श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें214 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/34-40 ] श्रीमद्भागवत (10/8/46) में— नन्दः किमकरोद्ब्रह्मन् श्रेय एवं महोदयम्। यशोदा वा महाभागा पपौ यस्याः स्तनं हरिः॥ 34 ॥ अनुवाद—श्रीमद्भागवतमें कहा गया है,—हे ब्रह्मन्! श्रीनन्द महाराजने ऐसी क्या सुकृति की थी, जिसके फलस्वरूप उन्होंने श्रीकृष्णको पुत्रके रूपमें प्राप्त किया था? महाभागा श्रीयशोदाने ही ऐसी क्या सुकृति की थी, जिससे साक्षात् परब्रह्म श्रीकृष्णने उनको 'माँ' कहकर उनका स्तन पान किया था?॥ 34 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/77 संख्या देखें॥ 34 ॥ व्रजके 'केवल'-भावमें ऐश्वर्यज्ञानका अभाव, इसलिये 'केवल'-भावका सर्वश्रेष्ठ होना :— ऐश्वर्य देखिलेह 'शुद्धेर' नहे ऐश्वर्य ज्ञान। अतएव ऐश्वर्य हइते 'केवल'-भाव प्रधान॥ 35 ॥ अनुवाद—ऐश्वर्य देखनेपर भी 'शुद्ध'-भाववाले भक्त उस ऐश्वर्यको नहीं मानते। इसलिये 'केवल'-भाव ऐश्वर्य-भावसे श्रेष्ठ है॥ 35 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरायका अपने शिक्षागुरुके रूपमें प्रचार :— ए-सब शिखाइला मोरे राय-रामानन्द। से-सब शुनिते हय परम आनन्द॥ 36 ॥ अनुवाद—यह सब कुछ राय रामानन्दने ही मुझे सिखलाया है। इन सबको सुननेसे ही हृदयमें परम आनन्द होता है॥ 36 ॥ अनुभाष्य—यहाँपर किसी विशेष पाठमें, “अनर्गल रसवेत्ता प्रेम सुखानन्द” [अर्थात् “रामानन्द राय रसतत्त्वके पूर्ण ज्ञाता और नित्य प्रेमके सुखानन्दमें निमग्न रहनेवाले हैं।”] दिखलायी पड़ता है॥ 36 ॥ श्रीरामानन्दके गुण :— कहन ना याय रामानन्देर प्रभाव। राय-प्रसादे जानिनुँ व्रजेर 'शुद्ध' भाव॥ 37 ॥ अनुवाद—राय रामानन्दके प्रभावका वर्णन नहीं किया जा सकता, क्योंकि राय रामानन्दकी कृपासे ही मैंने व्रजके शुद्धभावको जाना है॥ 37 ॥ (5) श्रीदामोदर-स्वरूपकी गुणावली; प्रेमरसविग्रह और गोपीतत्त्व-माहात्म्यवेत्ता या व्रज-माधुर्य-रस-तत्त्वाचार्य :— दामोदर-स्वरूप—'प्रेमरस' मूर्त्तिमान्। याँर सङ्गे हैल व्रज-मधुर-रस-ज्ञान॥ 38 ॥ अनुवाद—स्वरूप दामोदर प्रेमरसके साक्षात् मूर्त्तिमान् रूप हैं। उन्हींके सङ्गसे मुझे व्रजके मधुररसका ज्ञान हुआ है॥ 38 ॥ श्रीकृष्णकी इन्द्रियोंको सन्तुष्ट करनेवाली गोपियोंका माहात्म्य :— 'शुद्धप्रेम' व्रजदेवीरे—कामगन्धहीन। 'कृष्णसुखतात्पर्य',—एइ तार चिह्न॥ 39 ॥ अनुवाद—व्रजदेवियोंके शुद्धप्रेममें कामकी अर्थात् अपने सुखकी अभिलाषाकी गन्ध भी नहीं है। श्रीकृष्णको सुखी करनेका तात्पर्य ही उस शुद्धप्रेमका लक्षण है॥ 39 ॥ शास्त्र प्रमाण :— श्रीमद्भागवत (10/31/19) में— यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेषु भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु। तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किं स्वित् कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः॥ 40 ॥ अनुवाद—गोपियाँ बोलीं—“हे प्रिय! हम तुम्हारे सुकोमल चरणकमलोंको अपने कठोर स्तनोंपर धीरे-धीरे धारण करतीं हैं, उन्हीं चरणोंके द्वारा तुम अभी वनमें भ्रमण कर रहे हो, वहाँ छोटे-छोटे कङ्कड़-पत्थरादि चुभनेके द्वारा अवश्य ही तुम्हें कष्ट हो रहा होगा। तुम हमारे जीवन स्वरूप हो, इसलिये तुम्हारी चिन्तामें व्याकुल होकर हम सबकी बुद्धि भ्रमित हो रही है॥ 40 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/173 संख्या देखें॥ 40 ॥