श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2206, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 6/198-205 छठा अध्याय 189 और सहायता करनेवाले थे। इसलिये सांसारिक लौकिक-विचारमें श्रेष्ठ और 'सज्जन' कहलाकर आदरणीय और साधारण लोक-समाजमें 'वैष्णव'के रूपमें परिचित होनेपर भी पारमार्थिक शुद्धभक्तोंके विचारसे वे 'शुद्धवैष्णव' नहीं थे; परन्तु शुद्धवैष्णवगण उन्हें 'वैष्णवप्राय' अथवा 'वैष्णवाभास' अर्थात् 'कनिष्ठ' अथवा 'अबोध' (विद्वेषी नहीं) समझते थे॥198॥ श्रीकृष्णप्रीतिकी इच्छाको छोड़कर इन्द्रिय-ज्ञानसे भोग अथवा त्यागरूपी विषयोंके अनुशीलनके फलसे सामान्य श्रद्धा-बीजकी भी स्तब्धता और संसार-वृद्धि :- तथापि विषयेर स्वभाव-हय महा-अन्ध। सेइ कर्म कराय, याते हय भवबन्ध ॥ 199॥ अनुवाद-तथापि विषयका स्वभाव ही ऐसा है कि वह विषयी व्यक्तिको सम्पूर्ण रूपसे अन्धा बना देता है और उससे वही कार्य करवाता है, जिससे भवबन्धन होता है॥ 199॥ अनुभाष्य-विषयी भोगी शुद्धभक्तिका परित्याग करके कर्मी, ज्ञानी अथवा अन्याभिलाषी होनेके कारण अपने-अपने द्वारा अनुष्ठित कर्म-ज्ञान आदिके अनुष्ठानके द्वारा ही अनजानेमें विषयोंमें जड़ीभूत बन जाते हैं॥ 199॥ नित्यसिद्ध श्रीरघुनाथका विषयभोग नहीं रहनेके कारण, अनर्थयुक्त साधकको ही महाप्रभुका उपदेश :- हेन 'विषय' हैते कृष्ण उद्धारिला तोमा। कहन ना याय कृष्णकृपार महिमा ॥ ” 200 ॥ अनुवाद-ऐसे विषयसे श्रीकृष्णने तुम्हारा उद्धार किया है। श्रीकृष्णकी कृपाकी महिमाका वर्णन नहीं किया जा सकता॥” 200॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरघुनाथको श्रीदामोदरस्वरूपके हाथोंमें समर्पित करना :- रघुनाथेर क्षीणता-मालिन्य देखिया। स्वरूपेरे कहेन प्रभु कृपार्द्रचित्त हञा ॥ 201 ॥ “एइ रघुनाथे आमि सँपिनु तोमारे। पुत्र-भृत्य-रूपे तुमि कर अङ्गीकारे ॥ 202 ॥ वैद्य-रघुनाथ, भट्ट-रघुनाथ और स्वरूपानुग दास-रघुनाथ :- तिन 'रघुनाथ'-नाम हय मोर स्थाने। 'स्वरूपेर रघु'—आजि हैते इहार नामे ॥ ” 203 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने देखा कि श्रीरघुनाथदासके द्वारा बारह दिन यात्रा और उपवास करनेसे उसका शरीर क्षीण और मलिन हो गया है, तो उनका हृदय कृपासे द्रवीभूत हो गया और उन्होंने श्रीस्वरूप दामोदरसे कहा,-“मैं इस रघुनाथको तुम्हें सौंपता हूँ, तुम इसे अपने पुत्र अथवा दासके रूपमें स्वीकार करो। मेरे तीन भक्तोंका नाम 'रघुनाथ' है। आजसे इसका नाम 'स्वरूपका रघु' है॥” 201-203॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'तिन रघुनाथ', - वैद्य-रघुनाथ (आदिलीला 11/22 संख्या देखें), भट्ट-रघुनाथ और दास-रघुनाथ ॥ 203 ॥ एत कहि' रघुनाथेर हस्त धरिला। स्वरूपेर हस्ते ताँरे समर्पण कैला ॥ 204 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने यह कहकर श्रीरघुनाथदासका हाथ पकड़कर उन्हें श्रीस्वरूप दामोदरके हाथोंमें समर्पित कर दिया॥ 204॥ महाप्रभुके आदेशसे श्रीस्वरूपका श्रीरघुनाथको अङ्गीकार करना :- स्वरूप कहे,-'महाप्रभुर ये आज्ञा हैल।' एत कहि' रघुनाथे पुनः आलिङ्गिल ॥ 205 ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरने श्रीरघुनाथदासको अङ्गीकार करते हुए कहा,-“महाप्रभुकी जैसी आज्ञा है, मुझे स्वीकार है।” यह कहकर उन्होंने पुनः श्रीरघुनाथको आलिङ्गन किया॥ 205॥