भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2215

198 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/270–276 ] थे, इसलिये श्रीरघुनाथ दास उन ब्राह्मण और सेवकसे केवल इतना ही ग्रहण करते थे ॥ 270 ॥ अनुभाष्य—'अष्टपण'—640 कड़ा कड़ि [सबसे छोटे मूल्य-वर्गकी मुद्रा जिनका कौड़ियोंके (छोटेसे शङ्खके) द्वारा विनिमय किया जाता था] अर्थात् आठ आना [एक रुपया=16 आना] ॥ 270 ॥ दो वर्षोंके बाद महाप्रभुको निमन्त्रण करनेके कार्यका परित्याग :— एइमत निमन्त्रण वर्ष दुइ कैला। पाछे रघुनाथ निमन्त्रण छाड़ि' दिला ॥ 271 ॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीरघुनाथ दासने महाप्रभुको दो वर्ष तक निमन्त्रण किया, किन्तु दो वर्षके अन्तमें उन्होंने निमन्त्रण देना बन्द कर दिया ॥ 271 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीस्वरूपसे श्रीरघुनाथके द्वारा निमन्त्रण ना देनेके कारणकी जिज्ञासा :— मास-दुइ यबे रघुनाथ ना करे निमन्त्रण। स्वरूपे पुछिला तबे शचीर नन्दन ॥ 272 ॥ “रघु केने आमाय निमन्त्रण छाड़ि' दिल?” स्वरूप कहे,—“मने किछु विचार करिल ॥ 273 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुको श्रीरघुनाथके चित्तके भाव बतलाकर प्राकृत-विषयीको शिक्षादान; भोक्ता-अभिमानी विषयीके भोग्य जड़ीय-द्रव्य कभी भी चिन्मय श्रीविष्णुके भोग्य नहीं :— विषयीर द्रव्य लञा करि निमन्त्रण। प्रसन्न ना हय इहाय, जानि प्रभुर मन ॥ 274 ॥ अहङ्कार-विमूढ़ व्यक्तिकी भोग्य-जड़-वस्तुके द्वारा चिन्मयी श्रीविष्णु-सेवाके परिमाणकी चेष्टा— अनर्थको वर्धित करनेवाली और चित्-जड़का समन्वय करनेवाली जड़ीय-प्रतिष्ठा मात्र :— मोर द्रव्य लइते चित्त ना हय निर्मल। एइ निमन्त्रणे देखि,—'प्रतिष्ठा' मात्र फल ॥ 275 ॥ अनुवाद—जब दो मास तक श्रीरघुनाथ दासने महाप्रभुको निमन्त्रण नहीं दिया, तब शचीनन्दन श्रीगौरहरिने श्रीस्वरूप दामोदरसे पूछा, — “रघुने मुझे निमन्त्रण देना क्यों बन्द कर दिया है?” श्रीस्वरूप दामोदरने कहा, — “उसने अपने मनमें कुछ विचार किया— 'मैं विषयी व्यक्तिके धनसे महाप्रभुको निमन्त्रण करता हूँ, मैं जानता हूँ उनका हृदय इससे प्रसन्न नहीं होता है। उस धनको ग्रहण करके उसे महाप्रभुकी सेवामें लगानेसे जब मेरा चित्त ही निर्मल नहीं हो रहा, तब तो ऐसे निमन्त्रणका फल केवल जड़ीय प्रतिष्ठा ही है ॥ 272-275 ॥ अनुभाष्य—'अहं मम' [मैं और मेराके] अभिमानसे युक्त जड़ीय भोक्ताके द्वारा प्राकृत विषयीके भोग्य अर्थके द्वारा जड़ातीत सच्चिदानन्द वस्तु हरि-गुरु-वैष्णवोंकी सेवा करनेकी चेष्टा करनेपर केवल प्रतिष्ठारूपी फलको ही प्राप्त करता है, उससे वास्तविक अप्राकृत हरि-गुरु-वैष्णवोंकी सेवा नहीं होती। नित्य मङ्गलकी इच्छा रखनेवाले जीवके लिये एकान्त शरणागत होकर अर्थात् सम्पूर्ण आत्मनिवेदन करके अपने द्वारा अर्जित समस्त धनके द्वारा एवं काय-मन-वाक्य-प्राणसे अप्राकृत हरि-गुरु-वैष्णवकी सेवा करना कर्त्तव्य है ॥ 275 ॥ अबोध बालकके जैसे व्यक्तिके नित्य मङ्गलके लिये ईश्वरकी अमन्दोदय-दया :— उपरोधे प्रभु मोर मानेन निमन्त्रण। ना मानिले दुःखी हइबेक मूर्ख जन ॥ 276 ॥ अनुवाद—मेरे अनुरोधके कारण महाप्रभु निमन्त्रणको स्वीकार करते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि निमन्त्रण स्वीकार नहीं करनेसे मेरे जैसा मूर्ख व्यक्ति दुःखी होगा ॥ 276 ॥ अनुभाष्य—जन्म, ऐश्वर्य, श्रुत (विद्या), श्री (सौन्दर्य) के अभिमानमें मत्त विषयी लोग श्रीमूर्तिंकी तथाकथित सेवा करवाके [उनको अर्पित भोगको] उनका प्रसाद मानकर वैष्णवोंको प्रदान करते हैं। मूर्खतावशतः वे यह नहीं जानते कि उनकी अभक्तिमय मनोवृत्तिके द्वारा प्रदत्त कोई भी वस्तु अधोक्षज अजित (भगवान्) ग्रहण नहीं करते। इसलिये कृष्णभजन परायण निरपेक्ष अर्थात्