भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2208

[ 6/215–223 छठा अध्याय 191

घर जानेके लिये उद्यत श्रीजगन्नाथदेवके गृहस्थ सेवकोंके द्वारा रात्रिमें पूजाके अन्तमें द्वारपर खड़े प्रसादके प्रार्थी वैष्णवोंको प्रसाद-दान करनेकी रीति :— जगन्नाथेर सेवक यत—‘विषयीर गण’। सेवा सारि' रात्र्ये करे गृहेते गमन ॥ 215 ॥ सिंहद्वारे अन्नार्थी वैष्णवे देखिया। पसारिर ठाञि अन्न देन कृपा त' करिया ॥ 216 ॥ अनुवाद—भगवान् श्रीजगन्नाथदेवके सेवक जो कि विषयी अर्थात् गृहस्थ हैं, वे अपनी सेवा समाप्त करके रात्रिके समय अपने घर जाते हैं। तब सिंहद्वारपर भोजनकी भिक्षाके लिये खड़े वैष्णवोंको देखकर वे कृपा करके दुकानदारसे मूल्य देकर वैष्णवोंको भोजन दिलवा देते हैं॥ 215–216 ॥

पुरुषोत्तमक्षेत्रमें निष्किञ्चन विरक्त भक्तोंके व्यवहारका वर्णन :— एइमत सर्वकाल आछे व्यवहार। निष्किञ्चन भक्त खाड़ा हय सिंहद्वार ॥ 217 ॥ सर्वदिन करेन वैष्णव नाम-सङ्कीर्त्तन। स्वच्छन्दे करेन जगन्नाथ-दरशन ॥ 218 ॥ केह छत्रे याञा खाय, येबा किछु पाय। केह रात्रे भिक्षा लागि' सिंहद्वारे रय ॥ 219 ॥ अनुवाद—सदासे यही प्रथा चली आ रही है कि निष्किञ्चन भक्त सिंहद्वारपर खड़े हो जाते हैं। वैष्णवगण सारा दिन नाम-सङ्कीर्तन करते हैं और अपनी इच्छाके अनुरूप भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन करते हैं। कुछ वैष्णव छत्रमें जाकर जो कुछ मिलता है, उसे खा लेते हैं। और कुछ वैष्णव भिक्षाके लिये रात्रिके समय सिंहद्वारपर खड़े हो जाते हैं॥ 217–219 ॥

महाप्रभुके भक्तोंका व्यवहार; श्रीकृष्णकी प्रीतिके उद्देश्यसे अपने भोगका त्याग अथवा अखिल चेष्टा :— महाप्रभुर भक्तगणेर वैराग्य प्रधान। याहा देखि' प्रीत हन गौर-भगवान् ॥ 220 ॥

अनुवाद—महाप्रभुके भक्तोंमें वैराग्य प्रधान है, जिसे देखकर भगवान् श्रीगौरसुन्दर बहुत प्रसन्न होते हैं॥ 220 ॥ अनुभाष्य—अभक्त विषयी और शुद्धभक्त—दोनों ही भली प्रकारसे निरपेक्षरूपमें देखनेपर समझ सकते हैं कि महाप्रभुके भक्त—सांसारिक-भोग-तात्पर्य-परायण नहीं हैं अर्थात् इन्द्रियतर्पण और सुखभोगादिको त्याग करके श्रीकृष्णकी सेवाके लिये श्रीकृष्णसे अतिरिक्त समस्त विषयोंके प्रति उदासीन हैं। उनकी विषय त्यागकर अहैतुकी और अप्रतिहता [निरन्तर तैल-धारावत्] अलौकिकी श्रीकृष्णसेवा—साधारण लोगोंकी दृष्टिकी समझके परे है, भगवान् श्रीगौरसुन्दर श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्यान्य विषयोंसे विरक्त व्यक्तिके शुद्धभजनकी चतुरताको देखकर बहुत प्रसन्न होते हैं॥ 220 ॥

महाप्रभुको श्रीगोविन्दके द्वारा श्रीरघुनाथके सिंहद्वारपर प्रसादके लिये प्रतीक्षा करनेका संवाद देना :— प्रभुरे गोविन्द कहे,—“रघुनाथ 'प्रसाद' ना लय। रात्र्ये सिंहद्वारे खाड़ा हञा मागि' खाय ॥” 221 ॥ अनुवाद—श्रीगोविन्दने महाप्रभुसे कहा,—“रघुनाथदास अब यहाँ प्रसाद नहीं लेते। वे रात्रिमें सिंहद्वारपर खड़े होकर भिक्षा माँगकर खाते हैं॥” 221 ॥

श्रीरघुनाथको गृहत्यागी या 'वैरागी'की संज्ञा; उनके वैराग्यसे महाप्रभुको सन्तोष :— शुनि' तुष्ट हञा प्रभु कहिते लागिल। “भाल कैल, वैरागीर धर्म आचरिल ॥ 222 ॥ अनुवाद—श्रीगोविन्दकी बात सुनकर महाप्रभु सन्तुष्ट होकर कहने लगे,—“रघुनाथने अच्छा ही किया कि वह वैरागी व्यक्तिके धर्मका आचरण कर रहा है॥ 222 ॥

महाप्रभुके द्वारा वैरागी या गृहत्यागी व्यक्तिके वैध और अवैध आचरण या धर्मका वर्णन :— वैरागी करिबे सदा नाम-सङ्कीर्त्तन। मागिया खाञा करे जीवन-रक्षण ॥ 223 ॥