भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2229

212 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/20-27 ] (2) श्रीनित्यानन्द-गुणावली; श्रीकृष्णके स्वरूप-प्रकाश होनेपर भी कृष्णप्रेमसिन्धु सेवक-विग्रह :- नित्यानन्द-अवधूत-'साक्षात् ईश्वर'। भावोन्मादे मत्त कृष्णप्रेमेर सागर ॥ 20 ॥ अनुवाद-श्रीनित्यानन्द अवधूतके समान दिखते हैं, परन्तु वे साक्षात् ईश्वर हैं। वे सदा भावके उन्मादमें मत्त रहते हैं और कृष्णप्रेमके सागर हैं॥ 20 ॥ (3) श्रीवासुदेव-सार्वभौमकी गुणावली :- षड्दर्शन-वेत्ता भट्टाचार्य-सार्वभौम। षड्दर्शने जगद्गुरु भागवतोत्तम ॥ 21 ॥ अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य षड्दर्शनके सम्पूर्ण ज्ञाता हैं, वे षड्दर्शनमें जगद्गुरु और भक्तोंमें उत्तम हैं॥ 21 ॥ तेंह देखाइला मोरे भक्तियोग-पार। ताँर प्रसादे जानिलुँ 'कृष्णभक्तियोग' सार ॥ 22 ॥ अनुवाद-उन्होंने ही मुझे भक्तियोगकी चरम सीमाका दर्शन करवाया है। उन्हींकी कृपासे मैंने कृष्णभक्तियोगके सारको जाना है॥ 22 ॥ (4) श्रीराम-रायकी गुणावली; रसिकभक्तोंमें मुकुटमणि और (क) 'सम्बन्ध' तत्त्व-वेत्ता :- रामानन्द-राय-कृष्ण-रसेर 'निधान'। तेंह जानाइला, कृष्ण-स्वयं भगवान् ॥ 23 ॥ अनुवाद-रामानन्द राय कृष्णरसकी निधि हैं, उन्होंने ही मुझे जनाया है कि श्रीकृष्ण-स्वयं भगवान् हैं॥ 23 ॥ (ख) 'प्रयोजन'-तत्त्ववेत्ता, (ग) 'अभिधेय'-तत्त्ववेत्ता :- ताते प्रेमभक्ति-'पुरुषार्थ-शिरोमणि'। रागमार्गे कृष्णभक्ति-'सर्वाधिक' जानि ॥ 24 ॥ अनुवाद-उनसे ही मैंने जाना है कि श्रीकृष्ण-प्रेमभक्ति ही सभी पुरुषार्थोंका शिरोमणि है। रागमार्गमें प्रेमभक्ति ही सर्वश्रेष्ठ है॥ 24 ॥ अनुभाष्य-'पुरुषार्थ' कहनेसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष,-इन चारोंको समझा जाता है। इन चारों पुरुषार्थोंकी अपेक्षा प्रेमभक्ति-सर्वश्रेष्ठ परमपुरुषार्थ अथवा पुरुषार्थ- शिरोमणि है। विधिमार्गमें श्रीकृष्णकी पूजाकी अपेक्षा रागाणुगामार्गमें की गयी भक्ति अथवा सेवा-श्रेष्ठ है॥ 24 ॥ (घ) 'रस' तत्त्ववेत्ता; कृष्णप्रेमकी अधिकताके कारण मधुररसकी सर्वश्रेष्ठता :- दास्य, सख्य, वात्सल्य, आर ये शृङ्गार। दास, सखा, गुरु, कान्ता, - 'आश्रय' याहार ॥ 25 ॥ मधुररसमें दो प्रकारकी वृत्ति,-(क) पुरमें 'ऐश्वर्य्यमिश्रा', (ख) व्रजमें 'केवला'; यशोदानन्दन व्रजकी पारकीया केवलावृत्तिके द्वारा ही प्राप्य, स्वकीया 'ऐश्वर्य्यमिश्रा'से नहीं :- 'ऐश्वर्य्यज्ञानयुक्त', 'केवल'-भाव आर। ऐश्वर्य्य-ज्ञाने ना पाइ व्रजेन्द्रकुमार ॥ 26 ॥ अनुवाद-मैंने इन्हींसे जाना है कि दास, सखा, गुरुजन (माता-पिता, उनके समवयस्क, गुरु आदि) और कान्ताएँ क्रमशः दास्य, सख्य, वात्सल्य तथा शृङ्गार (मधुर) रसके आश्रय हैं। मधुररस भी 'ऐश्वर्य्यज्ञानयुक्त' और 'केवल'-भावके भेदसे दो प्रकारका है। ऐश्वर्य्य-ज्ञानसे व्रजेन्द्रनन्दन कृष्णको प्राप्त नहीं किया जा सकता॥ 25-26 ॥ अनुभाष्य-'ऐश्वर्य्यज्ञान युक्त' और 'केवल' अथवा 'शुद्ध'-भेदसे भाव-दो प्रकारका है। ऐश्वर्य्यज्ञानयुक्त भावसे व्रजेन्द्रनन्दनकी परम महिमाको जाना नहीं जा सकता। मध्यलीला 19/192 संख्या देखें॥ 26 ॥ श्रीमद्भागवत (10/9/21) में- नायं सुखापो भगवान् देहिनां गोपिकासुतः। ज्ञानिनाञ्चात्मभूतानां यथा भक्तिमतामिह ॥ 27 ॥ अनुवाद-यशोदानन्दन भगवान् श्रीकृष्ण भक्तिमान् देहधारियोंके लिये जिस प्रकार सुलभ हैं, आत्मभूत ज्ञानियोंके लिये वैसे नहीं हैं॥ 27 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 8/226 संख्या देखें॥ 27 ॥