भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2228

[ 7/11-19 सातवाँ अध्याय 211 श्रेयःकैरवचन्द्रिकाके वितरणमें समर्थ नहीं है। श्रीकृष्णसे अभिन्न उनके प्रकाश-विग्रह शुद्धनामैककीर्त्तननिष्ठ आचार्य-साक्षात् श्रीकृष्णशक्तिके अवतार कृष्णलिङ्गित विग्रह हैं; वे-चारों वर्णाश्रमियोंके गुरुदेव महाभागवत परमहंसठाकुर हैं॥11॥ श्रीकृष्णनामके प्रवर्त्तनके कारण महाप्रभुको स्वरूप-शक्तिमान् समझना :- ताहा प्रवर्त्ताइला तुमि, —एइ त' 'प्रमाण'। कृष्णशक्ति धर तुमि, —इथे नाहि आन॥12॥ अनुवाद-आपने कृष्णनाम सङ्कीर्त्तनका प्रवर्त्तन किया है। इसलिये यह प्रमाणित होता है कि आप श्रीकृष्णकी शक्तिको धारण करनेवाले हैं। इस विषयमें अन्य कोई विचार नहीं हो सकता॥12॥ सेवोन्मुख व्यक्तिको श्रीकृष्णनाम प्रदान करनेवाले श्रीगौरके दर्शनसे श्रीकृष्णप्रेमका उदय :- जगते करिला तुमि कृष्णनाम प्रकाशे। येइ तोमा देखे, सेइ कृष्णप्रेमे भासे॥13॥ अनुवाद-आपने सम्पूर्ण जगत्‌में कृष्णनामको प्रकाशित किया है। जो भी आपका दर्शन करता है, वही कृष्णप्रेममें प्लावित हो जाता है॥13॥ स्वरूप-शक्तिके प्रभावसे श्रीकृष्णके द्वारा ही श्रीकृष्णप्रेम-प्रकटित करनेका सामर्थ्य :- प्रेम-परकाश नहे कृष्णशक्ति बिने। 'कृष्ण'—एक प्रेमदाता, शास्त्र-प्रमाणे॥14॥ अनुवाद-श्रीकृष्णकी शक्तिके बिना प्रेमको प्रकाशित नहीं किया जा सकता। श्रीकृष्ण ही एकमात्र प्रेमदाता हैं-शास्त्र इस विषयमें प्रमाण हैं॥14॥ लघुभागवतामृत (1/5/37)में बिल्वमङ्गल-वचन- सन्त्ववतारा बहवः पङ्कजनाभस्य सर्वतोभद्राः। कृष्णादन्यः को वा लतास्वपि प्रेमदो भवति॥”15॥ अनुवाद-श्रीकृष्णके अंश पद्मनाभके सर्वमङ्गलमय विभिन्न प्रकारके अवतार रहनेपर भी एकमात्र श्रीकृष्णके अतिरिक्त और कौन हैं, जो लताओंको भी प्रेम प्रदान कर सकें? अर्थात् अन्य कोई नहीं कर सकता॥”15॥ अनुभाष्य-आदिलीला 3/27 श्लोक देखें॥15॥ भगवान्‌की दीनता और छलनाकी चेष्टा :- महाप्रभु कहे, —“शुन, भट्ट महामति। मायावादी संन्यासी आमि, ना जानि कृष्णभक्ति॥16॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, —“हे वल्लभभट्ट, आप बहुत बुद्धिमान हैं। सुनो! मैं मायावादी संन्यासी हूँ। इसलिये मैं कृष्णभक्तिके विषयमें कुछ भी नहीं जानता हूँ॥16॥ भगवान्‌के द्वारा भक्तके गुणोंका वर्णन;-(1) महाविष्णु श्रीअद्वैताचार्यकी गुणावली :- अद्वैताचार्य-गोसाञि-'साक्षात् ईश्वर'। ताँर सङ्गे आमार मन हइल निर्मल॥17॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य गोसाई साक्षात् ईश्वर हैं, उनके सङ्गसे ही मेरा मन निर्मल हुआ है॥17॥ 'अद्वितीय भक्तिशास्त्राचार्य' नामकी सार्थकता :- सर्वशास्त्रे कृष्णभक्त्ये नाहि याँर सम। अतएव 'अद्वैत-आचार्य' ताँर नाम॥18॥ अनुवाद-उनके समान समस्त शास्त्रोंका ज्ञान और श्रीकृष्णके प्रति भक्ति किसी अन्यकी नहीं है, इसलिये उनका नाम 'अद्वैत-आचार्य' है॥18॥ स्वयं महाविष्णु होकर आचार्य-परम-कृपालु और परम-वैष्णव :- याँहार कृपाते म्लेच्छेर हय कृष्णभक्ति। के कहिते पारे ताँर वैष्णवता-शक्ति??19॥ अनुवाद-जिनकी कृपासे म्लेच्छको भी कृष्णभक्ति प्राप्त हो जाती है, उनकी वैष्णवताकी शक्तिका कौन वर्णन कर सकता है?19॥