भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2217

200 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/282-287 ] महाप्रभुके द्वारा श्रीस्वरूपसे श्रीरघुनाथके सिंहद्वारको त्याग करनेके कारणकी जिज्ञासा :- गोविन्द-पाश शुनि' प्रभु पुछेन स्वरूपेरे। “रघु भिक्षा लागि' ठाड़ केने नहे सिंहद्वारे?” 282 ॥ अनुवाद-श्रीगोविन्दसे यह सुनकर महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदरसे पूछा,-“आजकल रघु भिक्षाके लिये सिंहद्वारपर खड़ा क्यों नहीं होता?” 282 ॥ अनुभाष्य- 'ठाड़',- (हिन्दी-शब्द) खड़ा ॥ 282 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा श्रीरघुनाथकी गृहत्यागी विरक्त व्यक्तियोंके आचार-आदर्शरूपी माधुकरी-भिक्षाको स्वीकार करनेका वर्णन :- स्वरूप कहे, - “सिंहद्वारे दुःख अनुभविया। छत्रे मागि' खाय मध्याह्नकाले गिया॥" 283 ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरने कहा, - “रघुनाथको सिंहद्वारपर खड़े होनेसे दुःखका अनुभव होता था। इसलिये वह आजकल मध्याह्नकालमें जाकर छत्रमें माँगकर खा लेता है॥" 283 ॥ दूसरोंकी इच्छानुसार उनसे प्राप्त होनेवाले भोजनकी प्रतीक्षा-निरपेक्ष वैराग्य-धर्मके प्रतिकूल :- प्रभु कहे, - “भाल कैल, छाड़िल सिंहद्वार। सिंहद्वारे भिक्षा-वृत्ति-वेश्यार आचार ॥ 284 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “उसने सिंहद्वारपर खड़े होना छोड़कर बहुत अच्छा किया। सिंहद्वारपर भिक्षा करनेकी वृत्ति वेश्याके आचरणके समान है॥ 284 ॥ लोगोंको देखनेमात्रसे भिक्षाकी प्राप्ति अथवा अप्राप्तिकी आशा या उसकी सम्भावनाकी कल्पना :- (श्रीकृष्णचैतन्यदेव-वाक्य) अयमागच्छति अयं दास्यति अनेन दत्तमयमपरः। समेत्ययं दास्यति अनेनापि न दत्तमन्यः समेष्यति स दास्यति ॥ 285 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 285 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'ये आ रहे हैं, ये ही देंगे; इन्होंने [पहले भी] दिया है; एक और व्यक्ति आ रहे हैं, ये देंगे, ये जो व्यक्ति चले गये, इन्होंने नहीं दिया; अन्य एक व्यक्ति आकर देंगे; - अयाचक वैरागी-वेषधारी (निरपेक्षता परित्याग करके वेश्याकी भाँति) ऐसी आशा किया करते हैं॥ 285 ॥ अनुभाष्य- [वर्त्मचारिणं कश्चित् अवलोक्य अर्थार्थी, अन्नार्थी वा स्वगतं वदति-] अयं (पथिकः) आगच्छति, अयं (वदान्यः) मां दास्यति (अर्थ-भोजनादिकं प्रदास्यति) अनेन (दात्रा पूर्वस्मिन् प्रदोषे अर्थ-भोजनादिकं) दत्तम्, अयम् अपरः (जनः समागतः); अयं समेत्य (समागत्य) दास्यति; अनेन अपि न [किञ्चित्] दत्तम्; अन्यः (दाता) समेष्यति (समागमिष्यति) स (एव) मह्यं दास्यति। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 285 ॥ माधुकरी भिक्षा ही गृहत्यागी विरक्त व्यक्तिके हरिभजनके अनुकूल :- छत्रे गिया यथा-लाभ उदर-भरण। अन्य कथा नाहि, सुखे कृष्णसङ्कीर्त्तन ॥" 286 ॥ अनुवाद-छत्रमें जाकर निःशुल्क भोजन वितरणमें-से जो कुछ भी मिल जाय, उसीसे अपना उदर भर लेनेसे अन्य किसीकी अपेक्षा नहीं करनी पड़ती और सुखसे श्रीकृष्ण-सङ्कीर्त्तन किया जा सकता है॥" 286 ॥ समस्त ब्रह्माण्डोंके गुरु श्रीरघुनाथको परमश्रेष्ठ मानकर अपने गिरिधारी-विग्रह और गान्धर्वा-रूपिणी माला प्रदान :- एत बलि' ताँरे पुनः प्रसाद करिला। 'गोवर्धनेर शिला', 'गुञ्जा-माला' ताँरे दिला ॥ 287 ॥ अनुवाद-यह कहकर महाप्रभुने श्रीरघुनाथ दासपर पुनः अन्य एक कृपा करते हुए उन्हें 'गोवर्धनकी शिला' और 'गुञ्जा-माला' प्रदान की॥ 287 ॥ अनुभाष्य- 'गोवर्धन-शिला',- श्रीगिरिधारी विग्रह; 'गुञ्जामाला',-गुञ्जाकी माला॥ 287 ॥