श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें194 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/238-246 ] किया है। स्वरूप दामोदर तुम्हें इसे विस्तारसे समझा देंगे॥ 238॥ पद्यावलीमें उद्धृत श्रीकृष्णचैतन्यचन्द्रोक्त शिक्षाष्टकका तीसरा श्लोक- तृणादपि सुनीचेन तरोरिव सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्त्तनीयः सदा हरिः ॥ "239॥ अनुवाद-जो अपनेको तृणसे भी छोटा मानते हैं, जो वृक्षके समान सहनशील हैं, अपने लिये मानशून्य हैं और दूसरोंको सम्मान प्रदान करते हैं, वे ही सदा हरिकीर्त्तन करनेके अधिकारी हैं॥ "239॥ अनुभाष्य-आदिलीला 17/31 संख्या देखें॥ 239॥ श्रीरघुनाथके द्वारा महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना, महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :- एत शुनि' रघुनाथ वन्दिला चरण। महाप्रभु कैला ताँरे कृपा-आलिङ्गन ॥ 240 ॥ अनुवाद-यह उपदेश सुनकर श्रीरघुनाथ दासने महाप्रभुके चरणकमलोंकी वन्दना की और महाप्रभुने उन्हें कृपापूर्वक आलिङ्गन प्रदान किया॥ 240॥ श्रीरघुनाथके द्वारा श्रीदामोदरस्वरूपके आनुगत्यमें श्रीगौरकृष्णकी अन्तरङ्ग-सेवा :- पुनः समर्पिला ताँरे स्वरूपेर स्थाने। 'अन्तरङ्ग सेवा' करे स्वरूपेर सने॥ 241 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने पुनः श्रीरघुनाथ दासको श्रीस्वरूप दामोदरके हाथोंमें समर्पित किया। इस प्रकार श्रीरघुनाथ दासने श्रीस्वरूप दामोदरके आनुगत्यमें अन्तरङ्ग सेवा की॥ 241 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'अन्तरङ्ग सेवा करे',-मन-ही- मनमें अपनी स्वरूप-देहमें जो व्रजसेवा है, वही 'अन्तरङ्ग' सेवा है। श्रीस्वरूप गोस्वामी-ललिता देवी हैं; उनके गणोंके मध्य प्रवेश करके श्रीदासगोस्वामी अपनी अन्तरङ्ग व्रज-सेवा करते थे॥ 241 ॥ प्रतिवर्षकी भाँति रथयात्रासे पहले गौड़ीय भक्तोंका पुरीमें आगमन :- हेनकाले आइला सब गौड़ेर भक्तगण। पूर्ववत् प्रभु सबाय करिला मिलन ॥ 242 ॥ अनुवाद-उसी समय गौड़देशके समस्त भक्त वहाँ आये और पहलेकी ही भाँति महाप्रभुने सभीसे भेंट की॥ 242॥ भक्तोंके साथ गुण्डिचा-मार्जन और बगीचेमें महोत्सव :- सबा लञा कैला प्रभु गुण्डिचा-मार्जन। सबा लञा कैला प्रभु वन्य-भोजन ॥ 243 ॥ अनुवाद-सभी भक्तोंको साथ लेकर महाप्रभुने श्रीगुण्डिचा मन्दिरका मार्जन किया और उसके पश्चात् बगीचेमें सबके साथ बैठकर भोजन किया॥ 243॥ अपने भक्तों सहित महाप्रभुका रथके आगे नृत्य; श्रीरघुनाथको विस्मय :- रथयात्राय सबा लञा करिला नर्त्तन। देखि' रघुनाथेर चमत्कार हैल मन ॥ 244 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने समस्त भक्तोंके साथ रथयात्राके समय नृत्य किया। महाप्रभुके नृत्यको देखकर श्रीरघुनाथ दास आश्चर्यचकित हो गये॥ 244॥ श्रीरघुनाथके द्वारा भक्तोंके चरणोंकी वन्दना, श्रीअद्वैतकी कृपाकी प्राप्ति :- रघुनाथ-दास यबे सबारे मिलिला। अद्वैत-आचार्य ताँरे बहु कृपा कैला ॥ 245 ॥ अनुवाद-श्रीरघुनाथ दास जब गौड़देशसे आये सब भक्तोंसे मिले तो श्रीअद्वैताचार्यने उनपर बहुत कृपा की॥ 245॥ श्रीशिवानन्दके द्वारा श्रीरघुनाथसे श्रीगोवर्धनदासके द्वारा उन्हें ढूँढ़नेकी चेष्टाका वर्णन :- शिवानन्द-सेन ताँरे कहेन विवरण। “तोमा लैते तोमार पिता पाठाइल दश जन ॥ 246 ॥