भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2209

192 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/223-229 ] अनुवाद—वैरागी व्यक्तिको सदा नाम-सङ्कीर्तन करना चाहिये। और जीवनकी रक्षाके लिये उसे माँगकर कुछ खा लेना चाहिये॥ 223 ॥ वैरागी हञा येबा करे परापेक्षा। कार्यसिद्धि नहे, कृष्ण करेन उपेक्षा ॥ 224 ॥ अनुवाद—वैरागी होकर भी जो दूसरोंकी अपेक्षा रखता है, तो उसके भजनकी सिद्धि नहीं होती और श्रीकृष्ण भी उसकी उपेक्षा कर देते हैं॥ 224 ॥ वैरागी हञा करे जिह्वार लालस। परमार्थ याय, आर हय रसेर वश ॥ 225 ॥ अनुवाद—वैरागी होकर जो जिह्वाके स्वादकी लालसा करता है उसका परमार्थ छूट जाता है और वह स्वादिष्ट भोजनके रसके वशीभूत हो जाता है॥ 225 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'रस',—तीखा, मीठा, खट्टा, नमकीन, कड़वा और कषाय-रस॥ 225 ॥ वैरागीर कृत्य—सदा नाम-सङ्कीर्त्तन। शाक-पत्र-फल-मूले उदर-भरण ॥ 226 ॥ अनुवाद—वैरागी व्यक्तिका कर्त्तव्य सदा नाम-सङ्कीर्तन करना ही है। और उसे सहज ही प्राप्त शाक, पत्र, फल, मूल आदि ग्रहणकर उदरपूर्ति करनी चाहिये ॥ 226 ॥ अनुभाष्य—हःभःविः—बीसवें विलासके अन्तमें— “कृतान्येतानि तु प्रायो गृहिणां धनिनां सताम्। लिखितानि न तु त्यक्तपरिग्रह महात्मनाम्॥ प्रभाते चार्द्धरात्रे च मध्याह्ने दिवसक्षये। कीर्त्तयन्ति हरिं ये वै ते तरन्ति भवार्णवम्॥ एवमेकान्तिनां प्रायः कीर्त्तनं स्मरणं प्रभोः। कुर्वतां परमप्रीत्या कृत्यमन्यन्न रोचते॥” हरिभक्तिविलासमें लिखित अनुष्ठानावली गृहस्थ धनी वैष्णवप्राय व्यक्तियोंके लिये है, सर्वपरित्यागी विरक्त एकान्तिक-नामाश्रित शुद्धवैष्णवोंके लिये नहीं है। प्रातःकालमें, मध्यरात्रिमें, मध्याह्नमें और सन्ध्यामें अर्थात् अष्टकालमें ही जो हरिका कीर्तन करता है, वही भवसागरसे पार होता है। एकान्तिक शुद्धभक्त परम प्रीतिके सहित प्रभुका कीर्तन और स्मरणादि किया करते हैं, उनका कीर्तनादिके अतिरिक्त अन्य कोई अनुष्ठान नहीं है। श्रीजीव गोस्वामी प्रभुके द्वारा रचित भक्तिसन्दर्भ (283 संख्यामें)— “यद्यपि श्रीभागवतमते पञ्चरात्रादिवदर्चनमार्गस्यावश्यकत्वं नास्ति, तद्विनापि शरणापत्त्यादीनामेकतरेणापि पुरुषार्थसिद्धेरभिहितत्वात्, ...।” [अर्थात् “यद्यपि श्रीमद्भागवतके मतानुसार अर्चनके बिना भी शरणागति आदिके जिस किसी एक अङ्गके भी द्वारा ही पुरुषार्थ-सिद्धि होती है, ऐसा होनेसे श्रीमद्भागवतके मतानुसार पञ्चरात्रादिकी भाँति अर्चन- मार्गकी आवश्यकता नहीं है, तथापि ...।] ॥ 226 ॥ जिह्वार लालसे येइ इति-उति धाय। शिश्नोदर-परायण कृष्ण नाहि पाय ॥ ”227 ॥ अनुवाद—जो जिह्वाके रसास्वादनकी लालसासे इधर-उधर भागता रहता है, ऐसा व्यक्ति जननेन्द्रियों और उदरके परायण होकर भगवान् श्रीकृष्णको प्राप्त नहीं कर सकता॥ ”227 ॥ गृहत्यागी साधकोंके मङ्गलके लिये स्वयंको वैसा मानकर श्रीरघुनाथके द्वारा श्रीस्वरूपसे अपने कर्त्तव्यकी जिज्ञासा :— आर दिन रघुनाथ स्वरूप-चरणे। आपनार कृत्य लागि' कैला निवेदने ॥ 228 ॥ “कि लागि' छाड़ाइला घर, ना जानि उद्देश। कि मोर कर्त्तव्य, प्रभु करुन उपदेश ॥ ”229 ॥ अनुवाद—अगले दिन श्रीरघुनाथदासने श्रीस्वरूप दामोदरके श्रीचरणोंमें अपना कर्त्तव्य जाननेके लिये निवेदन करते हुए कहा,—“मैंने किसलिये घर छोड़ा है, मैं इसका उद्देश्य नहीं जानता हूँ। मेरा क्या कर्त्तव्य