भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2212

[ 6/246-256 छठा अध्याय 195 तोमारे पाठाइते पत्री पाठाइल मोरे। साथ ही रहते हैं और उनकी तो बहुत ख्याति है, उन्हें झाँकरा हइते तोमा ना पाञा गेल घरे॥"247॥ कौन नहीं जानता?251॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने श्रीरघुनाथ दाससे स्वरूपेर स्थाने तारे करियाछेन समर्पण। कहा,—"तुम्हारे पिताने तुम्हें घर लौटाकर ले जानेके प्रभुर भक्तगणेर तेंहो हय प्राणसम॥252॥ लिये दस लोगोंको भेजा था। उनके द्वारा तुम्हारे पिताने तुम्हें घर भेजनेके लिये मेरे पास एक पत्र भी लिखा अनुवाद—महाप्रभुने उनको श्रीस्वरूप दामोदरके था। वे लोग तुम्हारे नहीं मिलनेके कारण झाँकरासे हाथोंमें समर्पित किया है। वे महाप्रभुके भक्तोंके घरको लौट गये॥"246-247॥ प्राण-स्वरूप हैं॥252॥ चातुर्मास्यके अन्तमें भक्तोंके द्वारा पुरीसे गौड़में लौटना :— रात्रि-दिन करे तेंहो नाम-सङ्कीर्त्तन। चारि मास रहि' भक्तगण गौड़े गेला। क्षणमात्र नाहि छाड़े प्रभुर चरण॥253॥ शुनि' रघुनाथेर पिता मनुष्य पाठाइला॥248॥ अनुवाद—वे रात-दिन नाम-सङ्कीर्तन करते हैं। वे श्रीशिवानन्दसे श्रीगोवर्धनदासके द्वारा लोग भेजकर एक क्षणके लिये भी महाप्रभुके आनुगत्यको नहीं श्रीरघुनाथके विषयमें जिज्ञासा :— छोड़ते॥253॥ से मनुष्य शिवानन्द-सेनेरे पुछिल। “महाप्रभुर स्थाने एक 'वैष्णव' देखिल॥249॥ परम वैराग्य ताँर, नाहि भक्ष्य-परिधान। गोवर्धनरे पुत्र तेंहो, नाम—'रघुनाथ'। यैछे तैछे आहार करि' राखये पराण॥254॥ नीलाचले परिचय आछे तोमार साथ??"250॥ अनुवाद—वे तो परम वैरागी हैं। वे खाने-पहननेकी अनुवाद—चार मास तक श्रीजगन्नाथ पुरीमें रहनेके भी चिन्ता नहीं करते। वे जिस किसी प्रकारसे कुछ पश्चात् भक्त गौड़देशमें लौट गये। उनके लौट आनेकी खाकर अपने प्राणोंकी रक्षा करते हैं॥254॥ बातको सुनकर श्रीरघुनाथ दासके पिताने एक व्यक्तिको श्रीशिवानन्द सेनके पास भेजा। उस व्यक्तिने आकर दशदण्ड रात्रि गेले 'पुष्पाञ्जलि' देखिया। श्रीशिवानन्द सेनसे पूछा,—“क्या आपने महाप्रभुके सिंहद्वारे खाड़ा हय आहार लागिया॥255॥ वासस्थानपर एक वैरागीको देखा? वे श्रीगोवर्धन मजुमदारके पुत्र श्रीरघुनाथ दास हैं। क्या नीलाचलमें आपकी उनके अनुवाद—रात्रिके दस दण्ड (चार घण्टे) बीत साथ भेंट हुई?”248-250॥ जानेपर वे भगवान् श्रीजगन्नाथकी पुष्पाञ्जलिके दर्शन करके भोजनकी भिक्षाके लिये सिंहद्वारपर खड़े हो जाते श्रीशिवानन्दके द्वारा श्रीरघुनाथके तात्कालिक वैराग्य हैं॥255॥ और वैष्णवी-प्रतिष्ठाकी प्रशंसा :— शिवानन्द कहे,—“तेंहो हय प्रभुर स्थाने। केह यदि देय, तबे करये भक्षण। परम विख्यात तेंहो, केबा नाहि जाने??251॥ कभु उपवास, कभु करये चर्वण॥”256॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने कहा,—“वे महाप्रभुके अनुवाद—यदि कोई उन्हें कुछ दे देता है, तब वे उसे खा लेते हैं। अन्यथा कभी-कभी उपवास करते हैं और कभी कुछ चने आदि चबा लेते हैं॥”256॥