श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 7/41-45 सातवाँ अध्याय 215 श्रीमद्भागवत (10/31/16) में— पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवान् अतिविलङ्घ्य तेऽन्त्यच्युतागताः। गतिविदस्तवोद्गीतमोहिताः कितव योषितः कस्त्यजेन्निशि ॥ 41 ॥ अनुवाद—हे कृष्ण, हम अपने पति, पुत्र, अन्वय (पतिके सम्बन्धसे जो पुत्रके समान हैं), भाई और बन्धुओं, सभीका परित्याग करके तुम्हारे पास आयी हैं; हमारे आनेका कारण तुम जानते हो, —तुम्हारे गीतसे मोहित होकर हम आयी हैं। हे धूर्त, रात्रिकालमें स्त्रियोंका [तुम्हारे अतिरिक्त] कौन इस प्रकार परित्याग करता है? ॥ 41 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 19/209 संख्या देखें; पाठान्तरमें, — “गोपीगणेर शुद्धप्रेम—ऐश्वर्यज्ञानहीन। प्रेमेते भर्त्सना करे एइ तार चिह्न॥” [अर्थात् “गोपियोंका श्रीकृष्णके प्रति शुद्धप्रेम है और वे श्रीकृष्णके ऐश्वर्यको देखनेपर भी उसे मानती नहीं हैं, इसलिये कभी श्रीकृष्णकी प्रेमसे भर्त्सना भी कर देती हैं। शुद्धप्रेमका यही लक्षण है।”] ॥ 41 ॥ गोपीप्रेमके निकट श्रीकृष्णका ऋण :— ‘सर्वोत्तम भजन एइ सर्वभक्ति जिनि’। अतएव कृष्ण कहे, —‘आमि तोमार ऋणी’ ॥ 42 ॥ अनुवाद—गोपियोंका मधुररसमें श्रीकृष्ण-भजन अन्य सभी प्रकारकी भक्तिके भावोंको पराभूत करता है। इसलिये श्रीकृष्ण गोपियोंसे कहते हैं, —‘मैं तुम्हारा सदाके लिये ऋणी हूँ।’ ॥ 42 ॥ श्रीमद्भागवत (10/32/22) में— न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां स्वसाधुकृत्यं विबुधायुषापि वः। या माऽभजन् दुर्जयगेहशृंखलाः संवृश्च्य तद्वः प्रतियातु साधुना ॥ 43 ॥ अनुवाद—हे गोपियों! मेरे साथ तुम्हारा मिलन निर्मल है। अनेक जन्मोंमें भी मैं अपने सत्कार्योंके द्वारा तुम्हारे प्रति कर्तव्यानुष्ठान नहीं कर सकता, क्योंकि तुम लोगोंने मेरी प्राप्तिके लिये अति कठिन संसार-शृङ्खलाको सम्पूर्णरूपसे तोड़कर मेरा अन्वेषण किया है। मैं तुम लोगोंके इस ऋणका परिशोधन करनेमें सक्षम नहीं हूँ। इसलिये तुम लोग अपने साधु कार्योंके द्वारा ही परितुष्ट होओ ॥ 43 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/180 संख्या देखें ॥ 43 ॥ व्रजके शुद्ध केवलभावकी श्रेष्ठता, उसके विषयमें श्रीउद्धवकी प्रार्थना ही प्रमाण :— ऐश्वर्यज्ञान हैते केवल-भाव—प्रधान। पृथिवीते भक्त नाहि उद्धव-समान ॥ 44 ॥ तैँह याँर पदधूलि करेन प्रार्थन। स्वरूपेर सङ्गे पाइलुँ ए सब शिक्षण ॥ 45 ॥ अनुवाद—ऐश्वर्यज्ञानसे ‘केवल’-भाव श्रेष्ठ है। पृथ्वीपर उद्धवके समान कोई भक्त नहीं है, किन्तु वे भी उन व्रजगोपियोंके चरणोंकी धूलिकी प्रार्थना करते हैं। स्वरूप दामोदरके सङ्गमें ही मुझे यह सब शिक्षा मिली है ॥ 44–45 ॥ अनुभाष्य—इस स्थानपर पाठान्तरमें—(भाः 10/47/61) श्लोक उद्धृत हुआ देखा जाता है— “आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्। या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथञ्च हित्वा भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्॥” श्रीकृष्णके द्वारा भेजे जानेपर उद्धव व्रजमें आकर कुछ मास तक वहाँ रहे। उन्होंने श्रीकृष्णकथाको सुनाकर व्रजवासियोंका हर्ष उत्पादन किया, तो भी श्रीकृष्णविरहमें तप्त गोपियोंके श्रीकृष्णके द्वारा हरण किये गये चित्तकी विकलताका दर्शन करके उनके ऐश्वर्यज्ञानहीन गाढ़तम श्रीकृष्णप्रेमको आदर्श जानकर