भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2192, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2192

[ 6/76-85 छठा अध्याय 175 बैठाया और उन्हें दो मिट्टीके पात्र दिलवाये। श्रीराघव पण्डितने दो प्रकारका चिड़वा उनमें भिगोया॥ 76॥ महाप्रभुको महोत्सवके बीचमें ध्यानके माध्यमसे लाना :- सकल-लोकेर चिड़ा पूर्ण यबे हइल। ध्याने तबे प्रभु महाप्रभुरे आनिल ॥ 77 ॥ अनुवाद-जब समस्त भक्तोंमें चिड़वा वितरित हो गया, तब श्रीनित्यानन्द प्रभु ध्यानमें महाप्रभुको वहाँपर ले आये ॥ 77 ॥ महाप्रभुके सङ्गमें श्रीनित्यानन्द प्रभुका भोगका दर्शन :- महाप्रभु आइला देखि' निताइ उठिला । ताँरे लञा सबार चिड़ा देखिते लागिला ॥ 78 ॥ अनुवाद-महाप्रभुको आये देखकर श्रीनित्यानन्द प्रभु उठकर खड़े हो गये। महाप्रभुको अपने साथ लेकर वे सभीको दिये गये चिड़वाको देखने लगे ॥ 78 ॥ महाप्रभुके मुखमें एक-एक ग्रास-प्रदान :- सकल कुण्डीर, होल्नार चिड़ार एक एक ग्रास। महाप्रभुर मुखे देन करि' परिहास ॥ 79 ॥ अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभुने सभी मिट्टीके बने पात्रोंमें-से एक-एक ग्रास लिया और परिहास करते हुए उन्हें महाप्रभुके मुखमें दे दिया ॥ 79 ॥ महाप्रभुके द्वारा भी श्रीनिताइके मुखमें एकग्रास प्रदान :- हासि' महाप्रभु आर एक ग्रास लञा। ताँर मुखे दिया खाओयाय हासिया हासिया ॥ 80 ॥ अनुवाद-मुस्कुराते हुए महाप्रभुने भी एक अन्य ग्रास लेकर हँसते-हँसते श्रीनित्यानन्द प्रभुके मुखमें देकर उन्हें खिला दिया ॥ 80 ॥ भक्तोंके चारों ओर श्रीनिताइके द्वारा भ्रमणके आनन्दका दर्शन :- एइमत निताइ बुले सकल मण्डले। दाण्डञा रङ्ग देखे वैष्णव-सकले ॥ 81 ॥ अनुवाद-इस प्रकार श्रीनित्यानन्द प्रभुने सभी मण्डलियोंमें भ्रमण किया और सभी वैष्णव खड़े होकर इस आनन्दोत्सवको देख रहे थे ॥ 81 ॥ दोनोंका आनन्द-किसीके लिये अदृश्य, सुकृतिसम्पन्न किसीके लिये दृश्य :- कि करिया बेड़ाय, -इहा केह नाहि जाने। महाप्रभुर दर्शन पाय कोन भाग्यवाने ॥ 82 ॥ अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभु किसलिये भ्रमण कर रहे थे, -इसे कोई भी नहीं जानता था। किसी-किसी सौभाग्यशाली व्यक्तिको ही महाप्रभुके दर्शन हो रहे थे॥ 82 ॥ महाप्रभुके लिये दो पात्रोंमें दूध-चिड़ा और दो पात्रोंमें दही-चिड़ा :- तबे हासि' नित्यानन्द बसिला आसने। चारि कुण्डी आरोया चिड़ा राखिला दाहिने ॥ 83 ॥ अनुवाद-तब श्रीनित्यानन्द प्रभु मुस्कुराकर अपने आसनपर बैठ गये, उन्होंने चार हाण्डियोंमें आरोया-चिड़वा डालकर अपनी दायीं ओर रख दिया ॥ 83 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'आरोया-चिड़ा', - धानको उबालनेके बदले धूपमें तपाकर प्राप्त चावलोंका चिड़वा ॥ 83 ॥ महाप्रभु और श्रीनित्यानन्दप्रभुका भोजन :- आसन दिया महाप्रभुरे ताँहा बसाइला। दुइ भाइ तबे चिड़ा खाइते लागिला ॥ 84 ॥ अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभुने वहाँपर महाप्रभुको आसन देकर बैठाया। तब दोनों भाई चिड़वा खाने लगे ॥ 84 ॥ श्रीनिताइका भावावेश :- देखि' नित्यानन्दप्रभु आनन्दित हैला। कत कत भावावेश प्रकाश करिला ॥ 85 ॥ अनुवाद-महाप्रभुको अपने साथ खाते देखकर