श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 6/263-270 छठा अध्याय 197 रघुनाथः (श्रीदासगोस्वामी) नीलाचले (पुरुषोत्तमक्षेत्रे) तिष्ठतां (निवसतां मध्ये) कस्य न विदितः ? [सर्वेषामेव परिचितोऽस्तीति भावः] । श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 263 ॥ श्रीरघुनाथका अतुलनीय सौभाग्य :- यः सर्वलोकैकमनोभिरुच्या सौभाग्यभूः काचिदकृष्टपच्या। यस्यां समारोपणतुल्यकालं तत्प्रेमशाखी फलवानतुल्यः ॥ 264 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 264 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो समस्त लोगोंकी मनोभिरुचिके (चित्तरञ्जनके) द्वारा कोई एक (अनिर्वचनीय) अकृष्टपच्या (स्वतःप्रकटित) सौभाग्यकी भूमि (आधार-स्वरूपा) बने थे, जिनमें बीज बोनेके समय ही (श्रीचैतन्यका) अतुल्य (अनुपम) प्रेम-शाखी (वृक्ष) फलवान् हुआ था ॥ 264 ॥ अनुभाष्य- यः (दासगोस्वामी) सर्वलोकैकमनोभिरुच्या (सर्वेषां भक्तानां लोकानाम् एका प्रधाना या मनसः अभिरुचिः प्रीतिः तया) काचित् (अनिर्वचनीया) अकृष्टपच्या (कर्षणव्यतिरेकेण पक्वा, अर्थात् साधनेन सिद्धिलाभात् पूर्वमेव साधनव्यतिरेकेण वा सिद्धा) सौभाग्यभूः (सौभाग्यभूमिः), यस्यां (भूमौ) समारोपण- तुल्यकालं (बीजवपनसमकालमेव) अतुल्यः (अनुपमः) तत्प्रेमशाखी (तत् तस्य श्रीचैतन्यस्य प्रेमा, स एव शाखी वृक्षः) फलवान् [अभवत् इति शेषः] । श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 264 ॥ शिवानन्द यैछे सेइ मनुष्ये कहिला। कर्णपूर सेइरूपे श्लोक वर्णिला ॥ 265 ॥ अनुवाद-श्रीशिवानन्द सेनने श्रीरघुनाथ दासके विषयमें जैसा उनके पिताके द्वारा भेजे गये व्यक्तिसे कहा, श्रीकविकर्णपूरने उपरोक्त श्लोकोंमें उसी बातका ही वर्णन किया है ॥ 265 ॥ गोवर्धनके द्वारा भेजे गये धन, सेवक और ब्राह्मणका वर्षाकालमें श्रीशिवानन्दके साथ पुरीमें जाना :- वर्षान्तरे शिवानन्द चले नीलाचले। रघुनाथेर सेवक, विप्र ताँर सङ्गे चले ॥ 266 ॥ अनुवाद-अगले वर्ष जब श्रीशिवानन्द सेन नीलाचलके लिये चले, तब श्रीरघुनाथ दासके पिताके द्वारा भेजे गये सेवक और एक ब्राह्मण भी श्रीशिवानन्द सेनके साथ चल दिये ॥ 266 ॥ सेइ विप्र-भृत्य, चारि-शत मुद्रा लञा। नीलाचले रघुनाथे मिलिला आसिया ॥ 267 ॥ अनुवाद-वह ब्राह्मण और सेवक चार सौ मुद्राएँ लेकर श्रीजगन्नाथ पुरीमें आये थे और वहाँ वे श्रीरघुनाथ दाससे मिले ॥ 267 ॥ श्रीरघुनाथके द्वारा उन सबको अस्वीकार करना :- रघुनाथ-दास अङ्गीकार ना करिल। द्रव्य लञा दुइजन ताँहाइ रहिल ॥ 268 ॥ अनुवाद-श्रीरघुनाथ दासने उस धन और उन सेवकों एवं ब्राह्मणको स्वीकार नहीं किया। तब एक सेवक और ब्राह्मण, ये दो व्यक्ति उन मुद्राओंको लेकर वहींपर रह गये ॥ 268 ॥ प्रतिमास श्रीरघुनाथका महाप्रभुको दो बार निमन्त्रण :- तबे रघुनाथ करि' अनेक यतन। मासे दुइदिन कैला प्रभुर निमन्त्रण ॥ 269 ॥ अनुवाद-तब श्रीरघुनाथने यत्नपूर्वक बड़े सम्मानके साथ महाप्रभुको एक मासमें दो दिन भोजनके लिये निमन्त्रण करना प्रारम्भ किया ॥ 269 ॥ उसके लिये ही श्रीरघुनाथके द्वारा गोवर्धनके द्वारा भेजे धनको लेना :- दुइ निमन्त्रणे लागे कौड़ि अष्टपण। ब्राह्मण-भृत्य-ठाञि करेन एतेक ग्रहण ॥ 270 ॥ अनुवाद-दो बार निमन्त्रणमें आठ आने खर्च होते