ति करवाके निजप्रियतम-प्रिय मानकर उन्हें सेवाधिकार प्रदान किया। अदैव-वर्णाश्रममें पालित-पोषित और बड़े हुए दास-स्थानीय कुछ प्राकृत-बुद्धिवाले इन्द्रिय-ज्ञानके मदमें मत्त अवैष्णव बाहरसे वैष्णवोंकी भाँति चिह्न धारण करके भी वैष्णवोंसे विद्वेष करते हैं। वे अपने-अपने इन्द्रिय-तृप्तिरूपी घृणित प्रच्छन्न स्वार्थको चरितार्थ करनेकी वासनासे अपने इन्द्रिय-ज्ञान अथवा मनोधर्मको सहारा बनाकर विष्णुके अप्राकृत अर्चा-विग्रहमें धातु अथवा शिला-बुद्धि, कृष्णके प्रकाश विग्रह सेवक-भगवान् चिद्विलास श्रीगुरुदेवमें मर्त्यबुद्धि, वर्णाश्रमियोंके गुरु
202 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/293-300 ] परमहंस-वैष्णवोंमें जाति बुद्धि करते हुए यह कल्पना व्यक्त करते हैं कि “श्रीरघुनाथ दास गोस्वामी तो शौक्र-ब्राह्मण नहीं थे अथवा उन्होंने सावित्र्य-संस्कार ग्रहण नहीं करनेके कारण दैक्ष-ब्राह्मणताको भी प्राप्त नहीं किया।” इस श्रेणीके मात्सर्यसे पीड़ित लोग कल्पनाके द्वारा अनुमान करते हैं कि—शौक्र ब्राह्मण कुलमें आविर्भूत व्यक्तिके अतिरिक्त अन्य किसी शुद्धभक्तका ही विष्णुके विग्रहके स्पर्श अथवा पूजनमें अधिकार नहीं होनेके कारण महाप्रभुने प्राकृत अद्वैव समाजकी ओर दृष्टि करके ही कुशलतापूर्वक ऐसी लीला दिखायी है। इसी अपराधके कारण वैसी कल्पना करनेवाले अनन्त अपराधरूपी विषय विष्ठाके गड्ढेमें पतित होते हैं और वैष्णव-अपराध-वशतः उनका लौकिक और पारलौकिक सर्वनाश होता है। कनिष्ठ अथवा मध्यम वैष्णवोंके लिये ऐसे अपराधी व्यक्तियोंके दलका सङ्ग किसी भी प्रकारसे करनेके योग्य नहीं है, क्योंकि स्त्री-सङ्गीके सङ्गका पोषण करनेवाली शौक्र-ब्राह्मणताके अतिरिक्त अप्राकृत ब्राह्मणताका शुद्ध चिन्मय आदर्श अन्यत्र नहीं हो सकता, —उनका ऐसा नरकको प्राप्त करवानेवाला विश्वास उन्हें नित्यकालके लिये महा-रौरवमें आबद्ध रखकर उनका विनाश करेगा ही करेगा, इसमें कोई सन्देह नहीं है॥ 293-294॥ महाभागवतकी शुद्ध-सात्त्विक-पूजा या भाव-सेवा प्राकृत कनिष्ठाधिकारगत अर्चन नहीं :- एइ शिलार कर तुमि सात्त्विक-पूजन। अचिरात् पाबे तुमि कृष्णप्रेमधन ॥ 295 ॥ अनुवाद—तुम इस शिलाका सात्त्विक भावसे पूजन करो। इसके द्वारा तुम्हें अतिशीघ्र ही कृष्णप्रेमधनकी प्राप्ति होगी॥ 295॥ शुद्धसात्त्विक-सेवाकी प्रणाली :- एक कुँजा जल आर तुलसी-मञ्जरी। सात्त्विक-सेवा एइ—शुद्धभावे करि'॥ 296 ॥ दुइदिके दुइपत्र-मध्ये कोमल मञ्जरी। एइमत अष्टमञ्जरी दिबे श्रद्धा करि' ॥ 297 ॥ अनुवाद—तुम एक कुल्हड़ जल और तुलसी मञ्जरीके द्वारा शुद्धभावसे सात्त्विक सेवा करना। तुम कोमल मञ्जरी जिसके दोनों ओर एक-एक पत्ता हो, ऐसी आठ मञ्जरियोंको श्रद्धापूर्वक शिलाको अर्पित करना॥ "296-297॥ समस्त ब्रह्मज्ञ-कुलके गुरु महाप्रभुश्रेष्ठ महाभागवत श्रीरघुनाथके द्वारा शुद्ध-सात्त्विक-भाव-सेवा :- श्रीहस्ते शिला दिया एइ आज्ञा दिला। आनन्दे रघुनाथ सेवा करिते लागिला ॥ 298 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने इस प्रकार पूजा-विधिकी आज्ञा देकर अपने श्रीहस्तकमलसे शिला श्रीरघुनाथ दासको प्रदान की। महाप्रभुकी आज्ञानुसार श्रीरघुनाथ दास आनन्दपूर्वक शिलाकी सेवा करने लगे॥ 298 ॥ एक-वितस्ति दुइवस्त्र, पिँड़ा एकखानि। स्वरूप दिलेन कुँजा आनिवारे पानि ॥ 299 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरने श्रीरघुनाथको आधे हाथ परिमाणके दो वस्त्र, एक पीढ़ा और जल लानेके लिये एक कुल्हड़ प्रदान किया॥ 299॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'वितस्ति', — आधे हाथ परिमाणका॥ 299॥ अर्च्य-विष्णुमें शिला और वैष्णवमें जातिबुद्धि करनेवाले पाखण्डियोंकी कल्पनाको धिक्कार प्रदानकर श्रीरघुनाथके द्वारा गिरिधारीको साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन मानना :- एइमत रघुनाथ करेन पूजन। पूजाकाले देखे शिलाय 'व्रजेन्द्रनन्दन' ॥ 300 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ दास इस प्रकार श्रीगोवर्धन शिलाकी पूजा करने लगे और वे पूजा करते समय उस शिलामें श्रीव्रजेन्द्रनन्दनके दर्शन करते ॥ 300 ॥
[ 6/301-309 छठा अध्याय 203 श्रीरघुनाथका अपूर्व महाप्रभु-प्रेम :- 'प्रभुर स्वहस्त-दत्त गोवर्धन-शिला।' एइ चिन्ति' रघुनाथ प्रेमे भासि' गेला ॥ 301 ॥ अनुवाद—'महाप्रभुके स्वहस्तकमलोंके द्वारा प्रदत्त श्रीगोवर्धन-शिला'—ऐसी भावनासे ही श्रीरघुनाथ दास प्रेममें आप्लावित हो जाते ॥ 301 ॥ जल-तुलसीर सेवाय यत सुखोदय। षोड़शोपचार-पूजाय तत सुख नय ॥ 302 ॥ अनुवाद—उनको जल और तुलसीके द्वारा की जानेवाली सेवासे जितना सुख प्राप्त होता, किसीको सोलह प्रकारके उपचारोंके द्वारा पूजा करनेसे भी वैसे सुखकी प्राप्ति नहीं हो सकती ॥ 302 ॥ एकदिन श्रीस्वरूपके अनुरोधसे विग्रहको श्रीगोविन्दके द्वारा दिये गये सन्देश (मिष्ठान्न)का समर्पण :- एइमत कतदिन करेन पूजन। तब स्वरूपगोसाञि ताँरे कहिला वचन ॥ 303 ॥ “अष्टकौड़िर खाजा-सन्देश कर समर्पण। श्रद्धा करि' दिले, सेइ अमृतेर सम ॥” 304 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ दासको जब इस प्रकार पूजा करते हुए कुछ दिन बीत गये, तब श्रीस्वरूप दामोदरने उनसे कहा,—“तुम गोवर्धन-शिलाको आठ कौड़ीके स्वादिष्ट मिष्ठान खाजा और सन्देश समर्पित करो। श्रद्धापूर्वक अर्पण करनेसे वे गोवर्धन-शिलाको अमृत जैसे लगेंगे ॥” 303-304 ॥ तब अष्ट-कौड़िर खाजा करे समर्पण। स्वरूप-आज्ञाय गोविन्द करे समाधान ॥ 305 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ दास उस दिनसे श्रीगोवर्धन शिलाको आठ कौड़ीका खाजा-सन्देश समर्पित करने लगे। श्रीस्वरूप दामोदरकी आज्ञासे श्रीगोविन्द आठ कौड़की व्यवस्था करते थे ॥ 305 ॥ श्रीरघुनाथके द्वारा महाप्रभुकी कृपाके तात्पर्यका अनुसरण :- रघुनाथ सेइ शिला-माला यबे पाइला। गोसाञिर अभिप्राय एइ भावना करिला ॥ 306 ॥ माला और शिला-प्रदान करके महाप्रभुके द्वारा श्रीरघुनाथको गान्धर्वा-गिरिधारीकी रागमयी अन्तरङ्गा-सेवा-प्रदान :- “शिला दिया गोसाञि समर्पिला 'गोवर्धने'। गुञ्जामाळा दिया दिला 'राधिका-चरणे' ॥” 307 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ दासको जब महाप्रभुके हस्तकमलोंसे श्रीगोवर्धन शिला तथा गुञ्जामाला प्राप्त हुए, तबसे श्रीरघुनाथने महाप्रभुके अभिप्रायकी इस प्रकार भावना की,—“श्रीगोवर्धन शिला देकर महाप्रभुने मुझे श्रीगोवर्धनकी तलहटीमें वास और गुञ्जामाला प्रदान करके श्रीराधिकाके चरणोंमें समर्पित किया है ॥” 306-307 ॥ प्रेममें आत्म-विभोर श्रीरघुनाथके द्वारा श्रीगौर-सेवा :- आनन्दे रघुनाथेर बाह्य विस्मरण। कायमने सेविलेन गौराङ्ग-चरण ॥ 308 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ दास आनन्दमें ऐसे डूब गये कि उन्हें बाह्य जगत्की सम्पूर्ण विस्मृति हो गयी। वे अपनी देह और मनसे श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके चरणोंकी सेवामें निमग्न हो गये ॥ 308 ॥ गोस्वामी श्रीरघुनाथके कृष्णेन्द्रिय-प्रीतिका लिये किये गये अद्वितीय अद्भुत स्थिर वैराग्ययुक्त भजनके आदर्शका वर्णन :- अनन्त गुण रघुनाथेर के करिबे लेखा? रघुनाथेर नियम,—येन पाषाणेर रेखा ॥ 309 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ दासके अनन्त गुण हैं, कौन उनका लेखा-जोखा कर सकता है? श्रीरघुनाथ दासका नियम-पालन पत्थरकी रेखाकी भाँति था ॥ 309 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'रघुनाथेर नियम,—येन पाषाणेर
204 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/309–313 ] रेखा,’—श्रील रघुनाथके वैराग्यकी विधि पत्थरके ऊपर रेखाकी भाँति अत्यन्त दृढ़ थी॥ 309 ॥ प्रतिक्षण कृष्णभजन :— साड़े सात प्रहर याय कीर्त्तन–स्मरणे। सबे चारि–दण्ड आहार–निद्रा कोन दिने॥ 310 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ दासके साढ़े सात प्रहर (साढ़े बाइस घण्टे) कीर्तन और स्मरणमें ही व्यतीत होते। किसी दिनमें कुल चार दण्डमें (डेढ़ घण्टेमें) ही उनके आहार और निद्रा होते॥ 310 ॥ अनुभाष्य—पाठान्तरमें,— “सार्द्धसप्तप्रहर याय स्मरण–कीर्त्तने। आहार–निद्रा–चारि दण्ड, सेह नहे कोन दिने॥” [अर्थात् “साढ़े सात प्रहर उनके स्मरण-कीर्तनमें जाते। आहार-निद्राके लिये उन्हें केवल चार दण्डका (डेढ़ घण्टेका) समय मिलता और कभी वह भी नहीं मिलता॥”]॥ 310 ॥ छहों वेगोंको विजय करनेवाले गोस्वामी श्रीरघुनाथ :— वैराग्येर कथा ताँर अद्भुत–कथन। आजन्म ना दिला जिह्वाय रसेर स्पर्शन॥ 311 ॥ छिण्डा–कानि काँथा बिना ना परे वसन। सावधाने प्रभुर कैला आज्ञार पालन॥ 312 ॥ जिससे शरीरका निर्वाह हो, उतना ही स्वीकार करना :— प्राण–रक्षा लागि’ येबा करेन भक्षण। ताहा खाञा आपनाके करे निर्वेदन॥ 313 ॥ अनुवाद—उनके वैराग्यकी बात तो अद्भुत कथा है। उन्होंने सम्पूर्ण जीवन अपनी जिह्वाको जड़ रसका स्पर्श तक नहीं होने दिया। उन्होंने चिथड़े वस्त्रोंके अतिरिक्त अन्य कोई भी वस्त्र नहीं पहना। उन्होंने बड़ी कठोरतासे महाप्रभुकी आज्ञाका पालन किया। वे अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये थोड़ासा कुछ खाते थे। उसे खाकर उसके लिये भी स्वयंको धिक्कार देते॥ 311–313 ॥ अनुभाष्य—'निर्वेदन',—भर्त्सना, धिक्कार॥ 313 ॥ अमृतानुकणिका—श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी प्रभुमें वैराग्य, ऐश्वर्य, ज्ञान, वीर्य, यश, श्री—सभी स्वाभाविक रूपसे रहकर धन्य हुए थे, किन्तु उन्होंने इनके लिये कोई भी प्रयत्न नहीं किया। समस्त ऐश्वर्य, विभुता, सिद्धि उनके हाथोंमें थी, किन्तु वे कर्मी–ज्ञानी– योगी–तपस्वीके समान ऐश्वर्यके भिखारी या ऐश्वर्य–प्रदर्शनके लोभी नहीं थे। कर्मी–ज्ञानी–योगी–तपस्वी कभी भी जिस ऐश्वर्यके बिन्दु–मात्रको भी नहीं प्राप्त कर सकते, उस प्रकारके अनन्त निखिल ऐश्वर्यके श्रील रघुनाथदास गोस्वामी प्रभुके चरण–नखमें विराजित रहकर धन्य होनेपर भी श्रील रघुनाथदास उन सब ऐश्वर्यके व्यापारी नहीं थे। फल्गु मायावादियोंके जैसे उनकी वैराग्य–चेष्टा भी नहीं थी। वे कर्मियों–ज्ञानियों–योगियोंके जैसे वैराग्यके भिखारी भी नहीं थे। वैराग्य–सिद्धिकी सीमा उनको प्राप्त करके धन्य हुई थी। श्रील रघुनाथदासने इस प्रकारके वैराग्यादिके लिये यत्न क्यों नहीं किया? जीव अपने प्रेयः के लिये व्यस्त रहता है। प्रेयः बुरी वस्तु नहीं है यदि वह श्रीकृष्णको केन्द्रीभूत करके हो। श्रीकृष्णको जो अपने अपेक्षा सौ गुणा अधिक प्रेम करते हैं और श्रीकृष्णके प्रियजनको हजार गुणा प्रेम करते हैं, उनका विचार इस प्रकार होता है (विलापकुसुमाञ्जली 102)— “आशाभरैरमृतसिन्धुमयैः कथञ्चित् कालो मयातिगमितः किल साम्प्रतं हि। त्वञ्चत् कृपां मयि विधास्यसि नैव किं मे प्राणैर्व्रजेन च वरोरु बकारिणापि॥ “हे वरोरु राधे! मैं अमृतसिन्धुकी प्राप्तिकी प्रचुर आशामें अभी अति कष्टसे काल व्यतीत कर रहा हूँ, अभी यदि आप मेरे प्रति कृपा विधान नहीं करेंगी, तो मेरे प्राण, व्रजवास, यहाँ तक कि मुझे कृष्णसे क्या प्रयोजन है?” इस प्रकार वैराग्य–सिद्धिकी पराकाष्ठाकी बात क्या कभी किसीने सुनी है? श्रील रघुनाथदास गोस्वामी
[ 6/313-316 छठा अध्याय 205 राधा-दास्यके अतिरिक्त श्रीकृष्णको भी नहीं चाहते हैं। इतने बड़े वैराग्यकी बात इस जगत्में सम्भव नहीं होती है—श्रीस्वरूपकी कृपासे अभिषिक्त एकान्त व्यक्तिके अतिरिक्त इस वैराग्यके आदर्शको अन्य कोई भी समझ नहीं सकता। जो राधादास्यके अतिरिक्त कृष्ण तकको भी नहीं चाहते हैं, वे क्या इस लोकके सामान्य वैराग्य, यश, श्री, ऐश्वर्य, वीर्य, ज्ञानके लिये यत्न करेंगे? कृष्णप्रेष्ठकी कहाँ तक सेवा करनेपर—कृष्णप्रेष्ठमें कहाँ तक प्रीतिकी पराकाष्ठा रहती है—उसका इस प्रकार विचार होता है। जैसे एक दिन श्रीचैतन्य मठमें गान हुआ था,— “तोमार गरवे गरविनी हाम, रूपसी तोमार रूपे” आदि प्राकृत सहजियागण भी ये गान गाते हैं, किन्तु इसके तात्पर्यको नहीं समझ पाते। वे लोग राइ-कानुका गान करते हैं, किन्तु उनके विचारमें त्रुटि कहाँ पर है? राइ-कानुके गानका प्रचुर साहित्य है, वह अति कर्णरसायन है, उसमें उनके मनका तर्पण हो जाता है। इस प्रकार करनेसे उनको लगता है कि वे भगवद्भक्तिकी कथाके बहुत निकट आ गये हैं, किन्तु उनका यही दोष रहता है। वे अपने स्वरूप, श्रीकृष्णके स्वरूप, श्रीकृष्णप्रेष्ठके स्वरूपकी कुछ भी उपलब्धि नहीं कर सकते—वे केवल आत्मेन्द्रिय-तर्पणमें ही व्यस्त हैं। इन सब गानोंसे उनकी सेवा-बुद्धि, सेव्यकी इन्द्रिय-तर्पण करनेकी चेष्टा बढ़नेके स्थानपर गानेका साहित्य, काव्य, सुर-तान-मान-लय ही इतना बढ़ जाता है कि वह उनकी सुबुद्धिको डुबो देता है। मायाकी इसी प्रकार छलना है। “गौड़ीय 39वीं संख्या” ॥313॥ दिव्यसम्बन्धज्ञानके उदित होनेसे देहात्मबुद्धिका ह्रास :— श्रीमद्भागवत (7/15/40) में— आत्मानञ्चेद्विजानीयात् परं ज्ञानधुताशयः। किमिच्छन् कस्य वा हेतोर्देहं पुष्णाति लम्पटः ॥314॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥314॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ज्ञानके द्वारा भली-भाँति निर्मल हुए चित्तवाले व्यक्ति आत्मतत्त्वको जान लेनेपर जब सबकुछ ही प्राप्त करते हैं, तब वैसा नहीं करके पापी व्यक्ति किस अभिप्रायसे, किस कारणसे केवल शरीरकी पुष्टिके लिये प्रयत्न किया करते हैं? 314॥ अनुभाष्य—'किस विधिका अनुसरण करनेसे गृहस्थ सहजमें मोक्ष प्राप्त करते हैं?'—धर्मराज युधिष्ठिरके इस प्रश्नके उत्तरमें देवर्षि नारद मोक्षलक्षण सर्ववर्णाश्रम-साधनसार-वर्णन प्रसङ्गमें चारों आश्रमोंकी कथा बतलाकर अन्तमें कह रहे हैं,— चेद् (यदि) आत्मनं परं ('ब्रह्म कृष्णं') विजानीयात्, तदा ज्ञानधूताशयः (ज्ञानेन सम्बन्धज्ञानेन धूतः निरस्तः आशयः विषयकामः यस्य सः) लम्पटः (जिह्वोपस्थ-परिचालनपरः सन्) किं इच्छन् (किमर्थं) कस्य वा हेतोः देहं पुष्णाति (अनुसंचरेत्? ज्ञानिनः लौल्यमेव न सम्भवतीत्यर्थः। तथा च श्रुतिः—“आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पुरुषः। किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसञ्चरेत्?” इति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। ज्ञानीमें विषयोंके प्रति ऐसा लोभ सम्भव नहीं है। श्रुतिमें भी कहा गया है—“परब्रह्म श्रीकृष्णको जानकर भी यह पुरुष किस इच्छासे और किस कामनासे शरीरके पालनके प्रयत्न करता है?”॥314॥ दुकानदारोंके द्वारा नहीं बिकनेवाले सड़े हुए कीचड़से सने प्रसाद-अन्नको धोकर श्रीकृष्णके उच्छिष्टको चिद्वस्तु मानकर उसका सम्मान :— प्रसादान्न पसारिर यत ना बिकाय। दुइ-तिन दिन हैले भात सड़ि' याय॥315॥ सिंहद्वारे गाभी-आगे सेइ भात डारे। सड़ा-गन्धे तैलङ्गी-गाइ खाइते ना पारे॥316॥ अनुवाद—श्रीजगन्नाथका महाप्रसादी चावल दुकानदार बेचते हैं और जितना नहीं बिकता, वह बचा हुआ भात दो-तीन दिनके बाद सड़ जाता है। दुकानदार उस भातको सिंहद्वारके निकट तैलङ्गी गायोंके आगे
206 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/315-324 ] खानेके लिये डाल देते हैं, किन्तु सड़े भातकी दुर्गन्धके कारण गायें उसे खा नहीं पाती ॥ 315-316 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- ‘सड़ि’’, —सड़ जाना। तैलङ्गी-गाई,—तैलङ्ग देशकी गायें ॥ 315-316 ॥ अनुभाष्य- ‘डारे’,-फेंक देते ॥ 316 ॥ सेइ भात रघुनाथ रात्रे घरे आनि’ । भात धुञा फेले घरे दिया बहु पानि ॥ 317 ॥ भितरेते दड़-भात माजि’ येइ पाय । लवण दिया रघुनाथ सेइ अन्न खाय ॥ 318 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ दास रात्रिमें उसी भातको अपने घर ले आते और बहुत अधिक पानीसे उसे अच्छेसे धो लेते। धोनेके बाद उसके भीतर जो सख्त भात मिलता, वे उसमें नमक मिलाकर खा लेते ॥ 317-318 ॥ अनुभाष्य—‘भितरेते दड़-भात माजि’’,-अध-पके चावलके (भातके) भीतरके कठोर मध्य-भागको धोकर अर्थात् साफ करके ॥ 318 ॥ एकदिन श्रीस्वरूपका आनन्दपूर्वक चिद्वस्तु समझकर उस श्रीकृष्णके उच्छिष्ट अंशको ग्रहण करना :- एकदिन स्वरूप ताहा करिते देखिला । हासिया ताहार किछु मागिया खाइला ॥ 319 ॥ अनुवाद—एकदिन श्रीस्वरूप दामोदरने श्रीरघुनाथ दासको उन चावलोंको धोकर खाते हुए देखा। मुस्कुराते हुए उन्होंने श्रीरघुनाथसे कुछ चावल माँगकर खा लिये ॥ 319 ॥ श्रीगौरकृष्णके परमप्रिय श्रीरघुनाथके द्वारा ग्रहण किया गया प्रसाद ही चिन्मय कृष्ण-भुक्तामृत :- स्वरूप कहे,—“ऐछे अमृत खाओ निति निति । आमा-सबाय नाहि देह’, कि तोमार प्रकृति ? ?”320 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,-“तुम प्रतिदिन ऐसा अमृत खाते हो, किन्तु हम सबको नहीं देते हो, यह तुम्हारा कैसा स्वभाव है ?”320 ॥ श्रीगोविन्दसे सुनकर स्वयं महाप्रभुका भी उस श्रीकृष्णके उच्छिष्ट अंशको ग्रहण करना :- गोविन्देर मुखे प्रभु से वार्त्ता शुनिला । आर दिन आसि’ प्रभु कहिते लागिला ॥ 321 ॥ “खासा वस्तु खाओ सबे, मोरे ना देह’ केने?” एत बलि’ एक ग्रास करिला भक्षणे ॥ 322 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीगोविन्दके मुखसे उस वार्तालापको सुना। अगले दिन महाप्रभु आकर उन दोनोंसे कहने लगे,-“तुम सब उत्तम वस्तुएँ खाते हो, मुझे क्यों नहीं देते हो?” यह कहकर महाप्रभुने भी उन चावलोंका एक ग्रास खा लिया ॥ 321-322 ॥ साधकका स्वयं श्रीकृष्णकी प्रीतिके लिये वैराग्य- आचरणका अभ्यास रहनेपर भी निखिल ऐश्वर्यशाली हरि-गुरु-वैष्णवको एकमात्र प्रभु मानकर सर्वोत्कृष्ट चित्-उपकरणके द्वारा पूजाकी कर्त्तव्यताकी शिक्षादान :- आर ग्रास लैते स्वरूप हातेते धरिला । “तव योग्य नहे” बलि’ बले काड़ि’ निला ॥ 323 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके द्वारा एक और ग्रास लेनेपर श्रीस्वरूप दामोदरने उनका हाथ पकड़ लिया और कहा,-“यह आपके योग्य नहीं है।” तब उन्होंने बलपूर्वक उनके हाथसे चावल छीन लिये ॥ 323 ॥ महाप्रभुके द्वारा अपने प्रेष्ठ श्रीरघुनाथके द्वारा ग्रहण किये प्रसादकी प्रशंसा :- प्रभु बोले,—“निति निति नाना प्रसाद खाइ । ऐछे स्वाद आर कोन प्रसादे ना पाइ ॥”324 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,-“मैं प्रतिदिन अनेक प्रकारका प्रसाद खाता हूँ, किन्तु मुझे ऐसा स्वाद किसी और प्रसादको खानेसे नहीं मिला ॥”324 ॥