भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2226

सातवाँ अध्याय कथासार—इस अध्यायमें श्रीवल्लभ-भट्टका आगमन और उनके प्रति अनेक प्रकारका परिहास, उनके सभी सिद्धान्तोंका संशोधन, उनके द्वारा दिये गये निमन्त्रणको ग्रहण करना एवं भट्टका श्रीगदाधर पण्डितके प्रति विशेष आनुगत्य देखकर पण्डितके प्रति महाप्रभुकी छलनापूर्ण उदासीनता,—यह समस्त वर्णित हुआ है। भट्टके अत्यन्त अनुगत होनेपर तब महाप्रभुने उनके निमन्त्रणको स्वीकार करके श्रीगदाधर पण्डितसे मन्त्रार्थ आदिकी शिक्षा प्राप्त करनेकी आज्ञा दी और श्रीगदाधर पण्डितके प्रति स्नेह प्रकाश किया। —(अमृतप्रवाह भाष्य) स्पर्शमणि गौरभक्तोंकी वन्दना :- चैतन्यचरणाम्भोजमकरन्दलिहो भजे। येषां प्रसादमात्रेण पामरोऽप्यमरो भवेत्॥1॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिनकी कृपामात्रसे पाखण्डी व्यक्ति भी अमर हो जाता है, [मैं] उन्हीं श्रीचैतन्य चरणकमलके मधुके लोभी भक्तोंका भजन करता हूँ॥1॥ अनुभाष्य— येषां (गौरपदाश्रित-भक्तानां) प्रसादमात्रेण (कृपालवेन) पामरः (भक्तिरहितः पाषण्डः) अपि अमरः (अप्राकृत देहवान्) भवेत्, [तान्] चैतन्यचरणाम्भोजमकरन्दलिहः (चैतन्यस्य भगवतः गौरस्य चरणौ एव अम्भोजे तयोः मकरन्दान् लिहन्ति ये तान् गौरभक्तान्) [अहं] भजे। श्लोक-भावानुवाद—गौरपदाश्रित-भक्तोंकी लेशमात्र कृपासे भक्तिरहित पाखण्डी भी अप्राकृत देहवान् हो जाता है, [उन] भगवान् श्रीचैतन्यके चरणकमलोंके मधुका पान करनेवाले गौरभक्तोंका [मैं] भजन करता हूँ॥1॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥2॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो। श्रीगौरभक्तवृन्दकी जय हो॥2॥ रथयात्रासे पहले गौड़ीय-भक्तोंका आगमन :- वर्षान्तरे यत गौड़ेर भक्तगण आइला। पूर्ववत् महाप्रभु सबारे मिलिला॥3॥ अनुवाद—अगले वर्ष श्रीगौड़देशसे जितने भक्त नीलाचल आये, महाप्रभु पूर्व वर्षोंकी भाँति उन सबसे मिले॥3॥ श्रीवल्लभभट्टका आगमन :- एइमत विलास प्रभुर भक्तगण लञा। हेनकाले वल्लभ-भट्ट मिलिल आसिया॥4॥ अनुवाद—महाप्रभु इस प्रकार अपने भक्तोंके साथ विलास कर रहे थे। तभी श्रीवल्लभ भट्ट नीलाचलमें आकर महाप्रभुसे मिले॥4॥ अनुभाष्य—'वल्लभ-भट्ट',—मध्यलीला 19/61 संख्याका अनुभाष्य देखें॥4॥ श्रीभट्टके द्वारा महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना, उन्हें वैष्णव मानकर महाप्रभुके द्वारा उनका आलिङ्गन :- आसिया वन्दिल भट्ट प्रभुर चरणे। प्रभु 'भागवतबुद्ध्ये' कैला आलिङ्गने॥5॥ अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्टने आकर महाप्रभुके चरणोंकी