श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2220, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 6/301-309 छठा अध्याय 203 श्रीरघुनाथका अपूर्व महाप्रभु-प्रेम :- 'प्रभुर स्वहस्त-दत्त गोवर्धन-शिला।' एइ चिन्ति' रघुनाथ प्रेमे भासि' गेला ॥ 301 ॥ अनुवाद—'महाप्रभुके स्वहस्तकमलोंके द्वारा प्रदत्त श्रीगोवर्धन-शिला'—ऐसी भावनासे ही श्रीरघुनाथ दास प्रेममें आप्लावित हो जाते ॥ 301 ॥ जल-तुलसीर सेवाय यत सुखोदय। षोड़शोपचार-पूजाय तत सुख नय ॥ 302 ॥ अनुवाद—उनको जल और तुलसीके द्वारा की जानेवाली सेवासे जितना सुख प्राप्त होता, किसीको सोलह प्रकारके उपचारोंके द्वारा पूजा करनेसे भी वैसे सुखकी प्राप्ति नहीं हो सकती ॥ 302 ॥ एकदिन श्रीस्वरूपके अनुरोधसे विग्रहको श्रीगोविन्दके द्वारा दिये गये सन्देश (मिष्ठान्न)का समर्पण :- एइमत कतदिन करेन पूजन। तब स्वरूपगोसाञि ताँरे कहिला वचन ॥ 303 ॥ “अष्टकौड़िर खाजा-सन्देश कर समर्पण। श्रद्धा करि' दिले, सेइ अमृतेर सम ॥” 304 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ दासको जब इस प्रकार पूजा करते हुए कुछ दिन बीत गये, तब श्रीस्वरूप दामोदरने उनसे कहा,—“तुम गोवर्धन-शिलाको आठ कौड़ीके स्वादिष्ट मिष्ठान खाजा और सन्देश समर्पित करो। श्रद्धापूर्वक अर्पण करनेसे वे गोवर्धन-शिलाको अमृत जैसे लगेंगे ॥” 303-304 ॥ तब अष्ट-कौड़िर खाजा करे समर्पण। स्वरूप-आज्ञाय गोविन्द करे समाधान ॥ 305 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ दास उस दिनसे श्रीगोवर्धन शिलाको आठ कौड़ीका खाजा-सन्देश समर्पित करने लगे। श्रीस्वरूप दामोदरकी आज्ञासे श्रीगोविन्द आठ कौड़की व्यवस्था करते थे ॥ 305 ॥ श्रीरघुनाथके द्वारा महाप्रभुकी कृपाके तात्पर्यका अनुसरण :- रघुनाथ सेइ शिला-माला यबे पाइला। गोसाञिर अभिप्राय एइ भावना करिला ॥ 306 ॥ माला और शिला-प्रदान करके महाप्रभुके द्वारा श्रीरघुनाथको गान्धर्वा-गिरिधारीकी रागमयी अन्तरङ्गा-सेवा-प्रदान :- “शिला दिया गोसाञि समर्पिला 'गोवर्धने'। गुञ्जामाळा दिया दिला 'राधिका-चरणे' ॥” 307 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ दासको जब महाप्रभुके हस्तकमलोंसे श्रीगोवर्धन शिला तथा गुञ्जामाला प्राप्त हुए, तबसे श्रीरघुनाथने महाप्रभुके अभिप्रायकी इस प्रकार भावना की,—“श्रीगोवर्धन शिला देकर महाप्रभुने मुझे श्रीगोवर्धनकी तलहटीमें वास और गुञ्जामाला प्रदान करके श्रीराधिकाके चरणोंमें समर्पित किया है ॥” 306-307 ॥ प्रेममें आत्म-विभोर श्रीरघुनाथके द्वारा श्रीगौर-सेवा :- आनन्दे रघुनाथेर बाह्य विस्मरण। कायमने सेविलेन गौराङ्ग-चरण ॥ 308 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ दास आनन्दमें ऐसे डूब गये कि उन्हें बाह्य जगत्की सम्पूर्ण विस्मृति हो गयी। वे अपनी देह और मनसे श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके चरणोंकी सेवामें निमग्न हो गये ॥ 308 ॥ गोस्वामी श्रीरघुनाथके कृष्णेन्द्रिय-प्रीतिका लिये किये गये अद्वितीय अद्भुत स्थिर वैराग्ययुक्त भजनके आदर्शका वर्णन :- अनन्त गुण रघुनाथेर के करिबे लेखा? रघुनाथेर नियम,—येन पाषाणेर रेखा ॥ 309 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ दासके अनन्त गुण हैं, कौन उनका लेखा-जोखा कर सकता है? श्रीरघुनाथ दासका नियम-पालन पत्थरकी रेखाकी भाँति था ॥ 309 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'रघुनाथेर नियम,—येन पाषाणेर