भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2216, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2216

[ 6/276–281 छठा अध्याय 199 जड़ीय भोगोंसे विरक्त वैष्णव अनेक बार पूर्वकथित जड़भोक्ता विषयी लोगोंकी जड़ीय अभिमानकी गन्धसे मिश्रित सहायताको ग्रहण करके उनकी दासता स्वीकार नहीं करते। इससे सांसारिक धनी विषयी लोग अपनी देहादिमें अहं-बुद्धिसे उत्पन्न मूर्खताके कारण वैष्णवोंके प्रति विरोधका पोषण करते हैं और वैष्णवोंके द्वारा उनकी सहायताको स्वीकार नहीं करनेके व्यवहारसे दुःखी होते हैं॥ 276 ॥ महाप्रभुका सन्तुष्ट होना :- एत विचारिया निमन्त्रण छाड़ि' दिल।” शुनि' महाप्रभु हासि' बलिते लागिल ॥ 277 ॥ महाप्रभुके द्वारा साधक और आचार्योंके सङ्ग या व्यवहारकी विधि अथवा कर्त्तव्यका उपदेश :- “विषयीर अन्न खाइले मलिन हय मन। मलिन मन हैले, नहे कृष्णेर स्मरण ॥ 278 ॥ अनुवाद—ऐसा विचार करके रघुनाथने आपको निमन्त्रण देना छोड़ दिया।” यह सुनकर महाप्रभु मुस्कुराते हुए कहने लगे,—“विषयी व्यक्तिके द्वारा दिये गये अन्नको खानेसे मन मलिन हो जाता है। मनके मलिन होनेपर कृष्णका स्मरण नहीं हो पाता॥ 277-278 ॥ अनुभाष्य—अवैष्णव अथवा प्राकृत सहजियागण— विषयी लोग हैं। उनके अभक्तिपूर्वक प्रदान किये गये भोजनको ग्रहण करने अथवा खानेके सङ्गके फलसे साधक-वैष्णवोंका सङ्गदोष होता है, एवं उसके फलस्वरूप, साधकगण उन विषयीके जैसे स्वभावको प्राप्त करते हैं। 'अवैष्णव' और 'वैष्णव'-नामधारी प्राकृत सहजियाओंके साथ लेशमात्र प्रच्छन्न-प्रीतिके साथ भी यदि कोई छह प्रकारके सङ्ग (दान, प्रतिग्रह अर्थात् उनके द्वारा दी गयी प्रसादरूपी वस्तु-ग्रहण, उनका प्रसाद मानकर भोजन और भोजनके लिये उनको प्रवर्त्तन, गूढ़ बातका वर्णन और जिज्ञासा) करता है, तब अप्राकृत शुद्धकृष्णभक्तिके स्थानपर जड़ेन्द्रिय-तर्पणमूलक प्राकृत भोग आकर साधकको कृष्णभक्तिसे च्युत कर देते हैं। इसलिये अपनी इन्द्रियोंके तर्पणपरक विषयोंसे मलिन अशुद्ध चित्तवाले व्यक्तियोंके लिये अप्राकृत कृष्णस्मरणादिका सेवन कभी भी सम्भव नहीं है॥ 278 ॥ गृहव्रत या ग्राम्य-व्यवहारको जाननेवाले ही 'विषयी', उनका सङ्ग ही 'राजस' :- विषयीर अन्न हय 'राजस' निमन्त्रण। दाता, भोक्ता—दुँहार मलिन हय मन ॥ 279 ॥ अनुवाद—विषयी व्यक्तिके अन्नको ग्रहण करनेका निमन्त्रण 'राजसिक' निमन्त्रण है, इससे देनेवाले और ग्रहण करनेवाले—दोनोंका ही मन मलिन हो जाता है॥ 279 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'राजस' निमन्त्रण',—निमन्त्रण तीन प्रकारके होते हैं—सात्त्विक, राजसिक और तामसिक; विशुद्ध वैष्णवोंका निमन्त्रण—सात्त्विक, विषयी पुण्यवान् व्यक्तिका अन्न—राजस और पापी व्यक्तिका अन्न—तामस होता है॥ 279 ॥ ईश्वरकी अमन्दोदया दयाके फलसे सद्बुद्धिके उदित होनेपर साधकके द्वारा कर्ममिश्रा-भक्तिका त्याग और शुद्धसेवाकी प्रवृत्ति :- इँहार सङ्कोचे आमि एतदिन निल। भाल हैल—जानिया से आपनि छाड़िल ॥” 280 ॥ अनुवाद—मैंने रघुके अनुरोधपर इतने दिनों तक उसके निमन्त्रणको स्वीकार किया। अच्छा ही हुआ कि मेरे मनकी बातको जानकर उसने स्वयं ही निमन्त्रण करना छोड़ दिया॥” 280 ॥ श्रीरघुनाथके द्वारा सिंहद्वारको त्यागकर छत्रमें भोजन ग्रहण करना :- कत दिने रघुनाथ सिंहद्वार छाड़िला। छत्रे याइ' मागिया खाइते आरम्भ करिला ॥ 281 ॥ अनुवाद—कुछ दिनोंके बाद श्रीरघुनाथदासने सिंहद्वारपर खड़े होकर भिक्षा माँगना छोड़ दिया और छत्रमें जाकर माँगकर खाना आरम्भ किया॥ 281 ॥