श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें180 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/122-133 ] स्नेहकृपामय श्रीराघवके द्वारा श्रीरघुनाथको दोनों प्रभुओंका उच्छिष्ट-पात्र प्रदान :- राघवेर कृपा रघुनाथेर उपरे। दुइ भाइएर अवशिष्ट पात्र दिला ताँरे॥ 122॥ महाप्रभुके उच्छिष्टके सेवनसे ही श्रीरघुनाथका गृहत्याग-सामर्थ्य :- कहिला,—“चैतन्य-प्रभु करियाछेन भोजन। ताँर शेष पाइले, तोमार खण्डिबे बन्धन॥” 123॥ अनुवाद—स्नेहकृपामय श्रीराघव पण्डितने श्रीरघुनाथको दोनों भाइयोंका उच्छिष्ट पात्र देकर कहा,—“श्रीचैतन्य महाप्रभुने भोजन किया है, उनका उच्छिष्ट पानेसे तुम्हारा संसारका बन्धन कट जायेगा॥” 122-123॥ भगवान्के अवस्थान और स्वभावका निर्णय :- भक्त-चित्ते भक्त-गृहे सदा अवस्थान। कभु गुप्त, कभु व्यक्त, स्वतन्त्र भगवान्॥ 124॥ अनुवाद—भगवान् भक्तके चित्तमें अथवा भक्तके घरमें सदा वास करते हैं। कभी यह गुप्तरूपसे और कभी व्यक्तरूपसे होता है, क्योंकि भगवान् स्वतन्त्र हैं॥ 124॥ महाप्रभुके विभु होनेमें संशय करनेवालोंका विनाश :- सर्वत्र 'व्यापक' प्रभुर सदा सर्वत्र वास। इहाते संशय यार, सेइ याय नाश॥ 125॥ अनुवाद—सर्वत्र व्यापक महाप्रभुका सदा सभी स्थानोंपर वास होता है। इसमें जिसे संशय होता है, उसका सर्वनाश हो जाता है॥ 125॥ अगले दिन प्रातः स्नानके बाद वृक्षके नीचे बैठे श्रीनिताइके निकट श्रीरघुनाथके द्वारा श्रीचैतन्यचरणकी प्राप्तिके लिये निवेदन :- प्राते नित्यानन्द गङ्गास्नान करिया। सेइ वृक्षमूले बसिला निजगण लञा॥ 126॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु प्रातःकालमें गङ्गास्नान करके अपने गणोंके साथ उसी वृक्षके नीचे बैठ गये॥ 126॥ रघुनाथ आसि' कैला चरण-वन्दन। राघवपण्डित-द्वारा कैला निवेदन॥ 127॥ “अधम पामर मुइ हीन जीवाधम! मोर इच्छा हय—पाङ चैतन्यचरण॥ 128॥ वामन हञा चान्द धरिबारे चाय। अनेक यत्न कैनु, ताते कभु सिद्ध नय॥ 129॥ यतबार पलाइ आमि गृहादि छाड़िया। पिता, माता—दुइ मोरे राखये बान्धिया॥ 130॥ श्रीनित्यानन्द (गुरु)-कृपाके बिना श्रीचैतन्यपद- प्राप्ति असम्भव, उनकी कृपासे अयोग्यमें भी उनकी प्राप्तिकी योग्यता :- तोमार कृपा बिना केह 'चैतन्य' ना पाय। तुमि कृपा कैले ताँरे अधमेह पाय॥ 131॥ श्रीनित्यानन्द (गुरु)के चरणोंमें श्रीचैतन्यचरण प्राप्त करनेके लिये कृपा-भिक्षाकी कर्त्तव्यता :- अयोग्य मुइ निवेदन करिते करि भय। मोरे 'चैतन्य' देह' गोसाञि हञा सदय॥ 132॥ मोर माथे पद धरि' करह प्रसाद। 'निर्विघ्ने चैतन्य पाङ'—कर आशीर्वाद॥” 133॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथने आकर श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणोंकी वन्दना की और उन्होंने श्रीराघव पण्डितके माध्यमसे श्रीनित्यानन्द प्रभुको निवेदन किया,—“मैं अधम, पापी, निराश्रय और अधम जीव हूँ। मेरी इच्छा होती है कि मैं श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंका आश्रय प्राप्त करूँ। बौने व्यक्तिकी चन्द्रको पकड़नेकी इच्छा करने जैसे मैंने भी अनेक प्रयत्न किये, किन्तु उसमें कभी भी सफल नहीं हो पाया। मैंने जितनी बार भी घर आदि छोड़कर भागनेका प्रयास किया, मेरे माता-पिता—दोनोंने मुझे पकड़कर बाँधकर रख दिया। आपकी कृपाके बिना किसीको भी श्रीचैतन्य महाप्रभुकी