भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2213, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2213

196 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/257-263 ] [बायाँ स्तम्भ] श्रीगोवर्धनदासके पास जाकर उस व्यक्तिके द्वारा श्रीरघुनाथके वैराग्यसे युक्त भजनके संवादका ज्ञापन :- एत शुनि' सेइ मनुष्य गोवर्धन-स्थाने। कहिल गिया सब रघुनाथ-विवरणे॥ 257॥ अनुवाद—यह सुनकर वह व्यक्ति श्रीगोवर्धन मजुमदारके पास लौट गया और उनको श्रीरघुनाथ दासके विषयमें सब कुछ बतलाया॥ 257॥ श्रीरघुनाथका कृष्णभजनके उद्देश्यसे भोगोंके त्यागके विषयमें श्रवण करके कृष्ण-भोग्य भक्तको अपना भोग्य-पुत्र मानकर पत्नी सहित गोवर्धनदासका दुःख :- शुनि' ताँर माता पिता दुःखित हइल। पुत्र-ठाञि द्रव्य-मनुष्य पाठाइल॥ 258॥ श्रीरघुनाथको देनेके लिये श्रीशिवानन्दके निकट मुद्रा, सेवक और रसोइयेको भेजना :- चारिशत मुद्रा, दुइ भृत्य, एक ब्राह्मण। शिवानन्देर ठाञि पाठाइल ततक्षण॥ 259॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ दासके ऐसे वैराग्यके विषयमें सुनकर उनके माता-पिता बहुत दुःखी हुए। इसलिये उन्होंने अपने पुत्रके पास खाने-पहननेकी वस्तुएँ और सेवक भेजनेकी व्यवस्था की। उन्होंने उसी समय चार सौ मुद्राओंके साथ दो सेवक और एक ब्राह्मणको श्रीशिवानन्द सेनके पास भेजा॥ 258-259॥ श्रीशिवानन्दका साथमें ले जानेका आश्वासन :- शिवानन्द कहे,—“तुमि याइते नारिबा। आमि याइ यबे, आमार सङ्गे याइबा॥ 260॥ एबे घर याह, यबे आमि सब चलिमु। तबे तोमा-सबाकारे सङ्गे लञा यामु॥”261॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने उन लोगोंसे कहा,—“आप सब अपने आपसे जगन्नाथपुरी नहीं जा पाओगे। जब मैं जाऊँगा, तब मेरे साथ ही जाना। अभी आप लोग अपने घर लौट जाओ। जब हम सब लोग चलेंगे, तब आप सबको मैं अपने साथ ले जाऊँगा॥”260-261॥ [दायाँ स्तम्भ] श्रीकविकर्णपूरके द्वारा स्वरचित नाटकमें श्रीरघुनाथके माहात्म्यका वर्णन :- एइ त' प्रस्तावे श्रीकविकर्णपूर। रघुनाथ-महिमा ग्रन्थे लिखिला प्रचुर॥ 262॥ 262। अनुवाद—इसी प्रसङ्गमें श्रीकविकर्णपूरने स्वरचित चैतन्यचन्द्रोदय नाटकमें श्रीरघुनाथ दासकी प्रचुर महिमाका वर्णन किया है॥ 262॥ अनुभाष्य—'ग्रन्थे',—श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटकमें॥ 262॥ श्रीयदुनन्दनाचार्य और श्रीरघुनाथके गुण :- श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटक (10/3-4)में साथी यात्रियोंके प्रति श्रीशिवानन्दकी उक्ति— आचार्यो यदुनन्दनः सुमधुरः श्रीवासुदेवप्रिय- स्तच्छिष्यो रघुनाथ इत्यधिगुणः प्राणाधिको मादृशाम्। श्रीचैतन्यकृपातिरेकसततस्निग्धः स्वरूपप्रियो वैराग्यैकनिधिर्न कस्य विदितो नीलाचले तिष्ठताम्॥ 263॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 263॥ अमृतप्रवाह भाष्य—(काञ्चनपल्ली-निवासी) श्रीवासुदेव-दत्तके प्रियपात्र [शिष्य नहीं] अति सुमधुर-मूर्ति श्रीयदुनन्दनाचार्य हैं, उनके शिष्य [कृपापात्र, दीक्षा शिष्य नहीं] ही श्रीरघुनाथ दास हैं। उनके गुणोंके कारण वे-हम सबको ही प्राणोंसे अधिक प्रिय हैं एवं वे श्रीचैतन्यकी अतिशय कृपाके द्वारा सदा स्निग्ध हैं, वे श्रीस्वरूप गोस्वामीके प्रिय और वैराग्य-राज्यकी एकमात्र निधि हैं। नीलाचलमें जो वास करते हैं, उनमेंसे उन्हें कौन नहीं जानता?263॥ अनुभाष्य— श्रीवासुदेवप्रियः (वासुदेव-दत्तठाकुरस्य प्रियः कृपापात्रं; न तु शिष्यः) सुमधुरः यदुनन्दनः आचार्यः; तच्छिष्यः (तस्य यदुनन्दनस्य शिष्यः इति कृपापात्रं, न तु तेनैव दीक्षितः इत्यर्थः) अधिगुणः (गुणैरधिकः सर्वाधिकगुणान्वितः) मादृशां (गौरप्राणानां) प्राणाधिकः (प्राणतोऽप्यधिकः प्रियः) श्रीचैतन्यकृपातिरेक-सततस्निग्धः (गौरकृपातिशयेन नित्यप्रेमवान्) स्वरूपप्रियः (दामोदर-स्वरूपानुगः) वैराग्यैकनिधिः (वैराग्यस्य एकनिधिः मुख्याश्रयः सिन्धुर्वा)