श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें176 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/85–93 ] श्रीनित्यानन्द प्रभु बहुत आनन्दित हुए और उन्होंने अनेक भावावेशोंको प्रकाशित किया ॥ 85 ॥ हरिध्वनिके साथ भोजनका आदेश :- आज्ञा दिला, —'हरि बलि' करह भोजन'। 'हरि' 'हरि'-ध्वनि उठि' भरिल भुवन ॥ 86 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने सभीको आज्ञा दी, —'हरि बोलते हुए भोजन करो।' सभी भक्तोंकी ऐसी समवेत 'हरि' 'हरि' ध्वनि उठी कि उससे सारा ब्रह्माण्ड भर गया ॥ 86 ॥ वैष्णवोंका भोजन और व्रजके पुलिनभोजनका उद्दीपन :- 'हरि' 'हरि' बलि' वैष्णव करये भोजन। पुलिन-भोजन सबार हइल स्मरण ॥ 87 ॥ अनुवाद—समस्त वैष्णव 'हरि' 'हरि' बोलते हुए भोजन करने लगे, तो उन सबको व्रजमें श्रीकृष्ण और श्रीबलरामका सखाओंके साथ पुलिन-भोजनका स्मरण हो आया ॥ 87 ॥ श्रीरघुनाथके ऊपर दोनों प्रभुओंकी कृपा :- नित्यानन्द, महाप्रभु—कृपालु, उदार। रघुनाथेर भाग्ये एत कैला अङ्गीकार ॥ 88 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु और महाप्रभु नितान्त कृपालु और उदार हैं। यह तो श्रीरघुनाथदासका सौभाग्य था कि उन दोनोंने उनके द्वारा प्रदत्त चिड़वा आदि अङ्गीकार किया ॥ 88 ॥ श्रीनित्यानन्दके प्रेमके वशीभूत महाप्रभु :- नित्यानन्द-प्रभाव-कृपा जानिबे कोन् जन? महाप्रभु आनि' कराय पुलिन-भोजन ॥ 89 ॥ अनुवाद—उन श्रीनित्यानन्द प्रभुके प्रभाव और उनकी कृपाको कौन जान सकता है? उन्होंने महाप्रभुको लाकर पुलिन-भोजन कराया ॥ 89 ॥ अभिराम-ठाकुरादिको गोपभावसे यमुनातटपर पुलिन-भोजनका उद्दीपन :- श्रीरामदासादि गोप प्रेमाविष्ट हैला। गङ्गातीरे 'यमुना-पुलिन'-ज्ञान कैला ॥ 90 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके पार्षद श्रीरामदासादि गोप प्रेममें आविष्ट हो गये, उन्होंने गङ्गाके तटको यमुनाका पुलिन समझा ॥ 90 ॥ द्रव्य-विक्रयी व्यक्तियोंका अपनी वस्तुओंको बेचनेके लिये आना, बिक्रीमके द्वारा अर्थ-लाभ, पुन: बेची गयी वस्तुओंके प्रसाद बननेके बाद उनका भोजन :- महोत्सव शुनि' पसारि' नाना-ग्राम हैते। चिड़ा, दधि, सन्देश, कला आनिल बेचिते ॥ 91 ॥ अनुवाद—महोत्सवकी बात सुनकर अनेक गाँवोंसे पंसारी लोग चिड़वा, दूध, सन्देश तथा केला बेचनेके लिये ले आये ॥ 91 ॥ अनुभाष्य—'पसारि',—वस्तुएँ अथवा समान बेचनेवाले, दुकानदार ॥ 91 ॥ यत द्रव्य लञा आइसे, सब मूल्य करि' लय। तार द्रव्य मूल्य दिया ताहारे खाओयाय ॥ 92 ॥ अनुवाद—पंसारी लोग जितना सामान लेकर आये, श्रीरघुनाथदासने उनका मूल्य तय कर लिया। फिर उन सबका मूल्य देकर उनसे सब कुछ खरीद लिया और बादमें उन्हीं पंसारी लोगोंको ही वही वस्तुएँ खिला दीं ॥ 92 ॥ आनेवाले सभी व्यक्तियोंके द्वारा ही भोजन :- कौतुक देखिते आइल यत यत जन। सेइ चिड़ा, दधि, कला करिल भक्षण ॥ 93 ॥ अनुवाद—इस कौतुकको देखनेके लिये जितने भी लोग आये, उन्हें भी चिड़वा, दही तथा केला आदि वितरित किया गया और उन्होंने भी इन सबको खाया ॥ 93 ॥