भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2194

[ 6/94-103 छठा अध्याय 177 आचमनके बाद श्रीनिताइके द्वारा श्रीरघुनाथको भुक्तावशेष-प्रदान :- भोजन करि' नित्यानन्द आचमन कैला। चारि कुण्डीर अवशेष रघुनाथे दिला॥ 94॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने भोजन करनेके पश्चात् आचमन किया और चारों हाण्डियोंमें बचा हुआ भोजन श्रीरघुनाथको दे दिया॥ 94॥ भक्तोंमें प्रसादका वितरण :- आर तिन कुण्डिकाय अवशेष छिल। ग्रासे-ग्रासे करि' विप्र सब भक्ते दिल॥ 95॥ अनुवाद—अन्य तीन हाण्डियोंमें भी चिड़वा-दही आदि बचा हुआ था। एक ब्राह्मणने उनमेंसे एक-एक ग्रास सभी भक्तोंमें बाँट दिया॥ 95॥ चन्दन-ताम्बूलके द्वारा प्रभुकी सेवा :- पुष्पमाला विप्र आनि' प्रभु-गले दिल। चन्दन आनिया प्रभुर सर्वाङ्गे लेपिल॥ 96॥ अनुवाद—तब एक ब्राह्मणने पुष्पमाला लाकर श्रीनित्यानन्द प्रभुके गलेमें पहनायी और चन्दन लाकर श्रीनित्यानन्द प्रभुके समस्त अङ्गोंपर उसका लेपन किया॥ 96॥ सेवक ताम्बूल लञा करे समर्पण। हासिया हासिया प्रभु करये चर्वण॥ 97॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके एक सेवकने ताम्बुल लाकर उन्हें समर्पित किया। श्रीनित्यानन्द प्रभु मुस्कुराते हुए उसको चबाने लगे॥ 97॥ सभी भक्तोंको उनके अवशेषकी प्राप्ति :- माला-चन्दन-ताम्बूल शेष ये आछिल। श्रीहस्ते प्रभु सबाकारे बाँटि' दिल॥ 98॥ अनुवाद—जितना माला-चन्दन तथा ताम्बुल बचा हुआ था, श्रीनित्यानन्द प्रभुने स्वयं अपने हाथोंसे उसे समस्त भक्तोंमें बाँट दिया॥ 98॥ प्रभुके अवशेषको प्राप्त करनेपर श्रीरघुनाथको आनन्द :- आनन्दित रघुनाथ प्रभुर 'शेष' पाञा। आपणार गण-सह खाइला बाँटिया॥ 99॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदास श्रीनित्यानन्द प्रभुके उच्छिष्ट प्रसादको प्राप्त करके बहुत आनन्दित हुए और उन्होंने उसे अपने साथियोंके साथ मिल-बाँटकर खाया॥ 99॥ इसलिये ही चिड़ा-दधि-महोत्सव-संज्ञा :- एइ त' कहिलुँ नित्यानन्देर विहार। 'चिड़ा-दधि-महोत्सव'-नामे ख्याति यार॥ 100॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने श्रीनित्यानन्द प्रभुके विहारका वर्णन किया, जिसकी 'चिड़ा-दधि-महोत्सव'के नामसे ख्याति है॥ 100॥ सन्ध्याके समय राघव-मन्दिरमें कीर्त्तन :- प्रभु विश्राम कैला, यदि दिन-शेष हैल। राघव-मन्दिरे तबे कीर्त्तन आरम्भिल॥ 101॥ अनुवाद—चिड़ा-दधि-महोत्सवके समाप्त होनेपर श्रीनित्यानन्द प्रभुने कुछ समय विश्राम किया। जब सन्ध्याका समय हुआ, तब श्रीनित्यानन्द प्रभु श्रीराघव पण्डितके घरमें पहुँचे और कीर्तन आरम्भ किया॥ 101॥ कीर्त्तनमें श्रीनित्यानन्द प्रभुका नृत्य :- भक्त सब नाचाञा नित्यानन्द-राय। शेषे नृत्य करे प्रेमे जगत् भासाय॥ 102॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने कीर्तनमें पहले सभी भक्तोंको नचाया और अन्तमें उन्होंने स्वयं भी नृत्य किया तथा इस प्रकार सम्पूर्ण जगत्‌को प्रेममें निमग्न कर दिया॥ 102॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीनित्यानन्दके नृत्यका दर्शन :- महाप्रभु ताँर नृत्य करेन दरशन। सबे नित्यानन्द देखे, ना देखे अन्यजन॥ 103॥ अनुवाद—महाप्रभु भी श्रीनित्यानन्द प्रभुके नृत्यको