भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2219

202 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/293-300 ] परमहंस-वैष्णवोंमें जाति बुद्धि करते हुए यह कल्पना व्यक्त करते हैं कि “श्रीरघुनाथ दास गोस्वामी तो शौक्र-ब्राह्मण नहीं थे अथवा उन्होंने सावित्र्य-संस्कार ग्रहण नहीं करनेके कारण दैक्ष-ब्राह्मणताको भी प्राप्त नहीं किया।” इस श्रेणीके मात्सर्यसे पीड़ित लोग कल्पनाके द्वारा अनुमान करते हैं कि—शौक्र ब्राह्मण कुलमें आविर्भूत व्यक्तिके अतिरिक्त अन्य किसी शुद्धभक्तका ही विष्णुके विग्रहके स्पर्श अथवा पूजनमें अधिकार नहीं होनेके कारण महाप्रभुने प्राकृत अद्वैव समाजकी ओर दृष्टि करके ही कुशलतापूर्वक ऐसी लीला दिखायी है। इसी अपराधके कारण वैसी कल्पना करनेवाले अनन्त अपराधरूपी विषय विष्ठाके गड्ढेमें पतित होते हैं और वैष्णव-अपराध-वशतः उनका लौकिक और पारलौकिक सर्वनाश होता है। कनिष्ठ अथवा मध्यम वैष्णवोंके लिये ऐसे अपराधी व्यक्तियोंके दलका सङ्ग किसी भी प्रकारसे करनेके योग्य नहीं है, क्योंकि स्त्री-सङ्गीके सङ्गका पोषण करनेवाली शौक्र-ब्राह्मणताके अतिरिक्त अप्राकृत ब्राह्मणताका शुद्ध चिन्मय आदर्श अन्यत्र नहीं हो सकता, —उनका ऐसा नरकको प्राप्त करवानेवाला विश्वास उन्हें नित्यकालके लिये महा-रौरवमें आबद्ध रखकर उनका विनाश करेगा ही करेगा, इसमें कोई सन्देह नहीं है॥ 293-294॥ महाभागवतकी शुद्ध-सात्त्विक-पूजा या भाव-सेवा प्राकृत कनिष्ठाधिकारगत अर्चन नहीं :- एइ शिलार कर तुमि सात्त्विक-पूजन। अचिरात् पाबे तुमि कृष्णप्रेमधन ॥ 295 ॥ अनुवाद—तुम इस शिलाका सात्त्विक भावसे पूजन करो। इसके द्वारा तुम्हें अतिशीघ्र ही कृष्णप्रेमधनकी प्राप्ति होगी॥ 295॥ शुद्धसात्त्विक-सेवाकी प्रणाली :- एक कुँजा जल आर तुलसी-मञ्जरी। सात्त्विक-सेवा एइ—शुद्धभावे करि'॥ 296 ॥ दुइदिके दुइपत्र-मध्ये कोमल मञ्जरी। एइमत अष्टमञ्जरी दिबे श्रद्धा करि' ॥ 297 ॥ अनुवाद—तुम एक कुल्हड़ जल और तुलसी मञ्जरीके द्वारा शुद्धभावसे सात्त्विक सेवा करना। तुम कोमल मञ्जरी जिसके दोनों ओर एक-एक पत्ता हो, ऐसी आठ मञ्जरियोंको श्रद्धापूर्वक शिलाको अर्पित करना॥ "296-297॥ समस्त ब्रह्मज्ञ-कुलके गुरु महाप्रभुश्रेष्ठ महाभागवत श्रीरघुनाथके द्वारा शुद्ध-सात्त्विक-भाव-सेवा :- श्रीहस्ते शिला दिया एइ आज्ञा दिला। आनन्दे रघुनाथ सेवा करिते लागिला ॥ 298 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने इस प्रकार पूजा-विधिकी आज्ञा देकर अपने श्रीहस्तकमलसे शिला श्रीरघुनाथ दासको प्रदान की। महाप्रभुकी आज्ञानुसार श्रीरघुनाथ दास आनन्दपूर्वक शिलाकी सेवा करने लगे॥ 298 ॥ एक-वितस्ति दुइवस्त्र, पिँड़ा एकखानि। स्वरूप दिलेन कुँजा आनिवारे पानि ॥ 299 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरने श्रीरघुनाथको आधे हाथ परिमाणके दो वस्त्र, एक पीढ़ा और जल लानेके लिये एक कुल्हड़ प्रदान किया॥ 299॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'वितस्ति', — आधे हाथ परिमाणका॥ 299॥ अर्च्य-विष्णुमें शिला और वैष्णवमें जातिबुद्धि करनेवाले पाखण्डियोंकी कल्पनाको धिक्कार प्रदानकर श्रीरघुनाथके द्वारा गिरिधारीको साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन मानना :- एइमत रघुनाथ करेन पूजन। पूजाकाले देखे शिलाय 'व्रजेन्द्रनन्दन' ॥ 300 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ दास इस प्रकार श्रीगोवर्धन शिलाकी पूजा करने लगे और वे पूजा करते समय उस शिलामें श्रीव्रजेन्द्रनन्दनके दर्शन करते ॥ 300 ॥