भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2207

190 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/206-214 ] महाप्रभुका अनुपम-भक्तवात्सल्य; श्रीगोविन्दको श्रीरघुनाथके प्रति आदर और सेवा करनेकी आज्ञा देना :- चैतन्येर भक्तवात्सल्य कहिते ना पारि। गोविन्देरे कहे रघुनाथे दया करि' ॥ 206 ॥ “पथे इँह करियाछे बहुत लङ्घन। कतदिन कर इहार भाल सन्तर्पण ॥”207 ॥ अनुवाद—मैं श्रीचैतन्य महाप्रभुके भक्तवात्सल्यका वर्णन नहीं कर सकता, उन्होंने श्रीरघुनाथके प्रति दयावान होकर श्रीगोविन्दसे कहा,—“रघुनाथने मार्गमें बहुत दिनों तक उपवास आदि किया है। तुम कुछ दिनों तक इसकी भली-भाँति सेवा करो कि यह पुनः पूर्ण स्वस्थ हो जाय॥”206-207 ॥ अनुभाष्य—'लङ्घन',—उपवास आदि; 'सन्तर्पण',— सेवा ॥ 207 ॥ श्रीरघुनाथको समुद्रस्नान करके श्रीजगन्नाथके दर्शनके बाद प्रसादका सम्मान करनेका आदेश :- रघुनाथे कहे,—“याञा, कर सिन्धुस्नान। जगन्नाथ देखि' आसि' करह भोजन ॥”208 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीरघुनाथको कहा,—“जाकर समुद्रमें स्नान करो। फिर भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन करके आकर भोजन करो॥”208 ॥ भक्तोंके साथ श्रीरघुनाथका मिलन :- एत बलि' प्रभु मध्याह्न करिते उठिला। रघुनाथदास सब भक्तेरे मिलिला ॥ 209 ॥ श्रीरघुनाथको महाप्रभुकी कृपा प्राप्त करते देख भक्तोंके द्वारा उनके सौभाग्यकी प्रशंसा :- रघुनाथे प्रभुर कृपा देखि' भक्तगण। विस्मित हञा करे ताँर भाग्य-प्रशंसन ॥ 210 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु मध्याह्न-कृत्य करनेके लिये उठे और श्रीरघुनाथदास सभी भक्तोंसे मिले। श्रीरघुनाथदासके प्रति महाप्रभुकी कृपाको देखकर सभी भक्त विस्मित हो गये और वे उनके सौभाग्यकी प्रशंसा करने लगे ॥ 209-210 ॥ समुद्रस्नानके बाद श्रीजगन्नाथके दर्शन करके श्रीरघुनाथको श्रीगोविन्दकी कृपासे महाप्रभुके भुक्त-अवशेषकी प्राप्ति :- रघुनाथ समुद्रे याञा स्नान करिला। जगन्नाथ देखि' गोविन्द-पाश आइला ॥ 211 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ दासने समुद्रमें जाकर स्नान किया और श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करके श्रीगोविन्दके पास आये ॥ 211 ॥ प्रभुर अवशिष्ट पात्र गोविन्द ताँरे दिला। आनन्दित हञा महाप्रसाद पाइला ॥ 212 ॥ अनुवाद—श्रीगोविन्दने श्रीरघुनाथ दासको महाप्रभुका उच्छिष्ट प्रसाद दिया और श्रीरघुनाथ दासने आनन्दित होकर महाप्रसाद पाया ॥ 212 ॥ पाँच दिन श्रीस्वरूपके निकट रहकर महाप्रभुके प्रसादकी प्राप्ति :- एइमत रहे तैँह स्वरूप-चरणे। गोविन्द प्रसाद ताँरे देन पञ्च दिने ॥ 213 ॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीरघुनाथ दास श्रीस्वरूप दामोदरके श्रीचरणाश्रयमें रहने लगे। श्रीगोविन्दने पाँच दिनों तक प्रतिदिन उन्हें महाप्रभुका उच्छिष्ट प्रसाद दिया ॥ 213 ॥ अगले दिनसे श्रीरघुनाथके द्वारा रात्रिमें सिंहद्वारपर प्रसादके प्रार्थीके रूपमें प्रतीक्षा :- आर दिन हैते 'पुष्प-अञ्जलि' देखिया। सिंहद्वारे खाड़ा रहे आहार लागिया ॥ 214 ॥ अनुवाद—अगले अर्थात् छठे दिनसे श्रीरघुनाथ दास रात्रिमें भगवान् श्रीजगन्नाथदेवकी पुष्पाञ्जलि-सेवाके दर्शन करके भोजनकी भिक्षाके लिये सिंहद्वारपर खड़े रहने लगे ॥ 214 ॥ अनुभाष्य—'पुष्प-अञ्जलि',—रात्रिकालमें श्रीजगन्नाथकी पुष्पाञ्जलि-सेवा ॥ 214 ॥