श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें210 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/5-11 ] वन्दना की, महाप्रभुने उन्हें भक्त-भागवत मानकर उनका आलिङ्गन किया ॥ ५ ॥ श्रीभट्टकी सविनय-उक्ति-श्रीजगन्नाथके द्वारा महाप्रभुके दर्शनकी आकाङ्क्षाकी पूर्ति :- मान्य करि' प्रभु तारे निकटे बसाइला। विनय करिया भट्ट कहिते लागिला ॥ ६॥ “बहुदिन मनोरथ तोमा देखिबारे। जगन्नाथ पूर्ण कैला, देखिलुँ तोमारे ॥ ७॥ श्रीवल्लभकी महाप्रभुके प्रति भगवान्के समान बुद्धि और गौरव-स्तुति, किन्तु शरणागतिका अभाव :- तोमार दर्शन ये पाय, सेइ भाग्यवान्। तोमाके देखिये,-येन साक्षात् भगवान् ॥ ८ ॥ महाप्रभुके दर्शनकी बात तो दूर, स्मरणसे ही पवित्रता :- तोमारे ये स्मरण करे, से हय पवित्र। दर्शने पवित्र हवे, —इथे कि विचित्र ? ? ९ ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीवल्लभ भट्टको सम्मान देकर अपने निकट बैठाया। श्रीवल्लभ भट्ट दैन्यपूर्वक कहने लगे, - "बहुत दिनोंसे आपके दर्शन करनेकी अभिलाषा थी, भगवान् श्रीजगन्नाथने उसे पूर्ण कर दिया कि अब आपके दर्शन हुए हैं। जिसे आपके दर्शनोंकी प्राप्ति होती है, वह सौभाग्यशाली है, क्योंकि आपको देखकर ऐसा लगता है कि आप साक्षात् भगवान् हैं। यदि कोई आपको स्मरण करनेसे ही पवित्र हो जाता है, तो वह आपके दर्शन करके पवित्र हो जायेगा, -इसमें कौनसे आश्चर्यकी बात है ? 6-9 ॥ शुद्धभक्तोंकी साक्षात् सेवाकी बात दूर रहे, परोक्षमें स्मरणके प्रभावसे भी शुद्धि :- श्रीमद्भागवत (1/19/33) में- येषां संस्मरणात् पुंसां सद्यः शुद्ध्यन्ति वै गृहाः। किं पुनर्दर्शनस्पर्शपादशौचासनादिभिः ॥ 10 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 10 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- जिनके स्मरणमात्रसे मनुष्योंके घर पवित्र होते हैं, उनके दर्शन, स्पर्श, चरण-प्रक्षालन और उनको आसन आदि प्रदान करनेके द्वारा कितना लाभ होता है, इसे कहा नहीं जा सकता ॥ 10 ॥ अनुभाष्य-प्रायोपवेशनमें रत राजा परीक्षितके द्वारा एकत्रित ब्रह्मज्ञ ऋषियोंसे मृत्युके निकट व्यक्तिके एकमात्र कर्त्तव्यके विषयमें जिज्ञासा करनेपर, ब्रह्मशकुल-तिलक श्रीशुकदेवके वहाँ आगमनपर परीक्षित दीनतासहित सभीको अभिनन्दनपूर्वक कह रहे हैं- येषां (सज्जनानां) संस्मरणात् (सम्यग् मनोविषयीकरणात् एव) पुंसां (मानवानां) गृहाः (प्राकृतभोगायचनाः अपि) सद्यः (तत्क्षणात्) शुद्ध्यन्ति वै (पवित्रा भवन्ति एव), [तेषां] दर्शनस्पर्शनपादशौचासनादिभिः किं पुनः? श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 10 ॥ श्रीकृष्णकी स्वरूप-शक्ति ही नाम-कीर्तनकारी आचार्यको प्रकाशित करनेवाली :- कलिकालरे धर्म-कृष्णनाम-सङ्कीर्त्तन । कृष्ण-शक्ति बिना नहे तार प्रवर्त्तन ॥ 11 ॥ अनुवाद-कलियुगका धर्म कृष्णनाम-सङ्कीर्तन है और भगवान् श्रीकृष्णकी शक्तिके बिना उसका प्रचार नहीं किया जा सकता ॥ 11 ॥ अनुभाष्य-श्रीमध्वके द्वारा उद्धृत श्रीनारायण-संहिता- वचन- “द्वापरीयैर्जनैर्विष्णुः पञ्चरात्रैस्तु केवलैः। कलौ तु नाममात्रेण पूज्यते भगवान् हरिः॥" [अर्थात् "द्वापर-युगीय मनुष्योंके द्वारा श्रीविष्णु केवल पञ्चरात्रके द्वारा ही पूजित होते हैं, किन्तु कलियुगमें भगवान् श्रीहरि केवलमात्र श्रीनामके द्वारा ही पूजित होते हैं।"] श्रीकृष्णकी साक्षात् इच्छा अथवा कृपाशक्तिके बिना कोई भी मनुष्य प्राकृत-मनोधर्मके बलपर जगद्गुरु आचार्यरूपमें अप्राकृत वैकुण्ठ अधोक्षज श्रीकृष्णसे अभिन्न शुद्धकृष्णनाम कीर्तनके द्वारा जगत्में श्रीकृष्णके प्राकट्यको संस्थापित करके बद्धजीवोंके चित्तरूपी दर्पणका मार्जन, भवमहादावाग्नि-निर्वापण और