श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2198, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 6/127-143 छठा अध्याय 181 प्राप्ति नहीं होती। किन्तु यदि आप कृपा करें तो अधम व्यक्तिको भी महाप्रभुके चरणकमलोंका आश्रय प्राप्त हो जाता है। मैं अयोग्य हूँ, इसलिये आपसे निवेदन करनेमें भी भय करता हूँ कि हे गोसाईं! आप मेरे प्रति विशेषरूपसे दयावान् होकर मुझे श्रीचैतन्यदेवके चरणकमलोंमें आश्रय प्रदान कीजिये। मेरे सिरपर अपने चरणकमल रखकर मुझपर कृपा कीजिये कि मैं निर्विघ्न रूपसे श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंका आश्रय प्राप्त करूँ॥” 127-133॥ श्रीरघुनाथकी श्रीचैतन्यचरण प्राप्त करनेकी व्याकुलताको देखकर उन्हें कृपाशीर्वाद प्रदान करनेके लिये श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा शुद्धभक्तोंके निकट आवेदन :- शुनि' हासि कहे प्रभु सब भक्तगणे। “इँहार विषयसुख—इन्द्रसुख-समे॥ 134॥ चैतन्य-कृपाते से नाहि भाय मने। सबे आशीर्वाद कर—पाउक चैतन्य-चरणे॥ 135॥ श्रीकृष्ण-चरणकमलोंकी गन्धकी महिमा और आकर्षण-शक्ति :- कृष्णपादपद्म-गन्ध येइ जन पाय। ब्रह्मलोक-आदि सुख ताँरे नाहि भाय॥” 136॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथके निवेदनको सुनकर श्रीनित्यानन्द प्रभु मुस्कुराये और उन्होंने सभी भक्तोंसे कहा,—“रघुनाथदासके पास इन्द्रके समान सांसारिक विषय सुख हैं, किन्तु श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कृपासे वे सब सुख इसके मनको नहीं भाते। इसलिये आप सभी इसे आशीर्वाद दीजिये कि इसे श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंका आश्रय प्राप्त हो। जिन्हें श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी सुगन्धकी प्राप्ति होती है, उन्हें ब्रह्मलोकादिके सुख भी नहीं भाते॥” 134-136॥ श्रीमद्भागवत (5/14/43) में— यो दुस्त्यजान् दारसुतान् सुहृद्राज्यं हृदिस्पृशः। जहौ युवैव मलवदुत्तमःश्लोकलालसः॥ 137॥ अनुवाद—भरत महाराजने उत्तमःश्लोक श्रीकृष्णको प्राप्त करनेकी लालसासे युवावस्थामें ही हृदयग्राहिणी पत्नी, पुत्र, सुहृत् और राज्यादिका मलकी भाँति परित्याग किया था;—यही जातभाव व्यक्तिकी विरक्तिका लक्षण है॥ 137॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 23/24 संख्या देखें॥ 137॥ श्रीरघुनाथके सिरपर चरण रखकर श्रीनित्यानन्दप्रभुके द्वारा उनकी महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्तिका वर्णन :- तबे रघुनाथे प्रभु निकटे बोलाइला। ताँर माथे पद धरि' कहिते लागिला॥ 138॥ “तुमि कराइला एइ पुलिन-भोजन। तोमाय कृपा करि' गौर कैला आगमन॥ 139॥ कृपा करि' कैला चिड़ा-दुग्ध भोजन। नृत्य देखि' रात्र्ये कैला प्रसाद-भक्षण॥ 140॥ श्रीरघुनाथके प्रति कृपापूर्वक श्रीगौरका आविर्भाव और भोजनके फलसे श्रीरघुनाथका विघ्न-नाश :- तोमा उद्धारिते गौर आइला आपने। छुटिल तोमार यत विघ्नादि-बन्धने॥ 141॥ श्रीनित्यानन्द प्रभुकी भविष्यवाणी :- स्वरूपेर स्थाने तोमा करिबे समर्पणे। 'अन्तरङ्ग' भृत्य बलि' राखिबे चरणे॥ 142॥ निर्विघ्न श्रीचैतन्यचरण प्राप्तिका आशीर्वाद प्रदान :- निश्चिन्त हञा याह आपन-भवन। अचिरे निर्विघ्ने पाबे चैतन्य-चरण॥” 143॥ अनुवाद—तब श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीरघुनाथदासको अपने निकट बुलाया और उनके सिरपर अपने चरणकमल रखकर उनसे कहने लगे,—“तुमने जो यह पुलिन-भोजन करवाया, श्रीगौरसुन्दर यहाँ तुम्हारे ऊपर कृपा प्रदर्शित करनेके लिये आये थे। श्रीगौरसुन्दरने तुमपर कृपा करके दूध-चिड़वेका भोजन भी किया। रात्रिके समयमें भक्तोंके नृत्यको देखकर उन्होंने प्रसाद भी ग्रहण किया। श्रीगौरसुन्दर स्वयं तुम्हारा उद्धार