श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 6/287-294 छठा अध्याय 201 अमृतानुकणिका-गुञ्जाके अन्य नाम चिर्मिठी, घुंघची और रत्ती हैं। इनके भारका परिमाण समयसे परिवर्तित नहीं होता, इसलिये पूर्वकालमें भारतवर्षमें सुनार लोग इसके द्वारा सोने, हीरे आदिका भार मापते थे। इसकी इकाईको रत्ती कहते हैं; 8 रत्ती = 1 माशा; 12 माशा = 1 तोला; 1 तोला = 11.6 ग्राम ॥ 287 ॥ विग्रह और मालाकी प्राप्तिके आदि-वृत्तान्तका वर्णन :- शङ्करानन्द-सरस्वती वृन्दावन हैते आइला। तेँह सेइ शिला-गुञ्जामाला लञा गेला ॥ 288 ॥ पार्श्वे गाँथा गुञ्जामाला, गोवर्धन-शिला। दुइ वस्तु महाप्रभुर आगे आनि' दिला ॥ 289 ॥ अनुवाद-श्रीशङ्करानन्द सरस्वती जब श्रीवृन्दावनसे श्रीजगन्नाथपुरी लौटे, तब वे वहाँसे श्रीगोवर्धनकी शिला और गुञ्जामालाको अपने साथ लाये थे। श्रीजगन्नाथपुरीमें आकर उन्होंने सूत्रमें गुँथी हुई गुञ्जाकी माला और गोवर्धन-शिला-इन दोनोंको लाकर महाप्रभुके आगे रख दिया ॥ 288-289 ॥ श्रीकृष्णस्मरणके समय साक्षात् गान्धर्वा-गिरिधारी मानकर महाप्रभुके द्वारा उस माला और विग्रहका समादर :- दुइ अपूर्व वस्तु पाञा प्रभु तुष्ट हैला। स्मरणेर काले गले परेन गुञ्जामाला ॥ 290 ॥ गोवर्धन-शिला प्रभु हृदये-नेत्रे धरे। कभु नासाय घ्राण लय, कभु शिरे करे ॥ 291 ॥ नेत्रजले सेइ शिला भिजे निरन्तर। शिलारे कहेन प्रभु,-'कृष्ण-कलेवर' ॥ 292 ॥ अनुवाद-महाप्रभु इन दो अपूर्व वस्तुओंको प्राप्त करके बहुत प्रसन्न हुए। हरिनाम करते समय वे उस गुञ्जामालाको अपने गलेमें पहन लेते। गोवर्धनकी शिलाको महाप्रभु कभी अपने हृदयपर और कभी अपने नेत्रोंपर रखते। वे कभी अपनी नाकके द्वारा उसको सूँघते और कभी उसे अपने सिरपर रखते। वह शिला महाप्रभुके नेत्रोंसे प्रवाहित होनेवाले अश्रुओंके द्वारा निरन्तर भीगी रहती। महाप्रभु उस शिलाको साक्षात् श्रीकृष्णका कलेवर (शरीर) कहते थे ॥ 290-292 ॥ तीन वर्ष तक सेवा करनेके बाद श्रीरघुनाथको प्रदान :- एइमत तिनवत्सर शिला-माला धरिला। तुष्ट हञा शिला-माला रघुनाथे दिला ॥ 293 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने इस प्रकार तीन वर्ष तक शिला और मालाको अपने पास रखा। तब श्रीरघुनाथ दासके आचरणसे सन्तुष्ट होकर शिला और मालाको उन्हें प्रदान कर दिया ॥ 293 ॥ अर्चा विष्णुविग्रहमें शिला-बुद्धि और वैष्णवोंमें जाति-बुद्धि करनेवाले पाखण्डी लोगोंको शिक्षा प्रदान करनेके लिये महाप्रभुका उपदेश :- प्रभु कहे, -'एइ शिला कृष्णेर विग्रह। इँहार सेवा कर तुमि करिया आग्रह ॥ 294 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीरघुनाथ दाससे कहा, - "यह शिला श्रीकृष्णका विग्रह है, बड़ी गम्भीरतापूर्वक तुम इसकी सेवा करो ॥ 294 ॥ अनुभाष्य-'गोवर्धन-शिला',- साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन; महाप्रभुने उस शिलाको 'साक्षात् अप्राकृत कृष्णकलेवर' जानकर तीन वर्ष अङ्गीकार करके रघुनाथके हृदयमें [वैसे भावकी] स्फूर्ति करवाके निजप्रियतम-प्रिय मानकर उन्हें सेवाधिकार प्रदान किया। अदैव-वर्णाश्रममें पालित-पोषित और बड़े हुए दास-स्थानीय कुछ प्राकृत-बुद्धिवाले इन्द्रिय-ज्ञानके मदमें मत्त अवैष्णव बाहरसे वैष्णवोंकी भाँति चिह्न धारण करके भी वैष्णवोंसे विद्वेष करते हैं। वे अपने-अपने इन्द्रिय-तृप्तिरूपी घृणित प्रच्छन्न स्वार्थको चरितार्थ करनेकी वासनासे अपने इन्द्रिय-ज्ञान अथवा मनोधर्मको सहारा बनाकर विष्णुके अप्राकृत अर्चा-विग्रहमें धातु अथवा शिला-बुद्धि, कृष्णके प्रकाश विग्रह सेवक-भगवान् चिद्विलास श्रीगुरुदेवमें मर्त्यबुद्धि, वर्णाश्रमियोंके गुरु